यहां होता है पहली माहवारी पर जश्न

इमेज कॉपीरइट bbc

असम के बोगांइगांव ज़िले के सोलमारी में एक अनोखी शादी हो रही है. अनोखी इस मायने में कि असम की परंपरा के अनुसार यहां दुल्हन तो होती है लेकिन दूल्हा एक केले का पौधा है. ये मौक़ा है तोलिनी ब्याह का.

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption शादी की तरह भोज दिया जाता है. जिसमें मांस, मछली, सब्ज़ी, चटनी और चावल बनाया जाता है.

ये वो मौका होता है जब बेटी बचपन की उम्र पार कर किशोरावस्था में चली जाती है. ये तब मनाया जाता है जब पहली बार किसी लड़की को माहवारी होती है. असम के सोलमारी गांव के ओनियो रॉय के घर उसी की तैयारी चल रही है और सब की नज़र उनकी बेटी गीतूमनी पर है जिसका नवोई तोलिनी ब्याह है.

बाहर शोर गुल है, गाना बजाना है तो 13 साल की गीतूमनी रॉय एक कमरे में ज़मीन पर चुपचाप बैठी है. तीन दिन बाद वो स्नान करेगी और कपड़े बदलेगी. उसे दुल्हन की तरह सजाया जाएगा. गीतूमनी की माँ भखंत रॉय का कहना था कि ऐसा अवसर उनके जीवन में भी आया था. लेकिन पहले उत्सव के साथ-साथ पाबंदियां भी ज़्यादा थीं.

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption लड़की को चौथे दिन नहला कर खाना दिया जाता है. तीन दिन तक उसे फल और कच्चा दूध दिया जाता है.

वे कहती हैं, ''मुझे पहले दिन तो केवल पानी दिया गया गया था, ज़मीन पर सुलाया गया और उन दिनों में खुद खाना पकाना पड़ता था. काफी छुआछूत होती थी, काफ़ी एहतियात बरतना पड़ता था लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं कर सकती. वो स्कूल जाती है तो कैसे खाना पकाएगी. अगर मैं उसे हमेशा माहवारी के दौरान नीचे सुलाऊँगी तो उसे दुख होगा. मैं अपनी बेटी का साथ दूंगी.''

'तीन दिन तक खाना नहीं'

तोलिनी ब्याह की शुरुआत होती है लड़की की पहली माहवारी के पहले दिन से. उसे सूर्य की रोशनी से बचाया जाता है. माहवारी के दौरान खाने के लिए फल, कच्चा दूध और पीठा दिया जाता है. वो पका हुआ खाना नहीं खा सकती. उसे ज़मीन पर सोना होता है और जब तक रस्म पूरी नहीं हो जाती, कोई पुरुष लड़की का चेहरा नहीं देख सकता .

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption लड़की की मामी उसे तीसरे दिन नहलाती है.

गीतूमनी के पिता ओनियो रॉय कहते हैं, ''मैं खुश हूँ लेकिन मेरी बेटी ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया. मैं कैसे खा सकता हूं. तीन दिन से वो इस सर्दी में ज़मीन पर सो रही है, माना नियम तो नियम होता है लेकिन दुख भी होता है. लेकिन एक तसल्ली है कि उसे माहवारी हो गई. नहीं होती तो हम तनाव में आ जाते. अब मेरी बेटी बड़ी हो गई है.''

इस बीच परंपरा के मुताबिक गीतूमनी को उसकी मामी कंधे पर लादकर नहलाने ले गईं. इस रस्म के दौरान केवल महिला और लड़कियां शामिल होती हैं. इसके बाद, आंगन में गीतूमनी के सोने और चांदी के जेवर पहनाए गए, पैरों में पायल और फिर पारंपरिक मेखला चादर पहनाई गई.

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption लड़की की मामी केले के पौधे की पूजा करती है जिसे दुल्हा समझा जाता है. साथ ही लड़की के लिए गहने और कपड़े लेकर आती है.

