'सुबह से शाम तक बेटे को तलाशता रहा'

  • 18 दिसंबर 2014
पेशावर के आर्मी स्कूल में मारे गए लोगों के लिए दुआ करती स्कूली लड़कियां इमेज कॉपीरइट EPA

पाकिस्तान में पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर 16 दिसंबर को हुए चरमपंथी हमले के बाद से पूरे शहर में शोक की लहर है.

हमले में मारे गए लोगों की याद में जगह-जगह प्रार्थना सभाएं की जा रही हैं और लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि आखिर इतना बड़ा हमला हुआ कैसे? चरमपंथी गोला-बारूद के साथ स्कूल में घुसे कैसे?

बीबीसी उर्दू के संवाददाता अज़ीमुल्लाह ने हालात का जायज़ा लिया.

माहिर असलम के पिता रिज़वान असलम

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अपने बेटे की तलाश में मंगलवार को 11 बजे से पांच बजे तक का समय हमने डिफ़ेंस पार्क में गुज़ारा. मैंने वहां एक-एक बच्चे को देखा. मैं वहां नौवीं क्लास के बच्चों के बारे में पूछता रहा कि वो निकले या नहीं. मुझे वहां बताया गया कि वो निकल गए हैं. जब ये पूछा कि वो कहां गए हैं, तो बताया गया कि इधर-उधर चले गए हैं.

जिस तरह वहाँ धमाके हो रहे थे, उससे लग रहा था जैसे भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हो रहा हो. मैंने ख़ुद 20-25 धमाकों की आवाजें सुनीं. गोलियां तो वहां बेशुमार चल रही थीं. इतनी गोलीबारी सुनकर मेरी पत्नी ने कहा कि मेरे बच्चे का दिल तो बहुत छोटा है. इतने धमाके हुए हैं, कहीं कोई और बात न हो जाए. इस पर मैंने उन्हें दिलासा देते हुए कहा,'' नहीं यार, बच्चे कार्टून फ़िल्में देखते हैं और वीडियो गेम खेलते हैं. इसलिए उन्हें ऊंचा सुनने की आदत है.''

प्रिंसिपल के लिए दुआ

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पेशावर के लांडियार बाग़ के इलाक़े काज़ियान मोहल्ले में आर्मी पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल ताहिरा काज़ी के लिए लोग दुआ कर रहे थे. उनका कोई भी रिश्तेदार आर्मी पब्लिक स्कूल में हुई घटना के बारे में बात करने को तैयार नहीं था. लेकिन वहां मौजूद कुछ लोगों ने बताया कि हमले के वक्त सुरक्षाकर्मी ताहिरा को सुरक्षित बचाकर बाहर लाए थे. लेकिन वो यह कहकर फिर अंदर चली गई थीं कि जब तक उनका एक भी बच्चा स्कूल के अंदर मौजूद है वो बाहर कैसे जा सकती हैं.

ताहिरा काज़ी इस स्कूल में 1994 से पढ़ा रही थीं.

बच्चों का डर

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Image caption पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में हुए हमले में मरने वालों में अधिकतर बच्चे थे.

पेशावर में स्कूल-कॉलेज और दुकानें बुधवार को पूरी तरह बंद रहे. सड़कों पर ट्रैफि बिल्कुल ही कम था. लोग अपने-अपने इलाक़े में इस घटना पर चर्चा करने में मशगूल थे. इन्हीं में से एक व्यक्ति ने कहा कि लोग यह सोच रहे हैं कि हमलावर कहां से आए, किधर से आए और अपने साथ इतना अधिक गोला-बारूद और हथियार सेना के इलाके में स्थित स्कूल में कैसे ले जा पाए.

वहीं एक दूसरे व्यक्ति का कहना था कि आर्मी पब्लिक स्कूल पर जब इतना बड़ा हमला हो गया तो अब लोगों के सामने सवाल यह है कि वो अपने बच्चों को किस स्कूल में भेजेंगे. इस हमले के बाद से बच्चे, उनके माता-पिता और भाई-बहन डरे हुए हैं.

