असम: 'मैं भाग रही थी कि तीर पीछे से लगा'

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असम में पिछले दिनों बोडो चरमपंथियों के आदिवासियों पर हमलों के बाद जवाबी कार्रवाई में बोडो लोगों पर भी हमले किए गए.

इन हमलों में अब तक 16 बोडो लोग मारे गए हैं और कई घरों को आग लगा दी गई है.

बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली ने कोकराझार ज़िले में हिंसा प्रभावित कुछ बोडो गांवों का दौरा किया.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

राष्ट्रीय राजमार्ग से सात-आठ किलोमीटर दूर है कोकराझार ज़िले का डीमापुर गांव.

आसपास में कई आदिवासी गांव भी हैं, पर डीमापुर में ज़्यादातर बोडो लोग ही रहते हैं.

मंगलवार को हुए हमले के बाद बुधवार को भी इस गांव में एक और हमला हुआ और इसमें शिकार बने मणिशंकर बासुमतारी.

मणिशंकर बासुमतारी की बेटी निशम बासुमतारी कहती हैं, "मेरे पिताजी गायों को वापस लाने गए थे, जब आदिवासियों ने उनपर हमला किया. डर कर भाग रहे पिताजी पर आदिवासियों ने तीरों से हमला किया जिससे उनकी मौत हो गई."

डीमापुर से दो किलोमीटर की दूरी पर एक और गांव मैनापुर में पहुंचते ही जले हुए धान के ढेर, साइकिल और घर दिखे.

यहां घुसते ही जले हुए सामान, धान आदि की बदबू आ रही थी. इन जले हुए घरों में फुलमती मुसाहारी का घर भी था.

फुलमती कहती हैं, "जब आदिवासियों ने आक्रमण किया तब अन्य लोगों के साथ मैं भी भागने लगी. अचानक एक तीर मुझे लगा और मैं साइकिल से गिर गई, पर मैं रुकी नहीं. बाद में पता लगा कि आदिवासियों ने मेरा घर, साइकिल और बाक़ी सामान सब जला दिया.''

सोनापुर शिविर

हमले के बाद डर से बोडो जनजाति के हज़ारों लोग शिविरों में शरण ले रहे हैं.

सोनापुर स्थित शिविर में आसपास के तीन गांव के लोग हैं. उन्हीं में से एक हैं- मंडलवारी.

मंडलवारी बताते हैं कि सरकार की ओर से कुछ खाना आया है, पर वह काफ़ी नहीं है.

मंडलवारी का कहना है, "हम तो गांव से सब्ज़ी, दाल लाकर खा रहे हैं."

पिछले दो दिनों में कोकराझार, सोनितपुर, चिरांग या उदालगुरी ज़िलों में कोई नई हिंसक घटना नहीं घटी है, लेकिन लोग अभी भी डरे हुए हैं.

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