बच्चों को झगड़े में क्यों लाया जाए?

  • 17 दिसंबर 2014
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पेशावर के स्कूल में हुए चरमपंथी हमले के बाद भारत में संसद से सड़क तक इस घटना का विरोध जताया गया है और पीड़ित परिवारों के प्रति सांत्वना जताई है.

बीबीसी हिंदी की टीम ने देश के कई हिस्सों में बच्चों से बात की और इस घटना पर उनकी प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश की.

विक्रम राज, कक्षा-7, उम्र- 13 साल, बिलासपुर

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ये बिल्कुल ठीक नहीं हुआ है. बच्चों पर हमला नहीं होना चाहिए.

हमें हर तरह से आतंकवादियों को खत्म करना चाहिए, सुरक्षा को बढ़ाना चाहिए.

इस मामले में सारे देशों को मिलजुल कर काम करने की ज़रूरत है.

विशाल गोस्वामी, कक्षा- 8, उम्र- 14 साल, बिलासपुर

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वहां छोटे-छोटे बच्चे थे. कुछ बच्चे यह सोच कर गए होंगे कि आज मैं इतना पढ़ूंगा, कुछ का इरादा अपने टीचर से तारीफ पाने का होगा.

हो सकता है कि उनमें से कोई बहुत ताक़तवर, कोई बहुत बुद्धिमान हो.

आतंकवादी कहां बैठे हैं, कहां छिपते हैं, उसकी पूरी जानकारी निकाली जाए और कड़ी कार्रवाई की जाए.

आयुष मोहनन, कक्षा- 10, उम्र- 15 साल, फ्रीडम इंटरनेशनल स्कूल, बेंगलुरु

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हमने सुबह दो मिनट का शोक रखा. हम निर्दोष बच्चों के मारे जाने को लेकर कुछ नहीं कर सके. हमें कुछ करना चाहिए. उन्हें लोगों को मारकर क्या मिलेगा.

मुझे लगता है कि अगर पाकिस्तान एक देश के रूप में ज़िंदा रहना चाहता है तो उसकी सरकार को इस कुछ करना ही होगा.

अंशुप्रिया, सेंट जोसेफ़ प्रेप स्कूल, पटना

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पाकिस्तान में स्कूली बच्चों की हत्या के बारे में जानकरी से मेरे मम्मी-पापा बहुत डरे हुए थे. उन्हें डर था कि कहीं ऐसा ही मेरे साथ भी न हो.

मैं जब उन बच्चों के माता-पिता के बारे में सोचती हूं तो पाती हूं कि उनके बच्चों से जुड़े सारे सपने टूट गए होंगे, उनका दिल कितना दुखा होगा.

कभी मुझे ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों से मिलने का मौका मिला तो उनसे पूछूंगी कि आप अपने झगड़े में बच्चों को बीच में क्यों लाते हैं?

राजवीर, पीएन एंग्लो संस्कृत सीनियर सेकेंडरी स्कूल, पटना

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अखबार से पाकिस्तान में हुई घटना के बारे में मुझे जानकारी मिली.

माता-पिता बच्चों को तैयार कर जब स्कूल भेजते हैं तो उन्हें यकीन होता है कि उनके बच्चे स्कूल में पढ़ेंगे-लिखेंगे, सुरक्षित रहेंगे.

लेकिन बच्चों के साथ पाकिस्तान जैसी घटना हो जाए तो माता-पिता पर क्या बीतेगी. यह मैं अभी सोच भी नहीं पा रहा हूं.

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