हिन्दी साहित्यः कहानी-उपन्यासों से इतर...

  • 29 दिसंबर 2014
साल 2014 का हिन्दी साहित्य, कथेतर गद्य

न इज़्ज़त है, न रॉयल्टी है, न ग्लैमर है फिर भी हिंदी में कविता, कहानी का हैज़ा है.

लेखक कहलाने, भीड़ में पहचाने जाने से लेकर अमर होने तक की आकांक्षाओं के चलते बड़ी मात्रा में किताबें आ रही हैं. ऐसी किताबें छापना छपवाना असल में अधकचरे अरमानों की प्रोसेसिंग है. एक तरह से ये छपने-दिखने के अवसरों का दुरूपयोग भी.

पढ़ेंः एक किताब का किसी बिस्तर के सिरहाने होना

कथेतर गद्य यानी कथा के अलावा गद्य का रथ सिर्फ़ इच्छाओं के घोड़ों से नहीं खींचा जा सकता. इसलिए वहां मैदान ख़ाली रहता है. इस स्पेस में ज़्यादातर ऊब से लदी वे अबूझ किताबें बिखरी दिखाई देती हैं जिन्हें परीक्षाएं पास करने और नौकरियां पाने के लिए पढ़ना छात्रों की मजबूरी है. लेकन स्थिति इतनी निराशाजनक भी नहीं है क्योंकि अब परिदृश्य बदल रहा है, नए ट्रेंड सामने आ रहे हैं. ये कुछ किताबें हैं जो बीते साल अपने भीतर की हवा से फड़फड़ाती दिखाई पड़ीं.

अजाने मेलों मेंः प्रमोद सिंह (हिन्दी-युग्म)

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कान खींचे जाने का डर न हो तो बच्चे अपनी फंतासियों के संसार को हम तक पहुंचाने के लिए भाषा को कोंचते, रगेदते, मरोड़ते है. शब्दों के साथ तो जो मन वो आए करते हैं ताकि उनके भीतर चलती तस्वीरें आकार पा सकें. प्रमोद सिंह ने 'अजाने मेलों में' यही किया है. वे अनियंत्रित गोल-मोल घूमते, ठिठकते हुए जाने कितनी भाषाओं, बोलियों, मुद्राओं से बटी सुतली के फंदे बनाते हैं ताकि उनमें समकालीन जीवन का तरल यथार्थ फंस सके.

2014: दलित साहित्य में क्या रहा खास

छोटे क़स्बों की ज़िंदगी का विद्रूप, अपनी जैविकता समेत कमीनापन, प्रेम, दांपत्य, रोज़ी की त्रासद विडंबनाएं, साहित्य का चीमड़-लीचड़ खेल, अन्याय और ओछेपन की लनतरानियां, व्यर्थ बीतते दिनों का कर्कश अलाप कुछ इस तरह लाइनों के बीच की ख़ाली जगहों में अटके हैं कि छूने की कोशिश की त्वरित प्रतिक्रिया में लात मारते हैं, हंसाते हैं, उदास कर जाते हैं.

यह मोहभंग के अंतरालों में अघोरी भाव से लिखी गई ऐसी किताब है जिसकी विधा ( इस विधा का एक नाम, जैसे भी हो ख़ुद को व्यक्त करो हो सकता है) तय कर पाना और किसी अन्य भाषा में अनुवाद कर पाना असंभव है... क्योंकि शब्दों के साथ ठेठ भारतीय ज़िंदगी में अटी बहुत सारी धूल, मिट्टी, कलौंछ सतत बदलते टेंपरेचर के साथ चली आई है. प्रमोद आदमी हैं इसलिए उनकी एक इंटलेक्चुअल के रूप में न पहचाने जाने की टीस रिसकर ख़ुद लेखक को ही किताब के बहुतेरे पात्रों में से एक में बदल देती है जिससे एक नया रंग बनता है.

अकाल की कला और ज़ैनुल आबिदिनः अशोक भौमिक (अंतिका प्रकाशन)

कला ख़ासतौर से पेंटिंग को कैसे समझा जाए कि बिना समीक्षकों, व्याख्याकारों की बैसाखी पकड़े कलाकार की नीयत तक पहुंचा जा सके?

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यह एक ऐसा सवाल है जो अन्य समाजों के साथ हिंदी के ज़रिए दुनिया समझने वालों को भी परेशान करता रहता है. रोज़मर्रा में काम आने वाला सौंदर्यबोध किसी आर्ट गैलरी में हमारा साथ छोड़कर कहां चला जाता है?

जिन्हें इस सवाल में दिलचस्पी हो उनके लिए अशोक भौमिक की किताब लिखी गई है.

आज़ादी से पहले के दौर में जब जामिनी रॉय, नंदलाल बोस, अवनींद्र नाथ अपने समय की आफ़तों से निरपेक्ष अपना बाज़ार बनाने में लगे थे तब बांग्लादेश के मैमनसिंघिया ज़ैनुल आबिदिन दुमका के संथालों के जीवन और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 1943 में बंगाल के भीषण अकाल में ठठरी मानुषों के ऊपर मंडराते चील कौओं को उकेर रहे थे.

2014: उल्लेखनीय नारीवादी हिन्दी साहित्य

बाद में बांग्लादेश के मुक्तियुद्ध के समय बर्बरता और प्रतिरोध उनका विषय रहे. उन्होंने पाकिस्तान सरकार के दिए सम्मान हिलाल-ए-इम्तियाज़ को भी ठुकरा दिया था.