गीतूमनी का दुल्हन की तरह शृंगार करने के बाद उसकी मांग में सिंदूर भरा गया. उसने आंगन में केले के पत्तों पर रखी पूजा सामग्री के सामने प्रणाम किया. हालांकि दूल्हा बना केले का पेड़ यहां नहीं होता. शादी के बाद पूजा सामग्री में से तांबुल, पान का पत्ता पारंपरिक गमछे में बांधा जाता है और इसे बच्चा समझकर उत्सव में शामिल महिलाओं को खेलने के लिए दिया जाता है.

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption इस उत्सव में केवल महिलाएं और लड़किया शामिल हो सकती हैं.

ये इस बात को दर्शाता है कि लड़की शादी के लायक है और माँ बन सकती है.

गीतूमनी कक्षा आठ में पढ़ती हैं. वे कहती हैं, ''अच्छा लग रहा है और मैं जानती हूं कि रीति-रिवाज़ के अनुसार मुझे खाना नहीं दिया जा रहा वो सब ठीक है लेकिन मैं ज़मीन पर नहीं सोऊँगी.''

'खुशी मनाने का मौक़ा'

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption लड़की को नहला कर पूजा के स्थान पर लाया जाता है.

उधर 60 साल की पूर्णिमा सिंहो अपनी बेटी का कई साल पहले तोलिनी ब्याह कर चुकी है.

उनका कहना था, ''मेरी बेटी का तोलिनी ब्याह में 30 हज़ार रुपए का ख़र्च आया था. मैंने उसे सोने के गहने भी दिए थे. ये हमारे लिए खुशी मनाने का मौका होता है क्योंकि अगर बच्चा भाग कर शादी कर ले तो कम से कम दिल का अरमान तो अधूरा नहीं रहता.''

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption यहां उसे दुल्हन की तरह सजाया जाता है. मेखला चादर पहनायी जाती है.

ये उत्सव लड़की के सयाने होने पर किया जाता है हालांकि हर इलाके के रीति-रिवाज़ो में थोड़ा बहुत अंतर होता है. असम में माना जाता है कि पहले निचली जाति के लोग ही अपनी बेटी की पहली माहवारी के बाद इस तरह का जश्न मनाते थे लेकिन अब देखा-देखी समाज का हर वर्ग इसे मनाने लगा है.

'लड़की शादी के लिए तैयार'

इमेज कॉपीरइट bbc

तेजपुर यूनिवर्सिटी में कल्चरल स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ेसर मंदाकिनी बरुआ प्युबर्टी राइट्स पर शोध पत्र भी लिख रही हैं. वे बताती हैं, "पहले ब्राह्मण समाज में इसे छिप कर मनाया जाता था क्योंकि वहां ये रिवाज़ था कि माहवारी से पहले लड़की की शादी हो जानी चाहिए लेकिन अब असमिया समाज के हर तबके में इसे मनाया जाने लगा है."

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption ये उत्सव एक तरह से समाज के खुलेपन को भी दर्शाता है.

वे कहती हैं, "तोलिनी ब्याह का मकसद दरअसल समाज या लड़के वालों को ये बताना होता है कि उनकी लड़की शादी के लिए तैयार हो गई. यहां बिहू उत्सव के दौरान अगर लड़का-लड़की एक दूसरे को पसंद कर लेते हैं तो भाग कर शादी कर लेते हैं. क्योंकि उन्हें डर रहता है कि शायद माता-पिता इससे राज़ी न हो. ऐसे में इसी ब्याह में लड़की के माता-पिता अपनी इच्छाएं पूरी करते है. साथ ही इस बात की खुशी ज़ाहिर की जाती है कि अब वो माँ बन सकती है.''

मंदाकिनी बरुआ ये भी बताती हैं कि लड़की को जेवर देकर ये अहसास भी दिलाया जाता है अब वो सयानी हो गई है.

इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption पूजा के बाद चावल के आटे से होली खेली जाती है.

उत्तर भारत में जहां अब भी इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती वहीं असम, तमिलाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ इलाक़ों में लड़की की पहली महवारी को शादी की तरह मनाया जाता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार