क्या भारत में बढ़ रहा है ई-बुक का बाज़ार?

ई-बुक

'किताब एक सपना है जो आप अपने हाथ में पकड़ते है.' नील गैमन के ये शब्द किताब की अहमियत बताने के लिए काफ़ी हैं.

भारत में किताब, लेखक और पाठकों का अपना इतिहास है. वक़्त के साथ साथ इसमें कई बदलाव आए है.

इंटरनेट क्रांति के बाद ज्ञान और कहानियां सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रह गई. किताबों को नई प्रजाति मिल गई जिसे नाम दिया गया 'ई-बुक'.

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'ई-बुक' छपी किताबों का इलेक्ट्रॉनिक संस्करण है जिसे आप कंप्यूटर, मोबाइल या आईपैड पर पढ़ सकते हैं.

यूरोप, अमरीका समेत कई देशों में तो ये ख़ासी लोकप्रिय हो चुकी हैं. लेकिन क्या भारत में भी ई-बुक अपनी पैठ बना चुकी है.

क्या परंपरागत किताबों के बाज़ार को ई-बुक्स से ख़तरा महसूस हो रहा है?

क्या कहता है बाज़ार?

ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट अमेज़न इंडिया के प्रवक्ता का कहना है, "भारत में ई-बुक का बाज़ार फ़िलहाल नवजात है. वैसे किताबों के बाज़ार में भारत की गिनती विश्व के टॉप टेन देशों में है. भारत अंग्रेज़ी किताबों का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार है."

फ्लिपकार्ट के प्रवक्ता गौरव गुप्ता के मुताबिक़, "भारत में अभी भी छपी किताबों का दबदबा ज़्यादा है. लेकिन इंटरनेट, स्मार्टफ़ोन और टेबलेट इस्तेमाल करने वालो की संख्या निरंतर बढ़ने के कारण ई-बुक पढ़ने वालों की संख्या भी बहुत बढ़ी है. इंडस्ट्री रिपोर्ट के मुताबिक़ अगले तीन-चार साल में ई-बुक पढ़ने वालों की संख्या कुल किताब पढ़ने वालों की संख्या की 25 फ़ीसदी हो जाएगी."

कौन हैं ग्राहक?

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गौरव गुप्ता के मुताबिक़ ई-बुक पढ़ने वालों में ज़्यादातर युवा हैं. साथ ही वो विद्यार्थी वर्ग जो सफ़र करने के दौरान इन्हें पढ़ना पसंद करता है.

फ़िलहाल ई-बुक का बाज़ार मेट्रो शहरों में ज़्यादा है.

विज्ञान की छात्रा उर्मिला सुब्रमण्यम कहती हैं, "मुझे दोनों फॉर्मेट में किताबे पसंद है पर ई-बुक की ख़ासियत ये है कि इससे आपके बैग का वज़न नहीं बढ़ता."

मीडियाकर्मी स्वाति रोहतगी कहती हैं, "मुझे छपी किताबे पढ़ना ज़्यादा पसंद है लेकिन उसे हमेशा साथ रखना मुमकिन नहीं इसलिए अब मैं ई-बुक भी पढ़ने लगी हूं."

असर

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मुंबई की 160 साल पुरानी लाइब्रेरी डेविड सिसोन की सेक्रेटरी उमा वाघले का कहना है, "इस लाइब्रेरी में काफ़ी बदलाव आए हैं. बीच में ई-बुक के बढ़ते चलन की वजह से हमारे यहां पाठक कुछ कम ज़रूर हुए थे, लेकिन अब वापस से वो आने लगे हैं. युवा वर्ग, क्षेत्रीय भाषा की किताबों में भी दिलचस्पी लेने लगा है. लेकिन हां, 40 की उम्र से ज़्यादा के पाठक अधिकता में हैं."

पेशे से वकील संदेश सेठ कहते हैं, "मुझे तो लाइब्रेरी जाकर किताबें पढ़ना ज़्यादा अच्छा लगता है. जो नशा असल किताबों का है वो कंप्यूटर या फ़ोन में किताबे पढ़ने से नहीं मिलता."

उमा वागले अंत में कहती है, "छपी किताब ख़रीदने के बाद आपकी हो जाती है. पर ई-बुक आपको पढ़ने का लाइसेंस देती है उस पर मालिकाना हक़ नहीं."

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