हज़रतबल, जुमा और ज़िंदगी के रंग

  • 20 दिसंबर 2014
हज़रतबल

वो शायद ज़ेहन के किसी दूर कोने में 1993 ही रहा होगा जिसने हज़रत बल जाने का मन बनवाया होगा!

या फिर ड्राइवर ऐजाज़ की वो बात कि बड़े सियासतदानों ने आजकल उधर का रुख़ करना बंद कर दिया है. उस हज़रतबल का जहां कभी शेरे कश्मीर बुलाए जाने वाले शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह ने जोशीले भाषण दिए थे.

वहां जिस क्षेत्र से शेख अब्दुल्लाह ने कश्मीर के अलग होने की बात कही थी.

लेकिन बड़े लोग आएं या न आएं कश्मीर में सुरक्षा!! बस, उसके क्या कहने.

उस दिन कश्मीर यूनिवर्सिटी जाते हुए लंबी पूछताछ से पाला पड़ा था. आज वज़ुख़ाने में प्रवेश से पहले बैग की तलाशी देनी पड़ी.

यानी ख़ुदा के घर में जाने से पहले भी बंदूक के साये से छुटकारा नहीं.

मगर अंदर पहुंचने के बाद हम्माम के गर्म पानी, नमाज़ के लिए बिछी ऊनी दरियों और ख़ालिस कश्मीरी ज़बान में गाए जा रहे पैगंबर मोहम्मद और ख़ुदा की शान में गाए जा रहे गीतों ने दिमाग़ का रुख़ दूसरी तरफ़ मोड़ दिया.

मस्जिद के एक हिस्से में औरतें भी नमाज़ अदा करती नज़र आ जाती हैं.

साल 1993 में कुछ चरमपंथी इस पवित्र स्थल में घुस गए थे और सुरक्षा बलों ने इसके चारों तरफ़ घेरा डाल दिया था तो नमाज़ कई तक बंद रही थी.

हालांकि औरंगज़ेब के शासनकाल में हज़रत मोहम्मद की ढाढ़ी का जो बाल यहां लाकर सहेज कर रखा गया है वो दर्शन के लिए साल के कुछ ही दिन उपलब्ध रहता है.

लेकिन कश्मीर के अलग-अलग हिस्से से लोग यहां हर रोज़ आते हैं और शुक्रवार के दिन तो और अधिक.

इस चहल-पहल के बीच भी कुछ वीरानियत का अहसास होता है. या ये ग़ुरबत और प्रशासनिक उपेक्षा का अक्स है जिसे मैं वीरानियत समझ रहा हूं.

अमीर इस क्षेत्र में सब्ज़ी और रोज़मर्रे की ज़िंदगी की शॉपिंग करने आते हैं.

कहीं हाक साग बिक रहा तो कहीं तांबे के बर्तन पर क़लई चढ़ रही और सड़क के बीचोंबीच बैठकर ज़ीरे बेच रहा वो शख़्स.

ये रंग अब इन बाज़ारों में ही दिखते हैं. लोग पवित्र स्थल के लिए बढ़ चढ़कर दान देते हैं.

लेकिन जुमे के दिन देखा हुआ दान का ये तरीक़ा कम से कम मेरे लिए कुछ नया सा था.

किसी भक्त ने दो जानवर दान किए थे, एक शख़्स ज़ोर-ज़ोर से बोली लगा रहा था और किसी ने बताया कि नीलामी के पैसे पवित्र स्थल को जाएंगे.

लेकिन ये यहां का महज़ एक रंग है.

पचास क़दम के फ़ासले पर ही मूली, साग और कुछ मसालों को डालकर तैयार सुर्ख़ अचार बिक रहा है जिसकी ख़ुशबू भूख के एहसास को अचानक से जगा देती है.

गर्म तेल की कड़ाहियों में ख़ास किस्म के बड़े-बड़े पराठे छन रहे हैं, कश्मीरी रोटियों की दुकान भी दिखती हैं.

Image caption यहां के बाज़ार में चहल-पहल के बावजूद वीरानियत महसूस होती है

मगर ध्यान खींचता है रेत में तेज़ आंच पर भून रहा साबुत अरहर और उसके फूटने की वो फट-फट-फट करती आवाज़.

शुक्र के दिन यहां एक बड़ा बाज़ार लगता है.

लोगों का शिकारे से हफ़्ते के बाज़ार में आना और माल लेकर जाना जारी रहता है. और इस बीच कोई मुझे बताता है कि शेख़ अब्दुल्लाह की क़ब्र कहीं पास ही है.

शेख अब्दुल्लाह जिनके पोते - उमर अब्दुल्लाह की हुकुमत के दिन, लोग कहते हैं, लद गए हैं.

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