मेरिट-पुलिस, मोरल-पुलिस और हिन्दी उपन्यास

  • 31 दिसंबर 2014
हिन्दी उपन्यास 2014

अस्सी के दशक तक, ठंडी लड़ाई के दिनों में, साहित्य की हिंदी दुनिया एक सवर्ण, पौरुष मध्यवर्गीय डोमेन थी जिसमें मेरिट-पुलिस और मोरल-पुलिस उसे सरगर्म रखते थे.

लेकिन ऊपर से विचारधारात्मक नीति-निर्देशकों या आचार संहिता से संचालित होता हुआ दिखने वाला यह डोमेन, अक्सर एक फ्यूडल, जातिवादी, सेक्सिस्ट, और मेरिटोक्रेट डोमेन था जिसमें कई छोटे-छोटे समूह एक दूसरे से साहित्य में मेरिट या मोरेलिटी के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे.

एक किताब का किसी बिस्तर के सिरहाने होना

डोमेन में श्रेष्ठता का संवेग आज भी बहुत गहरे तक है, बाजदफ़ा श्रेष्ठता ग्रंथि भी - किसी लेखक/कृति के महत्व प्रतिपादन के लिये जो विशेषण लगातार, लगभग आदतन काम में लिये जाते थे/हैं - 'महत्वपूर्ण' कवि, 'सबसे महत्वपूर्ण' कहानी संग्रह, 'बड़ा' कवि, हिन्दी के 'शीर्ष-स्थानीय' लेखक, 'शीर्षस्थ' उपन्यासकार आदि – वे श्रेष्ठता के साथ साथ ‘विशिष्टता’ और "सत्ता" के संवेग से भी नियमित हैं.

रियल स्टेट का रूपक

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एक पुस्तक को प्रस्तावित ही इस तरह किया जाता था/है कि वह 'साहित्य संसार' में कितनी 'महत्वपूर्ण' है, एक लेखक के लिए सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा/उपलब्धि/राहत की बात ही यह होती थी/है कि उसका 'साहित्य में' 'एक महत्वपूर्ण स्थान' मान लिया गया है.

हिन्दू संयुक्त परिवार की तरह काम करने वाला यह डोमेन मानो धीरे-धीरे रियल स्टेट के रूपक में बदल गया.

और इस सबके प्रमाण इसके किरदार रहे लोगों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ़ लगाये गए आरोपों, चलाये गये अभियानों, उनके द्वारा लिए गये सार्वजनिक फैसलों और सबसे ज्यादा उनके द्वारा लिखी गयी 'आलोचना'/ 'समीक्षा' में और 'आलोचक' की अरसे तक रही और अब समाप्तप्राय: 'केन्द्रीयता' में हैं.

तनातनी के नए संस्करण

नब्बे के दशक में सांप्रदायिक फासीवाद के विस्फोटक उभार और उसके समांतर स्त्री और दलित द्वारा अपना स्पेस खुद क्लेम करने ने कभी-कभी इस डोमेन को अपने सामान्य नियम कायदों से अलग आचरण के लिए मजबूर किया लेकिन जैसा यह बीतता साल भी गवाह है इसका पारंपरिक सत्ता-तंत्र, इसकी कैनन-मशीनरी और शर्म और अपराधबोध के डबल-ट्रैप पर काम करने वाली मनोवैज्ञानिक पारिस्थितकी अभी भी मज़बूत है.

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जिस साल भारत में एक निर्णायक सत्ता परिवर्तन ही नहीं हुआ, उसके होने की प्रक्रिया में समूची समाजी और राजनैतिक सरंचना में दूरगामी बदलाव हुए उस साल हमने मेरिट-पुलिस और मोरल-पुलिस की तनातनी के नए संस्करण, अक्सर एक नए इलाके - वर्चुअल स्पेस - में देखे.

हिन्दी साहित्यः कहानी-उपन्यासों से इतर...

हमने पिछले सालों की तरह इस साल भी एक ही 'अपराध' - 'गलत' राजनीति या 'खराब' एस्थेटिक्स - के लिए 'अपनों' का बचाव और 'गैरों' पर आक्रमण देखा.

2014 तक आते वर्णाश्रमी मेरिटोक्रेसी एस्थेटिक नस्लवाद (=ब्राहमणवादी जातिवाद) में, स्त्री और दलित आवाजों के विरोध में और मोरल पुलिसिंग साहित्य के अलावा कुछ न कर पाने के अपराधबोध के कैथार्सिस में बदलती हुई लग रही है.

यह सब लिखते हुए उन चीज़ों का अहसास है जो इस सब के विरोध या असहमति में रही हैं और हैं, जो सकारात्मक रही हैं और हैं लेकिन रोना इसी बात का है कि हम उन चीज़ों को प्रभावी सामूहिक प्रयत्नों में नहीं बदल पा रहे हैं.

बहुरंगी 'हिंदी एस्थेटिक्स'

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स्पष्ट है कि मेरे लिए 'श्रेष्ठ' पुस्तकों की सूची बनाने के लिए सहमत होना या उनके 'श्रेष्ठ' होने के कारण बयान करना संभव नहीं है.

बीबीसी हिन्दी ने मुझे पाँच फिक्शन किताबों पर बात करने के लिए कहा है.

