क्यों सस्ता हो रहा है तेल?

  • 22 दिसंबर 2014
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पिछले छह महीनों में भारत में तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट आई है जिससे उपभोक्ता काफ़ी ख़ुश हैं.

अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार में जारी उथल-पुथल से भारत को फ़िलहाल तो फ़ायदा हो रहा है, लेकिन ये ख़ुशहाली कब तक बरक़रार रहेगी?

बीबीसी ने बात की तेल-गैस क्षेत्र के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा से.

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अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों में जून 2014 से अब तक 30 प्रतिशत की कमी आई है. इसके पीछे क्या वजह है?

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पहली वजह ये है कि अमरीका में जिस हिसाब से शेल तेल और गैस का उत्पादन बढ़ा है, उससे उनकी मध्य-पूर्वी देशों पर जो निर्भरता थी, वो ख़त्म हो रही है.

आने वाले समय में अमरीका इस क्षेत्र में आत्म-निर्भर भी हो सकता है. दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोग्ता वाले देश में ऐसा होने से उन देशों की चिंता बढ़ गई है जो तेल का निर्यात करते हैं.

उधर सऊदी अरब की ये कोशिश है कि तेल की क़ीमत इस क़द्र घटा दी जाए कि सीधा असर अमरीकी शेल गैस और तेल की अर्थव्यवस्था पर असर पड़े.

घटते दामों की एक वजह राजनैतिक भी है. क्योंकि रूस अपनी 50% अर्थव्यवस्था के लिए तेल और गैस पर निर्भर है, तो तेल की क़ीमत घटा कर अमरीका और पश्चिमी देशों की ये कोशिश है कि रूस की अर्थव्यवस्था चरमरा जाए.

यूक्रेन को लेकर चूंकि तनाव बना हुआ है, तो पश्चिमी देश तेल क़ीमतों के ज़रिए रूस को घुटनों पर लाने की कोशिश में हैं.

इसके अलावा ईरान की अर्थव्यवस्था और राजनैतिक स्थिरता को बिगाड़ने के लिए सऊदी अरब की कोशिश है कि तेल के दाम नीचे ही रहें.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की गिरती क़ीमतों का भारत पर क्या असर पड़ेगा?

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Image caption कच्चे तेल की कीमत में जून 2014 से अब तक 30 प्रतिशत की कमी आई है

भारत में इस्तेमाल होने वाला 80 फ़ीसदी तेल विदेश से आयात होता है. यानि तेल की क़ीमत कम होने से भारत को काफ़ी फ़ायदा मिल रहा है.

ऊपर से तेल बेचने वाले देशों के बीच भारत को सस्ते दाम में तेल बेचने की होड़ सी लगी हुई है. तो फ़िलहाल ये भारत के लिए अच्छी ख़बर है.

लेकिन व्यक्तिगत रूप से मेरा या मानना है कि अगर स्थिति यूं ही चलती रही तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी आ जाएगी, जो कि भारत के लिए अच्छा नहीं होगा.

और फिर भारतीय तेल कंपनियों ने अब तेल के नए भंडार खोजने में निवेश थाम लिया है.

तो इसका मतलब ये कि जब वैश्विक राजनीति बदलेगी, तो भारत शायद झटका झेलने के लिए तैयार न हो. तो तेल दामों को लेकर भारत में जो दीवाली मनाई जा रही है, वो ज़्यादा लंबी नहीं टिकने वाली.

भारत को दीवाली मनाने की बजाय दीर्घकालिक रणनीति बनानी चाहिए.

तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये स्थिति कब तक बनी रहेगी?

तेल की दुनिया में ये कहा जाता है कि इसमें कल क्या होगा ये सिर्फ़ भगवान जानता है.

मुझे ऐसा लगता है कि जिस हिसाब से स्थिति चल रही है, तो तेल कम से कम एक साल तक सस्ता रहेगा. अगले एक साल तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल के एक बैरल की औसतन क़ीमत 70 डॉलर रहने की संभावना है.

डेढ़ साल तक तेल की क़ीमतों पर दबाव बना रहेगा, यानि कुल मिलाकर वो ऊपर जा कर फिर नीचे आएंगीं. भारत को उस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए.

(बीबीसी संवाददाता शालू यादव से बातचीत पर आधारित)

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