कहानी एक पाकिस्तानी क़ैदी की..

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विचाराधीन कैदियों की हमारी ख़ास सिरीज़ में बात भारतीय जेलों में बंद विदेशी कैदियों की.

भारतीय जेलों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक बंद हैं. एक ऐसे ही पाकिस्तानी कैदी के मामले के जरिए हम आपको विदेशी कैदियों की मुश्किलों के बारे में बता रहे हैं.

कानपुर की एक जेल में मोहम्मद इदरीस बीते दस सालों से बंद हैं. हर बार उनकी सुनवाई को एक नया तारीख़ मिल जाता है.

पढ़िए ख़ास सिरीज़ की नौवीं कड़ी विस्तार से

मोहम्मद इदरीस को बीते 9, दिसंबर 2014 को कानपुर में विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश होना था.

सुबह से दोपहर तक इदरीस कानपुर कचहरी के बंदी गृह में इंतज़ार करते रहे. अदालत बंद होने से थोड़ी देर पहले, करीब तीन बजे इदरीस को अदालत में पेश किया जाता है.

इदरीस को चलने में तकलीफ़ है. वह लंगड़ा कर चल रहे हैं. अदालत की सीढ़ियां इदरीस सहारा लेकर चढते हैं और थोड़ी थोड़ी देर में ही ज़मीन पर बैठ जाते हैं. उनकी सांस फूलने लगती हैं.

मजिस्ट्रेट की अनुपस्थिति की वजह से इदरीस अदालत के हाज़िरी रजिस्टर में सिर्फ अपनी हाज़िरी लगाते हैं और वापस कानपुर जेल लौट जाते हैं.

अदालत में उन्हें अगली तारीख़ दे दी जाती है- 23 दिसंबर, 2014.

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तारीख़ पर तारीख़

नौ दिसंबर से पहले इदरीस 25 नवंबर, 2014 को अदालत में पेश हुए थे पर उस दिन भी अदालत में कोई सुनवाई नहीं हुई थी.

25 नवंबर, 2014 को भी मजिस्ट्रेट की अनुस्थिति के कारण उन्हें पेश होने की अगली तारीख़ मिली थी- 9 दिसंबर, 2014.

अदालत में पेश होने के बाद इदरीस ने बीबीसी से कहा, "जेल में मुझे एक काल कोठरी में रखा गया है. मुझे किसी से भी बात करने की इजाज़त नहीं है. आप समझ सकते हैं मेरी दिमागी हालत क्या होगी." इतना कह कर इदरीस रोने लगे.

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इदरीस कहते हैं, "पहले मैं कई किलोमीटर पैदल चल लेता था. अब थोड़ी दूर चलने पर ही पैर सुन्न हो जाता है, साँस फूलने लगती हैं."

कानपुर में जन्मे पर बाद में पाकिस्तानी नागरिक बने इदरीस यहां एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ चुके हैं और करीब 10 साल जेल में बिता चुके हैं.

10 साल से जेल में

अब वह करीब दो साल से फिर से जेल में है और फिर से एक कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.

पाकिस्तान की नागरिकता लेने के बाद इदरीस मई 1999 में कानपुर 15 दिन के वीज़ा पर अपने बीमार पिता को देखने आए. उनके पिता की मृत्यु हो गयी और वीज़ा ख़त्म होने के बाद इदरीस तीन दिन और कानपुर में रहे.

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तब पाकिस्तानी जासूस होने के आरोप में उन्हें कानपुर पुलिस ने गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया.

दस साल बाद अदालत ने उन्हें जेल से रिहा कर दिया और कानपुर के प्रशासन और पुलिस को आदेश दिया कि इदरीस को पाकिस्तान भेज दे. इदरीस का कहना है कि कराची में उनकी पत्नी और चार बच्चे रहते हैं.

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पर पाकिस्तान सरकार ने इदरीस को वापस लेने से मना कर दिया और वह फिर कानपुर वापस आ गए. 2009 से चार साल इदरीस ने अपने दिन कभी कानपुर की सड़कों पर तो कभी रैन बसेरा में या फिर पुलिस मेस में बिताए.

दोबारा गिरफ़्तारी

इसी दौरान कई सामाजिक संस्थाओं ने इदरीस को उनके घर कराची भेजने की कोशिश की. अपने मददगारों से संपर्क में रहने के लिए इदरीस ने एक मोबाइल फ़ोन खरीद लिया.

पुलिस ने इदरीस को फर्जी दस्तावेज़ के ज़रिए सिम कार्ड खरीदने के ज़ुर्म में दोबारा गिरफ़्तार कर लिया और 26 फ़रवरी 2013 को फिर से कानपुर जेल में डाल दिया. तब से वह जेल में ही है.

इदरीस की मदद कर चुके सामाजिक कार्यकर्ता रवि शुक्ला ने कहा, "हम लोग इदरीस को करीब-करीब भूल ही गए थे पर अब दोबारा उसकी मदद करेंगे."

पिछले 10 सालों से इदरीस के वकील रहे दीनदयाल प्रजापति ने बीबीसी से कहा, "मैं इदरीस का मुक़दमा फिर से अदालत में लड़ रहा हूँ."

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वे कहते हैं, "इदरीस के कागज़ात कानपुर प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने ठीक से तैयार नहीं किए थे इसीलिए उसको पाकिस्तान सरकार ने लेने से मना कर दिया."

जासूसी का शक

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान के फ़ैसले के बाद से ही इदरीस कानपुर पुलिस की निगरानी में है. तो वह फर्जी कागज़ात के आधार पर सिम कार्ड पैसे देकर ख़रीद सकता है? अगर उसने लिया भी है तो इसके लिए कानपुर पुलिस ज़िम्मेदार है."

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पुलिस सूत्रों के अनुसार इदरीस के जेल की काल कोठरी में रखे जाने के पीछे वजह है. इदरीस पाकिस्तानी है और उस पर जासूस होने का शक भी है.

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