116 साल पुराने स्कूल पर संकट

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पटना साहिब गुरुद्वारा के पास स्थित क़रीब 116 साल पुराने स्कूल पर संकट मंडरा रहा है.

इस स्कूल को सरकार दूसरी जगह स्थापित करना चाहती है, इससे यहां पढ़ने वाली 5000 छात्राओं का भविष्य दांव पर लग गया है.

आख़िर सरकार इस स्कूल को दूसरी जगह क्यों भेजना चाहती है और इस स्कूल को हटाने का फ़ैसला क्यों लेना पड़ा.

संकट में स्कूल, पढ़ें ख़ास रिपोर्ट

"दीदी, गुरुद्वारे के लिए हमारा स्कूल क्यों उठाया जा रहा है, सबसे बड़ा मंदिर तो विद्यालय ही है न."

17 साल की दुबली-पतली त्राना इस कंपकंपाने वाली ठंड में पतला सा स्वेटर और हवाई चप्पल पहनकर स्कूल आईं थीं. उनके पिता कॉपी–किताब छापने वाले प्रेस में मज़दूरी करते हैं. चार बहनें और एक भाई के परिवार में दो वक़्त की रोटी ही मुश्किल से जुटती है, ऐसे में पढ़ाई के बारे में सोचना ही बेमानी है.

खुशकिस्मती से त्राना के घर से कुछ दूरी पर स्कूल है. वो पटना सिटी के नारायणी कन्या उच्च विद्यालय में दसवीं की छात्रा हैं, लेकिन उन्हें अब अपने स्कूल को किसी दूसरी जगह ले जाने की ख़बर मिल रही है तो उनको आगे पढ़ने की उम्मीदें ख़त्म होती सी लग रही हैं.

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दरअसल पटना सिटी की कचौड़ी गली स्थित नारायणी कन्या विद्यालय से कुछ दूरी पर सिखों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र पटना साहिब गुरुद्वारा है.

गुरुद्वारे को जगह

साल 2017 में सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती है. इस मौक़े पर लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं के आने की संभावना है. उनके ठहरने के लिए कमरे, पार्किंग वगैरह बनाए जाने हैं.

गुरुद्वारे को यह जगह देने के लिए सरकार इस स्कूल को यहां से शिफ़्ट करना चाहती है. शहर के अनुमंडल पदाधिकारी केके प्रसाद के मुताबिक़, "सरकार का प्रस्ताव है कि स्कूल को कहीं और भेज दिया जाए ताकि 2017 के लिए मुकम्मल तैयारी की जा सके."

त्राना की तरह ही निकिता की किस्मत में भी तालीम जद्दोजहद के बाद आई है. 16 की उम्र में ही वो ब्याह दी गईं. ससुराल वाले उनकी पढ़ाई के ख़िलाफ़ हैं. इसके बावजूद वो इस स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रखे हैं.

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वह पूछती हैं, “स्कूल यहां से चला जाएगा तो पढ़ाई बंद हो जाएगी. कौन पढ़ाएगा तब मुझे?”

पढ़ने का संकट तो आठ साल की मासूम संतोषी पर भी मंडरा रहा है. वह दोनों पांव से अशक्त हैं. उसके मज़दूर पिता रोजाना उन्हें गोद में उठाकर स्कूल ले जाते हैं और मां स्कूल की छुट्टी के बाद ले आती हैं.

5000 छात्राओं का सवाल

पिता रितेश कुमार शर्मा के चेहरे पर बिटिया के अनपढ़ रह जाने का डर साफ़ झलकता है.

"यहां स्कूल पास है तो ले जाते हैं, लेकिन अगर दूर चला गया तो मैं काम पर जाऊंगा या बच्ची को स्कूल लेकर. पेट की भूख तो स्कूल से ज़्यादा बड़ी है न."

त्राना, निकिता, संतोषी जैसी नारायणी कन्या विद्यालय की 5000 छात्राएं आजकल इसी कशमकश में हैं.

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सन् 1899 में एक हलवाई परिवार की बहु राम कुंअर देवी ने अपनी 10 कठ्ठा जमीन दान देकर इस स्कूल को शुरू किया था.

राम कुंअर देवी के अलावा स्थानीय लोगों ने भी स्कूल की इमारत खड़ी करने के लिए बढ़ चढ़कर दान दिया था.

कोशिशें

1938 में स्कूल को मिडिल और 1962 में हायर सेकेंड्री की मान्यता मिली. स्कूल को ज़मीन दान देने वाले परिवार में भी सरकारी फ़ैसले को लेकर गहरी नाराज़गी है. 85 साल की सावित्री देवी दानकर्ता राम कुंअर देवी की बहु हैं.

सावित्री कहती हैं, "जीवन जब तक है तब तक मैं स्कूल के लिए लड़ूंगी."

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स्थानीय लोगों ने भी मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को पत्र लिखकर स्कूल बचाने की मांग की है. इसके अलावा पटना जिला सुधार समिति ने स्कूल के भविष्य को लेकर सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी है.

वहीं स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक भी छात्राओं के भविष्य को लेकर डरे हुए हैं.

नारायणी मिडिल स्कूल के टीचर ललित किशोर कहते हैं, "पचास फीसदी लड़कियां पढ़ाई छोड़ देंगी. आसपास के चार किलोमीटर के दायरे में लड़कियों का कोई स्कूल भी नहीं है."

बिहार सरकार ने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पोशाक और साइकिल जैसी योजनाएं शुरू करके देश भर में वाहवाही लूटी थी, लेकिन इस मसले पर सरकार की तरफ से आश्चर्यजनक चुप्पी कुछ और बयां कर रही है.

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