मैं उपन्यास पर फोकस करके कुछ बातें कहना चाहता हूँ क्यूंकि बावजूद इसके कि इस समय भी 'ग्लोबल स्टैण्डर्ड' पर हिंदी उपन्यास को अपरिपक्व (इस आधार पर हर 'हिंदी चीज़' को कमतर मानने की मूलतः औपनिवेशिक लेकिन अपने नए 'अवतार' में उत्तर-उदारीकरण श्रेष्ठता-ग्रंथि है) मानने का एक चलन इस डोमेन में है, एक समाजी/साहित्यिक/राजनैतिक पाठ के रूप में हिंदी उपन्यास ने अलग-अलग ढंग से व्यक्तियों और समाजों की कहानी कहने की कोशिश की है, उनकी नयी आस्तित्विक (जिससे समाजी/राजनैतिक लगभग अविभाज्य है) परिस्थितियों का अन्वेषण, उद्घाटन किया है और एक बहुरंगी 'हिंदी एस्थेटिक्स' बनाया है.

इस साल रणेन्द्र के 'गायब होता देश', रवि बुले के 'दलाल की बीवी', अखिलेश के 'निर्वासन', विनोद भारद्वाज के 'सेप्पुकु' और हरे प्रकाश उपाध्याय के 'बखेड़ापुर' ने मुझे उन उपन्यासों से बहस करने के लिए और इस प्रक्रिया में खुद अपने आप से बहस करने की प्रक्रिया में काफ़ी शिद्दत से शामिल किया.

त्रासदियों की कथा

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रवि बुले का उपन्यास 'पॉपुलर' श्रेणी के उपन्यास की तरह 'पैकेज' किया गया है - उसका आवरण, उसका विज्ञापन और उसकी प्लेसिंग इसी तरह की गयी है लेकिन यह ऐसा उपन्यास है जो हिंदी पॉपुलर जानर को बदल सकता है. यह मुंबई की कहानी उसमें घटित हो रही कई त्रासदियों से कहने की कोशिश करता है और इस जानर में समाजी सचाइयों की खोज और लेखकीय प्रतिबद्धतता के निवेश की एक सम्भावना प्रस्तुत करता है.

2014: नारीवादी हिन्दी साहित्य

'सेप्पुकु' भी बुले के उपन्यास की तरह एक नए मिजाज़ का 'थ्रिलर है जो पेंटिंग की हाई-ब्रो दुनिया के संगठित अपराध में और कला/ कलाकार के एक फेक, एक कमोडिटी, एक सह-अपराधी में बदल जाने को एक इनसाईडर-स्टोरी की तरह (कथा-वाचक को अपराध में शामिल करते हुए) कहता है.

हिंदी के साहित्य डोमेन के बारे में ऐसा कोई उपन्यास लिखे जाने की सम्भावना कभी 'लेकिन दरवाज़ा' में दिखी थी. 'सेप्पुकु' में लेकिन उम्मीद का कोई दरवाज़ा नहीं है. एक क्रूर दुनिया के बारे में यह लगभग क्रूर ढंग से कैंडिड किताब है.

'बखेड़ापुर' गाँव की रूमानी अवधारणा/एग्जोटिका और उसके उसके दैनिक यथार्थ के टकराव के साथ-साथ लेखक द्वारा एक स्त्री के राजनैतिक सत्ता क्लेम करने की प्रक्रिया को बिना आख्याता के पोलिटिकल हुए देखने-लिखने की प्रक्रिया में बना एक खुला, वध्य पाठ है जिससे खूब बहस की जानी चाहिए.

बेदखली का आख्यान

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अखिलेश का 'निर्वासन' अपने उपशीर्षक 'समय, समाज, भावनाओं की बेदखली का आख्यान' (जो किसी समाजविज्ञानी का सुझाया लगता है) से आपको किताब न पढ़ने के लिए उकसाता है और इस किताब से आपकी लंबी बहस इस तरह यहीं से शुरू हो जाती है.

जहाँ से 'समय', 'समाज' और 'भावनाओं' की बेदखली हो जाए वह स्पेस 'समय', 'समाज' तो नहीं हो सकता - वह वैज्ञानिक रूप से मनुष्य का मस्तिष्क भी नहीं हो सकता. या तो वह कोई पूर्णतः तकनीकी/कोर्पोरेट स्पेस हो सकता है (यदि 'समय' का अर्थ ‘अपने समय से एक भावात्मक सम्बन्ध’ हो तो) या कोई 'आख्यान'.

2014: दलित साहित्य में क्या रहा खास

'निर्वासन' का पीढ़ियों और शताब्दियों के पार ग्रैंड-कथा कहने का प्रोजेक्ट औपनिवेशिक आधुनिकता से उपजे 'निर्वासन' और अन्याय के देसी रूपों पर एक दस्तावेज होने का है. इस प्रोजेक्ट के कई पूर्व-ज हैं और यह उपन्यास सवर्ण विक्टिमहुड के एक आख्यान के रूप में बहसतलब है.

प्रति-आख्यान

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ये चारों उपन्यास इन लेखकों के पहले उपन्यास हैं, 'गायब होता देश' रणेन्द्र का दूसरा.

'गायब होता देश' का कथावाचक/नायक एक सवर्ण 'विद्रोही' है और कथा मुंडा आदिवासियों की - इस परिप्रेक्ष्य में यह उपन्यास एक दूसरे छोर से, मेरी पढ़त में ज्यादा रेडिकल ढंग से, औपनिवेशिक, सवर्ण आधुनिकता के साथ उसके द्वारा दमित और हाशियाकृत समाज के संवाद और प्रतिरोध की कथा है, यह 'निर्वासन' का दमित आख्यान है.

साल 2014 के उल्लेखनीय कविता संग्रह

हम हिंदी डोमेन में प्रतिनिधित्व को लगातार समस्याग्रत होते हुए देख रहे हैं, खुद आदिवासी अपना आख्यान कहना शुरू कर चुके हैं.

भंते, भविष्य प्रतिनिधि-आख्यानों से नहीं प्रति-आख्यानों से बुना जा रहा है.

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