जानिए लंबी उम्र और बेहतर ज़िंदगी का राज़

भारत की बढ़ती आबादी और स्वच्छता को लेकर लापरवाही को देखते हुए देश की पहले से ही खस्ताहाल, कम संसाधनों वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को आप क्या बना सकते हैं?

हालांकि ये वही स्वास्थ्य सेवा है जिसने भारत में आम लोगों की औसत आयु को बीते कुछ दशक में 32 साल से बढ़ाकर 65 साल तक कर दिया है.

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आप उस स्वास्थ्य सेवा का क्या करेंगे जिसने एक दशक में भारत से पोलियो का उन्मूलन कर दिया, लेकिन जहां आज भी प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत हो जाती है, नसबंदी के ऑपरेशन के बाद भी महिलाओं की मौत होती है.

ज़ाहिर है कि भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी व्यवस्थाएं, देश की दूसरी चीज़ो की तरह ही हैं जहां बड़े काम आसानी से हो जाते हैं जबकि छोटे काम को सही ढंग से नहीं कर पाते.

अमरीका के बेहद मशहूर डॉक्टर और चिकित्सीय मुद्दे पर बेस्ट सेलर लेखक अतुल गवांडे, भारत की स्वास्थ्यगत समस्याओं का बखूबी जवाब देते हैं और मानते हैं कि भारत में सेहत की सुविधाएं दुनिया की सबसे जटिल चीज़ों में एक है.

जटिल है समस्या

डॉक्टर गवांडे बेहद सौम्य तरीके और सहजता से एक निजी अनुभव बताते हैं. इससे पता चलता है कि दुनिया की सबसे घनी आबादी वाले देश में चिकित्सा सुविधाओं का क्या हाल है.

उन्होंने बताया, ''उनकी दादी का मलेरिया की वजह से 30 साल से भी कम उम्र में निधन हो गया था. तब उन्हें मलेरिया की दवाएं नहीं मिली थीं. उनके दादाजी 110 साल तक महाराष्ट्र के उसी गांव में जीवित रहे. उनकी चाचियों का निधन 90 साल की उम्र के बाद ही हुआ.''

अतुल गवांडे बताते हैं, "साफ़ पानी, खेती-किसानी, ज़्यादा फसल, सम्पन्नता से लोगों की उम्र बढ़ती है. सार्वजनिक चिकित्सा सुविधा, सफाई और एंटीबायोटिक्स से भी फ़ायदा होता है."

लेकिन भारत में लंबी उम्र के बाद की ज़रूरतें भी बढ़ जाती हैं. एक ऐसी चिकित्सीय सुविधा की ज़रूरत है जो संक्रामक बीमारियों पर अंकुश लगाए और उच्च रक्तचाप से लेकर डायबिटीज़ तक पर नियंत्रण करने की ज़रूरत है.

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अतुल गवांडे कहते हैं, "भारत में सबसे ज़्याद मौतें हृदय-वॉल्व संबंधी रोगों की वजह से होती हैं. हार्ट अटैक और हृदय से जुड़ी सर्जरी के लिए आधारभूत ढांचों का हमारे यहां इतना विकास नहीं हुआ है कि ये सब सुरक्षित ढंग से हो सकें."

बेस्ट सेलर लेखक

गवांडे के माता-पिता भारत से अमरीका जाकर बस गए थे. अमरीका में गवांडे एक साथ कई भूमिकाओं को निभा रहे हैं. ऑपरेशन थिएटर में वे सर्जरी करते हैं, मेडिकल स्कूल में कक्षाएं लेते हैं. वे स्वास्थ्य नीतियों और प्रबंधन के गुर भी सिखाते हैं.

इन सबसे अलग उनकी लिखी किताबें बेस्ट सेलर की सूची में शामिल हैं. उनका ज्यादातर लेखन आधुनिक चिकित्सा जगत, दवाओं, डॉक्टरों और उनकी गलतियों पर आधारित है.

उनकी हालिया प्रकाशित किताब 'बीइंग मोर्टल' बढ़ती उम्र और मृत्युपर आधारित है.

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48 साल के गवांडे बीबीसी रीथ लेक्चर देने के लिए बीते सप्ताह दिल्ली में थे. उन्होंने इस मौके पर कहा, "पोलिया बहुत बड़ा ख़तरा था, भारत ने उसे बौना साबित कर दिखाया. इन लोगों ने अच्छे तरीके से काम किया."

