कौन सेर, कौन सवा सेरः चीन या भारत

  • 30 दिसंबर 2014
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वो चाहे दक्षिण एशिया हो या मध्य एशिया या फिर पूर्वी एशिया, चीन के बढ़ते आर्थिक और कूटनयिक दबदबे पर भारत क़रीबी नज़र रखे हुए है.

चीन की अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाएं हैं और एशिया में उसकी बहुकोणीय कूटनीति इसी का रणनीतिक हिस्सा है और भारत ये समझता है.

एशिया में चीन की बहुकोणीय कूटनीति का बीबीसी मॉनिटरिंग ने इस लेख में जायज़ा लेने की कोशिश की है.

दक्षिण एशिया

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भारत की क्षेत्रीय कूटनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि चीन, दक्षिण एशियाई देशों के संगठन सार्क की पूर्णकालिक सदस्यता के लिए अपनी पूरी ज़ोर आज़माइश कर रहा है.

सार्क पर भारत का हमेशा से दबदबा रहा है और साल 2006 से इसमें चीन की हैसियत एक 'ऑब्ज़र्वर' देश की बनी हुई है.

लेकिन हाल ही में काठमांडू में संपन्न हुए सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान चीन को पूर्णकालिक सदस्यता देने के लिए उठी आवाज़ों ने भारत को असहज स्थिति में डाल दिया है.

चीन के पुराने साथी पाकिस्तान के अलावा, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव ने भी इस मांग का समर्थन किया.

रणनीतिक लाभ

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उनके रवैये से ये ज़ाहिर हो गया कि भारत के पड़ोसी चीन के साथ क़रीबी रिश्तों से जुड़े आर्थिक फ़ायदों के लिए किस तरह से उत्सुक हैं.

लेकिन भारत को डर है कि अगर चीन को सार्क की पूर्ण सदस्यता दे दी जाती है तो वह उन फ़ैसलों पर सवाल उठा सकता है जिनसे भारत को रणनीतिक फ़ायदे मिलते हैं.

भारत के विरोध की वजह से फ़िलहाल भले ही ये प्रस्ताव रुक गया हो लेकिन इस मांग के ख़त्म होने की संभावना कम ही है.

जैसा कि एक विश्लेषक ने कहा भी, "सार्क के हर शिखर सम्मेलन में चीन एक हाथी की तरह होगा. भारत को इस हक़ीक़त को स्वीकार करना होगा और सार्क में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए उसे अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है."

एनर्जी क्लब

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लेकिन चीन की विदेश नीति में दक्षिण एशिया एक छोटा सा हिस्सा है.

और अपनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के चलते चीन भारत को लेकर उसकी (भारत) तरह चिंतित नहीं दिखता.

भारत को शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (एससीओ) की पूर्ण सदस्यता देने के मुद्दे पर चीन की रज़ामंदी से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

ऊर्जा संसाधनों के लिहाज़ से समृद्ध माने जाने वाले देशों के क्लब में रूस और चीन अहम देश हैं.

रूस का समर्थन

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इस क्लब के सदस्य देशों में मध्य एशिया के देश कज़ाकस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान भी शामिल हैं.

भारत 2005 से ही एससीओ में एक 'ऑब्ज़र्वर' देश की हैसियत से शामिल होता रहा है और पूर्ण सदस्यता के लिए उसे रूस का समर्थन हासिल था.

और चीन की ओर से हरी झंडी मिल जाने के बाद माना जा रहा है कि भारत को साल भर के भीतर पूर्ण सदस्यता मिल जाएगी.

इससे पता चलता है कि चीन भारत को अपनी वैश्विक राजनीति के महज एक हिस्से के तौर पर देखता है.

चेकबुक कूटनीति

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इस बीच चीन ने एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) की स्थापना के साथ ही अपनी कूटनीतिक मुहिम की शुरुआत कर दी है.

यह बैंक एशियाई देशों को सड़कें बनाने के लिए मोबाइल टावर और बुनियादी ढांचे से जुड़ी अन्य परियोजनाओं को क़र्ज़ देगा.

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की उन 21 एशियाई देशों में हैं जिनकी मदद से चीन ने इस बैंक की स्थापना की है.

इस नए संस्था को अंतरराष्ट्रीय मीडिया विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर पहले से ही देख रहा है.

विकास परियोजनाएं

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रिपोर्टों में कहा गया कि अमरीका ने पर्दे के पीछे रहकर क्षेत्र में अपने सहयोगियों से इस बैंक से न जु़ड़ने के लिए मनाने की कोशिश की है.

यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि क्या अमरीका ने भारत को भी इसके लिए मनाने की कोशिश की है लेकिन मालूम पड़ता है कि फ़ैसला लेने से पहले भारत ने अपने विकल्पों को तौल लिया है.

एक तरफ़ तो ऐसा लगता है कि इस बैंक को देश की कई विकास परियोजनाओं के लिए पैसा जुटाने के स्रोत के तौर पर देखा जा रहा है.

दूसरी तरफ़ भारत, चीन की सिल्क रोड परियोजना को लेकर संशकित है जिसे इसी बैंक से पैसा मिलना है.

वैश्विक राजनीति

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सार्क को लेकर चीन की महत्वाकांक्षाएं, एससीओ में उसकी निर्णायक भूमिका और एआईआईबी में उसकी अगुवाई, उसकी वैश्विक आकांक्षाओं के अलग-अलग हिस्से भर हैं.

चीन ग्लोब के पूरे यूरेशायिाई भूभाग में सर्वाधिक प्रभावशाली देश बनना चाहता है.

आख़िरकार उसकी ख़्वाहिश ख़ुद को वैश्विक राजनीति के केंद्र में देखने की है.

दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पूर्वी एशिया में चीन की गतिविधियां उसके बड़े मक़सद का हिस्सा हैं.

सिल्क रोड

सिल्क रोड और मैरीटाइम सिल्क रोड जैसी परियोजनाओं से इसकी तस्वीर उभरती है.

ज़मीन और समंदर से होकर गुज़रने वाले ये व्यापारिक रास्ते हैं जो एशिया और यूरोप को जोड़ेंगे और इससे पूरे क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ेगा.

एशिया की उभरती हुई ताक़त के तौर पर भारत भी इन सब चीज़ों पर नज़दीकी नज़र बनाए हुए है.

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