वो पुल बनाते हैं और जिसे ले जाती है बरसात

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बिहार के भागलपुर शहर से थोड़ी दूरी पर गंगा के दियारा इलाक़े में जमुनिया धार बहती है.

धार के दोनों किनारों के बीस से अधिक गांव मोहनपुर के पास बने एक अस्थाई पुल के सहारे शहर से जुड़ते हैं.

यह पुल इस बात की अदभुत मिसाल है कि एक इंसान की लगन, समर्पण और मेहनत से कैसे हजारों ज़िंदगियां आसान हो जाती हैं.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

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भागलपुर शहर के लालूचक मोहल्ले से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर जमुनिया धार बहती है.

इस धार के मोहनपुर घाट पहुंचने पर सर पर गमछा बांधे धोती और ब्लेज़र में नाटे क़द के भुटकू मंडल ईंट के टुकड़ों को सर पर ढोकर धार में डालते दिखाई देते हैं.

वहां मौजूद ग्रामीणों बताते हैं कि भुटकू हर साल की तरह जमुनिया धार पर लगभग सौ फुट लंबे पुल को अंतिम रुप देने में लगे हैं.

दशकों पुराना जुनून

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पड़ोस के बुद्धुचक गांव के भुटकू बातचीत में बताते हैं कि वे पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से यह पुल बनाते आ रहे हैं.

इस जुनूनी काम की शुरुआत कैसे हुई. इस बारे में भुटकु कहते हैं, "मैं पहले पास के नाथनगर इलाक़े में सब्ज़ी बेचा करता था. फिर समाज के कहने पर मैं जमुनिया धार में नाव चलाने लगा."

वे आगे बताते हैं कि फिर जब जमुनिया धार में पानी कम हुआ तो समाज के कहने पर ही मैंने इस पर पुल बनाना शुरु किया.

सबसे बड़ी बात यह है कि भुटकू हर साल पुल यह जानते हुए बनाते हैं कि बरसात में इसे बह जाना है.

सामुदायिक मदद

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कई ग्रामीण भी पुल के लिए ज़रुरी सामान मुहैया कराते हैं. जैसा कि लालूचक के राजहंस मंडल बताते हैं, "मैंने इस बार पुल के लिए सीमेंट की पाइप और ईंटें लाकर दी हैं. आगे ज़रुरत पड़ेगी तो पुल के लिए मिट्टी और बालू भी लाकर दूंगा."

कुछ गांव वाले कभी-कभार पुल के लिए श्रमदान भी करते हैं लेकिन पुल बनाने की पूरी ज़िम्मेदारी भुटकू की ही है.

इतना ही नहीं पुल बन जाने के बाद इसकी मरम्म्त भी भुटकू ही करते हैं. और फिर बरसात में जब यह पुल डूब जाता है तो भुटकू अपनी नाव से लोगों को पार भी उतारते हैं.

अब यह इलाक़ा नगर निगम का हिस्सा है. इस पुल के बारे में पूछे जाने पर भागलपुर की उप महापौर प्रीति शेखर कहती हैं, "अगर क्षेत्र के लोग पुल निर्माण के लिए मदद मांगेगे तो इस पर नगर निगम गंभीरता से विचार करेगा."

सुविधा

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पुल से ज़िंदगी कैसे आसान हो जाती है. इसे लालूचक के सुनील कुमार की बातों से समझा जा सकता है.

सुनील बताते हैं, "इस पुल के सहारे ही दोनों किनारों के हज़ारों एकड़ खेतों में फसल उपजती है. साथ ही बीमारी और प्रसव जैसी आपात स्थिति में इस पुल का महत्त्व और बढ़ जाता है."

दूसरी ओर भुटकू द्वारा बनाए जा रहे पुल से लगभग सात सौ मीटर पश्चिम में लगभग छह करोड़ की लागत से एक पुल बन कर तैयार खड़ा है. लेकिन बीते लगभग तीन सालों से संपर्क पथ से नहीं जुड़ने के कारण यह बेकार पड़ा है.

भागलपुर के उप विकास आयुक्त चंद्रशेखर सिंह के अनुसार संपर्क पथ के लिए जरुरी भूमि अधिग्रहण का कार्य जल्द ही पूरा कर सड़क निर्माण शुरु किया जाएगा.

मेहनताना

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भुटकू जमुनिया धार पर हर मौसम में ड्यूटी करते हैं. इसके एवज़ में उन्हें मिलता क्या है? उनका घर-परिवार कैसे चलता है?

इसके जवाब में भुटकु बताते हैं, "नकद शायद ही कोई देता है. कोई अनाज देता है तो कोई सब्ज़ी. घरेलू उपयोग के बाद जो अनाज और सब्ज़ी बचती है उसे बेचकर घर की बाक़ी ज़रुरतें पूरा करते हैं."

भुटकू के मेहनताने से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि उन्हें अमूमन अनाज मांगने घर-घर जाना पड़ता है. भुटकू बताते हैं कि बुढापे में अब वे अनाज मांगने ज़्यादा घरों में जा भी नहीं पाते.

सम्मान

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पुल वाला इलाक़ा अब भुटकू घाट के नाम से भी जाना जाता है. यह सम्मान भुटकू के लिए जीवन की सबसे बड़ी कमाई की तरह है.

बातचीत में इस सम्मान और पहचान से मिलने वाली ख़ुशी उनके आवाज़ के उतार-चढ़ाव में भी महसूस होती है.

वे कहते हैं, "सब उन्हें दादा, बाबू, नाना कह कर बुलाते हैं. यह बहुत इज़्ज़त की बात है पूरे इलाक़े के लोग कहते हैं कि भुटकू घाट ठीक है."

और इसी इज़्ज़त से मिली उर्जा के साथ अपनी मेहनत, जुनून और ग्रामीणों के थोड़े सहयोग से भुटकू पिछले 25 सालों से अधिक समय से हजारों लोगों की ज़िंदगी आसान बना रहे हैं.

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