बम धमाका: बार-बार बेंगलूरु ही क्यों?

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भारत की तकनीकी राजधानी कहे जाने वाले बेंगलूरु शहर में हाल में हुए बम धमाके के बाद इसके कारणों की पड़ताल की जारी है.

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बेंगलूरु में धमाकों का मक़सद, देश के दूसरे हिस्सों की तरह लोगों की जान लेने से अधिक, उनमें डर पैदा करना और प्रचार करना है.

ऐसा नहीं है कि इस तरह की वारदात बेंगलूरु में पहली बार हुई है. साल 2008 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस में हुए एक मामले में एके-47 से गोली चलाई गई थी.

2005 से इस शहर में सिलसिलेवार तीन बम धमाके हुए थे. ख़ास बात ये थी कि सभी बम धमाके कम तीव्रता वाले थे जिनमें दो लोगों की मौत हुई जबकि कई घायल हुए.

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बंगलूरु में हुए धमाकों में एक असामान्य सी बात इनकी तारीख़ों से भी जुड़ी हुई है.

ये धमाके तक़रीबन मिलती-जुलती तारीख़ों पर हुए हैं जो इन चरमपंथी हमलों की जांच कर रहे विशेषज्ञों को एक नई दिशा दिखा रहे हैं.

इनमें से चार धमाके 2010 और 2013 की 17 अप्रैल को या 2005 और 2014 की 28 दिसंबर को हुए. हालांकि इसका एक अपवाद भी है. एक धमाका 25 जुलाई 2008 को हुआ था.

कर्नाटक के पूर्व इंटेलिजेंस महानिरीक्षक गोपाल होसुर ने बीबीसी को बताया, "कल के धमाके और 17 अप्रैल 2013 को बीजेपी दफ़्तर के सामने हुए धमाके ये संदेश देते लगते हैं कि वे अब भी यहीं कहीं हैं."

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उनका कहना है, "कम तीव्रता वाले बम धमाकों के पीछे कई तकनीकी वजहें हो सकती हैं या फिर ये भी हो सकता है कि उनकी ऐसी ही योजना हो. लेकिन हमें इस बात पर नज़र रखने की ज़रूरत होगी कि इस धमाके से वो क्या संदेश देना चाहते हैं."

एक सरकारी अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, "यह क़िस्मत की ही बात है कि धमाके कम तीव्रता वाले थे. ये सच है कि 25 जुलाई के धमाके हों या कल के धमाके, लोगों की जानें गई हैं. लेकिन मृतकों की संख्या दूसरे शहरों में होने वाली घटनाओं की तरह बड़ी नहीं हैं. ऐसा भी हो सकता है कि वे अपनी क्षमता का जायज़ा ले रहे हों. किसी बात को नकारा नहीं जा सकता."

नज़र रखने की ज़रूरत

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Image caption बेंगालूरु बम धमाके में मारी गई महिला के परिजन.

कर्नाटक के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसटी रमेश कहते हैं, "किसी को डराना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. कम तीव्रता वाले बम धमाकों में आईईडी अलग-अलग तरीक़े से बनाये जा सकते हैं."

उन्होंने कहा, "आख़िरकार बम किसी मशीन पर नहीं बनाए जाते. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहां तीन तरह के चरमपंथी संगठन हैं जिन पर नज़र रखने की ज़रूरत है."

रमेश कहते हैं, "यहां इस्लामिक स्टेट, इंडियन मुजाहिदीन और अल-उम्मा हैं. किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले हमें निश्चित रूप से सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए."

अल-उम्मा का नाम 1998 में हुए कोयम्बटूर बम धमाके और 2013 में बेंगलूरु में बीजेपी दफ़्तर के बाहर हुए धमाके से जोड़ा गया था.

भाग्यशाली?

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Image caption बेंगालूरु में हुए बम विस्फोट में मारी गई महिला के परिजन.

एक अन्य आला अधिकारी नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताते हैं, "ऐसा नहीं है कि चरमपंथी संगठन कम तीव्रता वाले धमाके करना चाहते थे. कई बार ऐसा होता है कि बम का टाइमर किसी ख़राबी की वजह से काम नहीं करता या फिर बम ग़लत जगह पर रखा गया. 25 जुलाई के ब्लास्ट में बड़ी मात्रा में विस्फोटक इस्तेमाल किए गए लेकिन टाइमर ने ठीक से काम नहीं किया."

उन्होंने बताया, "17 अप्रैल 2010 को चिन्नास्वामी स्टेडियम में आईपीएल मैच के दौरान हुए धमाकों में बम को ठीक से नहीं रखा गया था. इस लिहाज़ से बेंगलूरु भाग्यशाली रहा है."

दिलचस्प बात ये है कि 25 जुलाई 2008 को हुए ब्लास्ट में पुलिस जिन लोगों का हाथ बताती है वे सभी केरल के एक संगठन से जुड़े हैं.

हताहतों की संख्या

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इसके ठीक एक दिन बाद अहमदाबाद और सूरत में सीरियल ब्लास्ट हुए थे जिनकी तीव्रता कहीं अधिक थी.

बेंगलूरु के चर्च स्ट्रीट पर रविवार को हुए धमाके के बारे में एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "इसमें इस्तेमाल किए गए बम को यहीं कहीं तैयार किया गया था लेकिन इसे बेहद ही पेशेवराना तौर पर अंजाम दिया गया."

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Image caption बम धमाके में घायल हुआ एक व्यक्ति.

वे कहते हैं, "पैकिंग में जिस अख़बार का इस्तेमाल किया गया, वह एक दिन पहले का तेलुगु दैनिक था. विस्फोटकों में सल्फ़र भी ज़्यादा था ताकि लोग बड़ा धमाका सुन सकें. अगर वहां ज़्यादा लोग इकट्ठा हुए होते तो हताहतों की संख्या ज़्यादा हो सकती थी."

विभिन्न पुलिस अधिकारियों और पूर्व जाँचकर्ताओं की बातों से लगता है, "बेंगलूरु लोगों का ध्यान जल्दी खींचता है और यह बात चरमपंथी संगठनों को पता है."

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