एएमयू में ग़ैर-मुस्लिम होने का मतलब!

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भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली लड़कियों की वहाँ के कैम्पस और गर्ल्स हॉस्टल के बारे में क्या है राय? इसे जानने के लिए बीबीसी हिन्दी पेश कर रहा है विशेष शृंखला.

पढ़ें इस सिरीज़ की पहली कहानी

सिरीज़ की दूसरी कहानी में पढ़ें एक ग़ैर-मुस्लिम लड़की के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ने का क्या अनुभव रहा?

पढ़ें लेख विस्तार से

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मैंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एमए कोर्स में साल 2010 में प्रवेश लिया था.

मैंने अपने विषय के तौर पर राजनीति विज्ञान को चुना. मेरे लिए यह फ़ैसला करना आसान नहीं था.

अपने माता-पिता को इसके लिए राज़ी करना बहुत मुश्किल काम था, वो भी तब जब मैं ख़ुद विश्वविद्यालय को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं थी.

मैं कश्मीरी हूँ, मुस्लिम बहुल इलाक़े में पली-बढ़ी हूँ इसलिए मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ने-रहने का चुनाव बहुत हैरान करने वाला नहीं था.

मैं सिख हूँ, जो कश्मीर में अल्पसंख्यक लेकिन महत्वपूर्ण समुदाय है. घर से दूर रहने की कल्पना में थोड़ा डर था तो थोड़ा रोमांच भी और मैं इसका अनुभव लेना चाहती थी.

पहला दिन

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Image caption कोमल अभी जेएनयू में पढ़ती हैं

एएमयू में मेरा पहला दिन काफ़ी मुश्किल था.

यहाँ मैं बहुत सी नई और अनजान चीज़ों का सामना कर रही थी. धीरे-धीरे मैं यहाँ सहज हो गई. यहाँ की विभिन्नता से मैं ख़ुश थी.

मेरे लिए ये एक तरह से नई दुनिया देखने जैसा था. यहाँ आए मुझे क़रीब एक महीना ही हुआ था लेकिन इस बात का अहसास होने लगा कि मुझमें लोगों को कुछ ख़ास रुचि है.

मुझसे तरह-तरह के सवाल के पूछे गए. मैं कौन हूँ और कहाँ से आई हूँ, इसके बारे में तमाम क़यास लगाए गए.

कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि मैं कश्मीरी मुस्लिम हूँ. उसके बाद मुझे अहसास हुआ कि बाहरी दुनिया कश्मीरी सिखों की पहचान से अनजान है.

घरवालों की जिज्ञासा

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मेरे घर पर भी लोगों में काफ़ी जिज्ञासा थी. मुझसे कई तरह के सवाल पूछे जाते थे, जैसे कि क्या मैं मुस्लिम विश्वविद्यालय में जींस पहन पाती हूँ?

क्या मुझे हर समय अपने सिर को ढंक कर रखना पड़ता है? क्या वहाँ ग़ैर-मुस्लिमों के साथ रूखा बर्ताव किया जाता है?

मुझे महसूस होने लगा कि दुनिया पूर्वाग्रहों पर चल रही है, क्योंकि मुस्लिम विश्वविद्यालय है इसलिए मान लिया गया कि मुझे वो सब करना पड़ेगा जो मुस्लिमों को करना पड़ता है.

पहले मैं घर और विश्वविद्यालय दोनों जगह लोगों को समझाती रहती थी कि मैं विश्वविद्यालय में जो चाहे वो कर सकती हूँ या फिर कश्मीर घाटी में काफ़ी सिख हैं और इस बात पर उन्हें हैरान नहीं होना चाहिए. लेकिन समय बीतने के साथ मैंने सफाई देनी बंद कर दी.

जब मेरे कुछ दोस्त बन गए तो मैंने आसपास के इलाक़े की ख़ूबसूरती का जायज़ा लेना शुरू किया.

मेरा विभाग कला संकाय में मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी के सामने था. यह मेरी तब तक की देखी गई सबसे समृद्ध लाइब्रेरी थी.

लाइब्रेरी में लड़कियाँ

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मैं उन गिनी-चुनी लड़कियों में थी जो लाइब्रेरी का इस्तेमाल करती थीं. मुझे इस बात पर हैरानी होती थी कि लड़कियाँ लाइब्रेरी का इतना कम इस्तेमाल क्यों करती हैं?

मैं सोचती थी कि शायद वो लड़कों के साथ बैठकर पढ़ने में असहज महसूस करती हैं. इस बारे में मैंने काफ़ी सोचा और समय के साथ मुझे एहसास हुआ कि छोटे-शहरों और गरीब परिवेश से आई लड़कियां आमतौर पर न सिर्फ शर्मिली थीं बल्कि उनमें उस आत्मविश्वास की भी कमी थी जो शायद पुरुषों की घूरती निगाहों के बीच लाइब्रेरी में अपनी जगह बनाने के लिए ज़रुरी थी.

हॉस्टल में आने का समय

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एएमयू में मास्टर्स कक्षाओं के हॉस्टल में एक नियत समय पर वापस आकर रिपोर्ट करना होता था.

आज जब मैं उस दौर के बारे में सोचती हूँ तो महसूस करती हूँ अगर ऐसी पाबंदी न भी होती तो भी अंधेरा होने से पहले मैं वापस आना ही पसंद करती, क्योंकि अंधेरा होने के बाद ज़्यादातर कैंपस असुरक्षित लगने लगती हैं, लेकिन ये समस्या सिर्फ एएमयू की नहीं भारत में ज़्यादातर विश्वविद्दालयों की आज यहीं कहानी.

अब मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पढ़ती हूँ और इस संस्थान में आकर मैंने महिलाओं की सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर कई गंभीर प्रयास होते देखे हैं.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक महिला और सिख होने के नाते मेरे साथ कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ, लेकिन महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता को लेकर अगर भारत के सभी संस्थान सजग हो तो महिलाओं का अनुभव थोड़ा बेहतर हो सकता है.

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