यह लेखक के बजाय वक्ता की किताब ज़्यादा लगती है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप की आधुनिक कला धाराओं के साथ कलाकारों की महत्वाकांक्षाओं और अवसरवाद को समझने की भी दृष्टि देती है.

इसमें अकाल और अंग्रेज़ी राज के कारण भारतीय समाज में आए बदलावों को अपना विषय बनाने वाले अन्य कलाकारों गोवर्धन आश, सोमनाथ होरे, क़मरूल हसन और रामकिंकर बैज के रेखांकन, पेंटिग और स्कल्पचर भी हैं.

हिंदुत्व का मोहिनी मंत्रः बद्री नारायण (राजकमल प्रकाशन)

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भारत के दलित कितने हिंदू हैं और क्या आदिवासी हिंदू हैं- इन प्रश्नों की पड़ताल करते हुए इस किताब में बद्रीनारायण ने हिंदुत्व की पुनरूत्थानवादी ताक़तों का सशक्त अकादमिक प्रतिपक्ष रचा है.

विकलांग हिंदुत्व की पुनरूत्थानवादी ताक़तों ने दलित स्मृतियों में बसी कहानियों और मिथकों का पुनर्लेखन और उससे भी अधिक कानफूंकू प्रचार करते हुए अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की जी तोड़ कोशिश की है जिससे लगने लगता है कि एकलव्य, शबरी, शंबूक, केवट सभी अपने समर्पण और दासत्व में मोक्ष तलाशते हुए परमसुखी थे.

यह किताब दलितों की स्वतंत्र अस्मिता और उसे मिटाने की चालू कोशिशों की पहचान कराने की कोशिश करती है. इसी साल बद्रीनारायण की एक और किताब आई है “दलित वीरांगनाएं और मुक्ति की चाह” जिन कथाकारों को बेधक, बेलीक नायिकाओं की तलाश हो उन्हें इस किताब को पलटना चाहिए.

कुछ तो लोग कहेंगेः यासिर उस्मान(पेंगुइन इंडिया)

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यह किताब सचमुच के सुपरस्टार राजेश खन्ना की लोकप्रियता की दंतकथाओं और उनके शर्मीले, अहंकारी, फ़राख़दिल व्यक्तित्व के द्वंद के बीच बड़ी सावधानी से बुनी गई है. इसमें कई ऐसे इंटरव्यू हैं जिनसे स्टारडम और ग्लैमर की कीमियागिरी पर रोशनी पड़ती है लेकिन अनजाने में समाज भी साथ चला आया है.

पढ़ते हुए ताज्जुब होता है कि किस ऑफ़ लव के खूरेंज विरोधी उस बीते तथाकथित पिछड़े ज़माने में कहां थे जब लड़कियां राजेश खन्ना की गाड़ी को चुंबनों से छाप देती थीं या टायरों के नीचे की धूल उठाकर मांग में भर रही थीं.

यह सवाल परेशान करता है कि क्या अर्थव्यवस्था, तकनीक और व्यापार के उन्नत होने के साथ हिंदुस्तानी समाज में कट्टरता बढ़ती गई है.

इस किताब का आना मुनादी है कि ग्लैमर एक सकारात्मक सामाजिक मूल्य के रूप में स्थापित हो चुका है और चमकदार व्यक्तित्वों पर आने वाले दिनों में शोध और लेखन का सिलसिला आगे बढ़ेगा.

दर्रा-दर्रा हिमालयः अजय सोडानी(सार्थक)

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पाप तारने के लिए तीर्थयात्रा के आदी रहे हिंदी समाज में पर्यटन का चस्का ख़ूब बढ़ा है लेकिन एडवेंचर अभी करने नहीं देखने-सुनने-सराहने की चीज़ है.

ऐसे लोग तो विरले ही मिलेंगे जिन्होंने परिवार के साथ ट्रैक करते हुए दुर्गम दर्रों को पार किया हो.

शायद यही कारण है कि हिंदी में यात्रा वृत्तांत काफ़ी कम लिखे गए हैं और जो हैं भी उनमें अनजानी जगहों का जीवन एक दृश्य की तरह खिड़की से देखा गया है जिसके कारण वे पाठक के भीतर आवेश नहीं पैदा कर पाते.

साल 2014 के उल्लेखनीय कविता संग्रह

डा. सोडानी ने सर्द, मनोहारी और ख़तरनाक हिमालय के दर्रों और घाटियों की दस से अधिक बार यात्राएं की हैं और पैशन के साथ लिखा है.

उन्होंने हिमालय में बिखरी पौराणिक कहानियों और ट्रैकिंग से जुड़े अंधविश्वासों पर भी मुहर लगा दी है लेकिन अच्छी बात यह है पहाड़ के नष्ट होते पर्यावरण को चिंता से रेखांकित किया है.

यह सोचकर सिहरन होती है कि एडवेंचरिस्ट बढ़ रहे हैं लेकिन जंगल ख़त्म हो रहे हैं. उस दिन क्या होगा जब यायावर बहुत होंगे लेकिन हिमालय में रहस्य रोमांच से भरी दुर्गम जगहें बहुत कम हो जाएंगी या नहीं रहेंगी.

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