हमले में घायल हुए और बचे हुए छात्रों की आप बीती

घायल छात्र

दोनों पैरों में गोलियां लगीं लेकिन हम स्कूल परिसर से निकलने में कामयाब रहे.

आठवीं से लेकर दसवीं कक्षा के छात्रों का विशेष सेमिनार मुख्य हॉल में चल रहा था, तब हमने गोलियों की आवाज़ सुनी. कई लोग हॉल में घुस आए और गोलियां चलाने लगे. प्रिसिंपल और कई टीचर उस वक्त हॉल में मौजूद थे.( समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया)

आमिर अमीन

सत्रह साल के आमिर ने अख़बार 'द टाइम्स 'से कहा, '' हमें यह समझने में कुछ समय लगा कि आखिर हुआ क्या है. जैसे ही हमें बात समझ में आई हम वहां से भाग निकले.''

आमिर ने बताया,"कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर पाने से पहले हो तीन हमलावर कमरे में घुस गए. कमरे में उस समय क़रीब 10 लड़के थे. हमलावरों ने सबको मार डाला. केवल मैं ही ज़िंदा बच पाया.''

खालिद खान

तेरह साल के खालिद ने बताया वो और उनके सहपाठी प्राथमिक चिकित्सा के बारे में पढ़ रहे थे, जब बिना दाढ़ी-मूछ वाले सफ़ेद कपड़े और काले रंग की जैकेट पहने हुए दो हथियारबंद लोग कमरे में दाखिल हुए.

खालिद ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ''उन्होंने बच्चों के ऊपर फ़ायरिंग शुरू कर दी और इसके बाद वो चले गए. सेना के जवान और डॉक्टर किसी तरह वहाँ से निकल गए और हमने अंदर से कमरे को बंद कर लिया. लेकिन कुछ देर बाद ही वो फिर आए और दरवाज़ा तोड़कर कमरे में दाखिल हुए और फ़ायरिंग शुरू कर दी.''

उन्होंने कहा, '' बहुत से बच्चों ने डेस्क के नीचे छिपने की कोशिश की. लेकिन वो मारे गए. उन्होंने मेरे अधिकांश सहपाठियों को मार डाला.''

मुदस्सिर अवान

मुदस्सिर ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ''जैसे ही गोलीबारी शुरू हुई, हम अपने क्लासरूम की ओर भागे. वहां कक्षा नौ और दस के छात्रों के लिए एक पार्टी आयोजित की गई थी इसलिए वहाँ कुछ छात्र थे.''

उन्होंने बताया, ''ऊपर की मंज़िल पर कक्षा 11 और 12 की परिक्षाएं चल रही थीं. इसलिए बच्चे वहां बैठे थे.''

मुदस्सिर ने कहा, ''मैंने हमलावरों को देखा, वो छह-सात लोग थे.वो हर कमरे में घुस कर बच्चों की हत्याएं कर रहे थे.''

काशान : नौवीं कक्षा के छात्र

काशान ने पाकिस्तान ट्रिब्यून एक्सप्रेस को बताया,'' हम हॉल में बैठे हुए थे और एक कर्नल हमें पढ़ा रहे थे, तभी हमने पीछे से गोलियां चलने की आवाज़ सुनी.''

उन्होंने बताया, ''गोलियां चलने की आवाज़ हमारे क़रीब आती जा रही थी और अचानक हमारे पीछे के दरवाज़े को तोड़कर दो व्यक्ति आए और अंधाधुंध फायरिंग करने लगे.''

इस दौरान काशान के पैर में गोली लगी लेकिन किसी तरह वो बचने में कामयाब रहे.

अब्दुल जमाल

आर्मी पब्लिक स्कूल के छात्र अब्दुल जमाल को प्राथमिक चिकित्सा की कक्षा में हुई फायरिंग में पैर में गोली लगी.

उन्होंने समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस से कहा, ''मैंने देखा कि बच्चे नीचे गिर रहे थे. वो रो रहे थे और चीख रहे थे. सभी बच्चों को गोलियों से घाव हुआ था. सभी बच्चों के शरीर से खून निकल रहा था. मैं भी नीचे गिर गया.बाद में पता चला कि मुझे भी एक गोली लगी है.''

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