अधिकारियों ने पोलियो के टीके को संभालकर उचित तापमान में रखा, स्वयंसेवी घर-घर जाकर टीका लगा पाएं, इसकी व्यवस्था हुए. टीकाकरण निगरानी की उम्दा व्यवस्था ने भी असर दिखाया.

पोलियो पर भारत का कमाल

डॉक्टर गवांडे ने बताया, "भारत में ये व्यवस्थागत ढंग से हुआ. साफ संदेश था कि हमारा एक लक्ष्य है, हमें बीमारी का उन्मूलन करना है. डब्ल्यूएचओ की एक टीम के साथ मैंने आंध्रप्रदेश में खुद महसूस किया."

उन्होंने उस अनुभव पर 'द चेकलिस्ट मेनिफेस्टो: हाउ टू गेट थिंग्स राइट' नामक किताब लिखा डाली, जिसमें नौ अध्यायों में ये बताया गया है कि किस तरह से संक्रमण को दूर करना है.

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गवांडे कहते हैं, "पोलियो के उन्मूलन में एक दशक का वक्त लगा. मुझे बिल गेट्स की एक पंक्ति बेहद पसंद है जिसमें वे कहते हैं- हम दो साल में क्या हासिल कर सकते हैं, इसको लेकर हमारा आकलन ज़्यादा हो सकता है, लेकिन हम दस साल में क्या हासिल कर सकते हैं, इसको लेकर हमारा आकलन हमेशा कम ही होगा."

हालांकि अब भी छोटे-मोटे नाममात्र के ऑपरेशन और इलाज के दौरान भारत में लोगों की मौत होती है. डॉ. गवांडे के मुताबिक ये व्यवस्था की नाकामी है.

वे कहते हैं, "आपके पास काफी अनुभवी लोग हो सकते हैं, जिनके पास अच्छी ट्रेनिंग भी होगी. लेकिन आप इन बेहतर लोगों को एक खराब व्यवस्था में काम कराएंगे तो ये उनके लिए भी सही नहीं होगा और दूसरों के लिए भी नहीं. यह कहना आसान है कि ये खराब डॉक्टर है और इसे सज़ा मिलनी चाहिए, इससे समस्या दूर हो जाएगी. लेकिन मामला ऐसा नहीं है. ये हम सब जानते हैं."

पिछले ही महीने छत्तीसगढ़ में सरकारी नसबंदी कैंप में ऑपरेशन के बाद 15 महिलाओं की मौत हो गई थी.

सुधरेगी स्थिति

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छत्तीसगढ़ के मामले पर गवांडे कहते हैं, "छत्तीसगढ़ का मामला, पुरानी दवाओं और सर्जरी की सुविधाओं से जुड़ा हो सकता है...और भी कई मसले हैं, बेहतर डॉक्टरों के अलावा ऑपरेशन रूम की साफ-सफाई की सुविधा और उपकरण कैसे थे?"

भारत के बारे में गवांडे मानते हैं कि देश अमूलचूल बदलाव के दौर से गुज़र रहा है. यहां परिवार टूट रहे हैं, आमदनी बढ़ रही है, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद लोगों की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं, ओल्ड होम्स बन रहे हैं.

गवांडे ये भी मानते हैं कि बुज़ुर्गों को लेकर भारतीय समाज में नए नज़रिए की जरूरत है. वे कहते हैं, "लोगों को बुज़ुर्ग माता-पिता के चिकित्सा खर्च को लेकर योजना बनानी चाहिए. हमें ऐसे संस्थान तलाशने होंगे जो उन्हें आम लोगों की तरह माने. पूरी दुनिया ये सोचने में नाकाम रही है कि बेहतर जीवन वही होता है जो अंतिम कुछ साल होते हैं."

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गवांडे मानते हैं कि स्थिति में तब सुधार होगा, जब ज्यादातर भारतीयों को पेंशन मिलने लगेगी.

लंबी उम्र का राज़ बताते हुए गवांडे कहते हैं, "आपकी उम्र तब लंबी होगी, जब इसके लिए कोशिश करना छोड़ देंगे."

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