'कई पहलवान एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं'

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Image caption लीलू पहलवान(बाएँ) एक पुलिस अफ़सर से बात करते हुए.

कुश्ती की विशेष सीरीज़ के पाँचवें भाग में आपका परिचय एक ऐसे पहलवान से जिसने पहलवानी किसी मेडल के लिए शुरू नहीं की.

उन्होंने अपने गांव में रसूख और दबदबा बनाए रखने के लिए पहलवानी का दामन थामा.

(देखिए: तीन पहलवानों की तीन दास्तां)

किसी ज़माने में एक साथ देश के लिए पहलवानी का ख़्वाब पालने वाले तीन पहलवानों ने कुश्ती का इस्तेमाल अपने-अपने तरीके से किया.

पढ़ें, रिपोर्ट विस्तार से

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Image caption (बाएँ से दाएँ) महाबली सतपाल, रघुबीर पहलवान और लीलू पहलवान.

महाबली सतपाल ने जहां देश के लिए एशियाई खेलों में कुश्ती का स्वर्ण पदक जीता और पद्मश्री सम्मान हासिल किया. (महाबली सतपाल की कहानी यहां पढें)

वहीं, कुश्ती के कुछ मेडल लेकर पुलिस की नौकरी हासिल करने वाले रघुबीर पहलवान का नाता अब कुश्ती से एक सुनहरी याद की तरह है. (रघुबीर पहलवान की कहानी यहां पढ़ें)

लेकिन एक तीसरे इंसान ने पहलवानी से कुश्ती की बजाए कुछ और हासिल किया. ज़िला बागपत के लीलू पहलवान ने न सिर्फ़ गांव सरपंच की कुर्सी हासिल की, बल्कि ज़िले की कई सहकारी समितियों के अध्यक्ष भी चुने गए.

उनके एक नहीं कई अखाड़े हैं और कई पहलवानों को वो अपने घर के अहाते में रखते हैं.

एनकाउंटर में मारे गए पहलवान

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सफ़ेद कपड़ों और खरखराती आवाज़ में एक पहलवान को वो पानी लाने का आदेश देते हैं और दूसरे से कुर्सी लगवाते हैं. ये ज़िला बागपत के गांव डगरपुर के मुखिया लीलू पहलवान हैं जो रघुबीर पहलवान को अपना गुरु मानते हैं.

लीलू कहते हैं, "रघुबीर जी के साथ हमने खूब दंड पेले हैं. लेकिन फिर वे पुलिस में चले गए तो उनका साथ छूट गया."

पहलवानी शब्द पर वो ज़ोर देते हुए कहते हैं, "हम तो तंदुरुस्त रहने के लिए पहलवानी कर रहे हैं. बाक़ी ये जो दबदबे और डर वाली बात है ये झूठ है. लोगों में हमारे लिए सम्मान है, इसलिए उन्होंने हमें सरपंच चुना है. पहलवानी कोई बदमाशी नहीं होती."

लेकिन बातों-बातों में लीलू पहलवान ये भी बता देते हैं कि उनके साथ के 13-14 पहलवान एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं, क्योंकि उनका मानना है लोग पहलवानों के ख़िलाफ़ झूठी शिकायत दर्ज कराते हैं.

लीलू बताते हैं, "लोग आते हैं कि पहलवान जी हमारी मदद करो कोई हमारा प्लॉट दबा कर बैठा है. अब पहलवान सीधा आदमी होता है. वो जाकर दो थप्पड़ लगा कर प्लॉट खाली करा देता है और फिर पुलिस उस बेचारे को पकड़ लेती है. अब इसमें पहलवान की क्या ग़लती है?"

कुश्ती के लिए यही योगदान

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जब हम लीलू पहलवान के गांव पहुंचे तो गांव में 51 लाख रुपए की इनामी राशि का एक दंगल हो रहा था. इसका आयोजन लीलू पहलवान करवा रहे थे. गांव के बैंक मैनेजर से लेकर थानाध्यक्ष तक सभी लोग यहां मौजूद थे और लीलू उन्हें आदेश देते नज़र आ रहे थे.

लीलू ने दंगलों का महत्व बताते हुए कहा, "दंगलों का भारतीय कुश्ती में बड़ा योगदान है. ये हमारे बच्चों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. ऐसी छोटी-छोटी कुश्तियों से ही भारत में मिट्टी की कुश्ती बची हुई है और यही कुश्ती को हमारा योगदान है."

लीलू साल में ऐसे दो से तीन दंगलों का आयोजन कराते हैं. भारत के अंतरराष्ट्रीय पहलवान जैसे राजीव तोमर, पवन सिंह इत्यादि भी यहां लड़ने आते हैं.

हम सीधे-सादे लोग हैं

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लीलू पहलवान पर भले ही बाहुबली होने का ठप्पा लगा हो, लेकिन उनका मानना है कि वो तो दूध बेचने वाले हैं. वो कहते हैं, "हम तो दूध के व्यापारी हैं और इसी से हमारी कमाई है, बाक़ी पहलवानी हमारा शौक़ है. इसे हम किसी तरह की राजनीति के लिए इस्तेमाल नहीं करते."

गांव के पाँच घरों के मालिक लीलू पहलवान के परिवार में उनका बेटा सिट्टू और भतीजा राजू भी पहलवानी कर रहे हैं. वो चाहते हैं कि ये भी देश के लिए मेडल जीतें, लेकिन ट्रेनिंग के अभाव में ऐसा होना मुश्किल है.

रघुबीर और सतपाल की याद में वो बस इतना ही कहते हैं, "रघुबीर जी का पूरा सम्मान है ये हमारे पिता जैसे हैं और सतपाल जी मॉडर्न कुश्ती के देवता हैं. उनसे मेरी तुलना ग़लत होगा."

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Image caption महाबली सतपाल पहलवान

लेकिन पीछे ख़ड़े कुछ पहलवान दबी ज़बान में लीलू पहलवान के लिए कहते हैं कि वो कुश्ती के देवता हैं तो बाहुबली जी कुश्ती के भगवान हैं.

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