'भारत को ख़ुद भी भरोसा नहीं कि कश्मीर उसका है'

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कश्मीर का ज़िक्र होते ही कई चीज़ें ज़ेहन में आ जाती हैं.

डल झील, शिकारे, बर्फ़, पहाड़, वादियां, केसर और कलाशनिकोव की बातें. लेकिन अब बंदूक़ की जगह बैलेट का ज़िक्र होता है.

बीते कल की बजाय मुसतक़बिल (भविष्य) की बातें हैं. सियासत अपनी जगह है पर तिजारत की फ़िक्र ज़्यादा मालूम देती है.

सैलानी, केसर और कारोबार की बातों के दरमियां मैंने एक कश्मीरी कारोबारी से बात की.

भारत का हिस्सा

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शेख़ क़ादिर को कहानियां सुनाने का शौक़ है. उन्हें मुश्किल सवालों का जवाब तलाश करने का भी शौक़ है.

उन्हें दोस्ती 'बनाने का भी शौक़ है.' लेकिन कश्मीर को बार-बार भारत का अटूट हिस्सा बताए जाने से उन्हें नफ़रत भी है!

(कश्मीरः नई राह की खोज)

वो सवाल करते हैं, "क्या कोई अपने बेटे को बाज़ार में ले जाकर ज़ोर-ज़ोर से चीख़ता है कि ये मेरा फ़रज़ंद है, ये मेरा फ़रज़ंद है?"

जवाब भी तैयार है उनके पास, "भारत को ख़ुद भी भरोसा नहीं कि कश्मीर उसका है, तभी वो ये जुमला बार-बार दुहराता है. लेकिन ज़रूरत है कि वो कश्मीरियों पर तैयार शको-शुबहे की जाल से निकले और सूबे में उद्योग-धंधो की तरक़्क़ी की तरफ़ ईमानदारी से काम करे."

पक्का हल

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अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं, "कश्मीरी अपना फ्रूट, शॉल, सैफ्रन, बिजली वग़ैरह किसको बेचेगा? उसके बच्चे का मुसतक़बिल (भविष्य) उसे मालूम होगा, भारत में ही है."

(कश्मीरः कब्रों पर बोलते पत्थर)

सैलाब की मार झेल चुके श्रीनगर के पॉश रामबाग़ इलाक़े के अपने दफ़्तर में बैठे शेख़ क़ादिर बिना किसी हिचकिचाहट के कहते हैं कि यही कश्मीर मसले का पक्का हल है.

लेकिन इसमें नया क्या है! मैं सोचता हूं. कुछ इसी क़िस्म की बातें कुछ लोग पहले भी कह चुके हैं.

शाल के छोटे से बिज़नेस से काम शुरू कर पर्यटन, रियल स्टेट, होटल और मुर्ग़ी पालन के उद्योग तक पांव पसार चुके शेख़ शायद मेरे सवाल को भांप जाते हैं.

पनबिजली की क्षमता

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वे अपने सेक्रेटरी से क़ागज़-क़लम मंगवाते हैं और फिर शुरू हो जाती है, जम्मू और कश्मीर में संभावित उद्योग धंधों पर लंबी बहस.

(कश्मीरः मरता, लुटता धरती का स्वर्ग)

उनके हिसाब से कश्मीर के पास पानी है जिससे हज़ारों मेगावाट बिजली तैयार हो सकती है, जड़ी बूटियों का भंडार है और बेपनाह ख़ूबसूरत झील, झरने, घाटियां और वादियां हैं जिसे पूरी तरह से टूरिज़्म के लिए प्रमोट नहीं किया गया है.

जम्मू-कश्मीर स्टेट पॉवर डेवलपमेंट कार्पोरेशन के मुताबिक़ सूबे में बीस हज़ार मेगावॉट पनबिजली पैदा करने की क्षमता है.

लेकिन राज्य और केंद्र दोनों की परियोजनाओं को मिलाकर फ़िलहाल कुल क्षमता महज़ लगभग 2400 मेगावॉट तक सीमित है.

सितंबर का सैलाब

जबकि सूबे की मोहरा पनबिजली योजना पचासियों साल पहले 1905 में ही लगाई गई थी.

(कश्मीरः ....परिंदों की मीडिया कहानियां)

कश्मीर में पर्यटन में आई कमी तो जग ज़ाहिर है जो 1988 के बाद से जो गिरी है तो हाल में जाकर उसका ग्राफ़ उपर चढ़ना शुरू हुआ.

लेकिन चरमपंथ और सूबे में लंबे व़क्त तक फैली हिंसा इसकी बड़ी वजह रही है.

हालात जब कुछ बेहतर होते दिख रहे थे तो रही सही कसर इस साल सितंबर में आई सैलाब ने पूरी कर दी.

चरमपंथ की मार

शेख़ ख़ुद चरमपंथ की मार झेल चुके हैं जब उनके बेटे को अग़वा कर लिया गया था और फिर उन्हें धंधे को कुछ सालों के लिए दिल्ली शिफ़्ट करना पड़ा था.

लेकिन इस दौरान उनका बिज़नेस भारत के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ कई दूसरे मुल्कों में भी चल निकला.

बातों के दरमियान शेख़ के दफ़्तर में काम करने वाले अधेड़ उम्र के एक शख़्स चाय, क़हवा और बिस्किट पेश करते रहे.

और शेख़ कहते रहे कि कश्मीरी पूरे मुल्क में काम करने को जाता है लेकिन कहीं भी कुछ गड़बड़ी होती है तो उसे पुलिस वाले तंग करते हैं. उन्हें 'सोचना चाहिए कि ये तो कश्मीर से बाहर है.'

अनुच्छेद 370

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वो कहते हैं कि कश्मीरियों को शक की नज़र से देखना बंद किया जाना होगा और उन जैसे बहुत हैं, जिन्हें 'ख़ुद को इंडियन कश्मीरी कहलाने में कोई एतराज़ नहीं.'

लंबे क़द के लेकिन पतले दुबले जिस्म के शेख़ को बिज़नेस ही नहीं पॉलिटिक्स में भी दिलचस्पी है और वो कहते हैं कि अगर मैं लिखना चाहूं तो लिखूं कि उन्हें नरेंद्र मोदी पसंद हैं और न ही उन्हें ये डर है कि वो अनुच्छेद 370 को समाप्त कर देगा.

उनका तर्क है इतने लंबे समय तक केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही तब क्यों नहीं ख़त्म की उन्होंने अनुच्छेद 370?

जटिल समस्या

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लेकिन तब मिली जुली सरकार थी. बातों-बातों में लंबा वक़्त बीत गया था और शेख़ की सेक्रेटरी आकर कहती हैं कि क्या उन्हें नमाज़ के लिए नहीं जाना?

लेकिन शेख़ खड़े होकर जूते उतारते हुए भी आख़िरी फ़िकरा कसने से बाज़ नहीं आते, "भारत को एक बेटे को सूट और दूसरे को महज़ कमीज़ देने की पॉलिसी से बाज़ आना होगा."

वो कहते हैं कि मैं उनकी बातों पर ग़ौर करूं. हो सकता है कि शेख़ क़ादिर के हल कुछ लोगों को कश्मीर की जटिल समस्या का साधारण और नादानी भरा जवाब लगे.

लेकिन क्या इस बात से इंकार कर सकते हैं कि ये कम से कम एक जवाब तलाश करने की कोशिश तो है.

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