क्या पहलवान दो दिन में बांधते हैं लंगोट?

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बीबीसी हिन्दी ने एक विशेष सीरीज़ के तहत कुश्ती और उससे जुड़े अनेक पहलूओं को आपके सामने प्रस्तुत कर रही है. सिरीज़ की इस कड़ी में कुश्ती और पहलवानों से जुड़े कुछ मिथकों को जांचने की कोशिश की गई.

इसमें हमारी मदद की वर्तमान में भारत के लिए कुश्ती में दो ओलिंपिक पदक जीतने वाले पहलवान सुशील कुमार ने.

क्या पहलवानों के लिए ब्रहमचर्य का पालन करना बेहद ज़रूरी होता है या यह केवल एक मिथक है?

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ये बात सही है कि ब्रह्मचर्य के पालन से एक पहलवान में निष्ठा आती है वो डिसिप्लिन में आता है लेकिन सिर्फ़ ब्रह्मचर्य से काम नहीं चलता और न ही ये कोई अनिवार्यता है. ब्रहमचर्य के साथ साथ अच्छी डाईट और प्रॉपर ट्रेनिंग भी बहुत ज़रूरी है.

बीते वक़्त में ऐसे लंगोट भी होते थे जिन्हें बांधने में दो दिन लग जाते थे क्या ये सही है?

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नहीं ये एक कहावत है जो कि नए बच्चों को खींचने के लिए बोली जाती है. दरअसल लंगोट बांधने का एक विशेष तरीका होता है वर्ऩा ये कुश्ती के दौरान खुल जाता है. जिन पहलवानों को इसे बांधना नहीं आता वो इसमें काफ़ी देर उलझे रहते थे. तब कहा जाता है कि ये दो दिन में लंगोट पहनता है, कुश्ती न जाने कब लड़ेगा.

क्या पहलवानों के कान तोड़े जाते हैं?

नहीं कान तोड़े नहीं जाते टूट जाते हैं. ये एक प्रक्रिया है, दरअसल अत्यधिक परिश्रम करते समय शरीर का तापमान एक विशेष स्तर पर पहुंचने पर आपके कान पर लगा हल्का सा हाथ भी आपकी रक्त कोशिकाओं को फाड़ सकता है या आपकी कान की हड्डी को तोड़ सकता है.

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कान में ख़ून भर जाने से कान की बनावट में बदलाव आ जाता है लेकिन पहलवा इसका इलाज नहीं करवाते क्योंकि इलाज के बाद ये फिर टूट सकते हैं लेकिन टूटे रहने पर इनमें कोई समस्या नहीं होती. अंग्रेज़ी में इसे कॉलीफ़्लावर ईयर भी कहते हैं यानि गोभी के फूल जैसे कान.

कुछ पहलवान टूटी हड्डियों को जोड़ने कि दुकान खोल लेते हैं और फिर पट्टियां करके चोट ठीक करने का दावा करते हैं क्या ये सही है?

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देखिए कुछ चोटें वो ठीक कर सकते हैं क्योंकि पहलवानी में चोट लगना और फिर आर्युवेदिक तरीके से उसका उपचार करना सामान्य बात है. कई बार कुश्ती करते समय मोच आ जाती है या कंधा उतर जाता है. एक पहलवान को शारिरिक संरचना का इतना ज्ञान होता है कि वो खुद ही इसे ठीक कर लेते हैं तो हां कुछ पहलवान ऐसा कर सकते हैं.

क्या ये बात सही है कि पहलवान बहुत ज्यादा खाते हैं?

सरासर ग़लत है. पहलवानों को अपने वज़न को लेकर बेहद सतर्क रहना होता है. आपके वज़न में 100 ग्राम की तब्दीली भी आपको गलत भार वर्ग में ला सकती है, जिससे उसे मुश्किल हो सकती है.

एक पहलवान ज़्यादा खा ज़रूर सकता है लेकिन अच्छा पहलवान ऐसा कभी नहीं करेगा.

क्या अखाड़े की मिट्टी में औषधीय गुण होते हैं या ये सिर्फ़ एक किंवदंती?

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ये कहना ग़लत होगा कि ऐसा नहीं है. लेकिन हर अखाड़े कि मिट्टी में ऐसा हो ये बात भी नहीं है. दरअसल किसी भी अखाड़े में मिट्टी डालते समय उसमें हल्दी, तेल, मेंहदी को भर भर कर मिलाया जाता है ताकि वो नरम रहे और शरीर की चोट को ठीक करे.

पहले के जमाने में अखाड़े कि मिट्टी में दूध या मठ्ठा भी मिलाया जाता था और कई बार चोट लगने पर अखाड़े की मिट्टी के लेप से चोट ठीक हो जाती थीं लेकिन ये सही है कि आजकल ऐसा नहीं है क्योंकि अखाड़े में अब सामान्य मिट्टी मिलाई जाती है जिसमें सिर्फ़ पानी होता है

क्या डब्लयूडब्लयूई की कुश्तियां भी असली होती है?

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अगर आप पूछेंगे कि क्या वो सच में लड़ते हैं तो जवाब है, हां वो लड़ते हैं लेकिन दिखावे के लिए. वो सिर्फ़ प्रदर्शन है और विजेता कौन होगा ये पहले से तय होता है वर्ना जो दांव को वो लगाते हैं उन दांव से भारी से भारी पहलवान भी ज्यादा देर नहीं चल सकता.

मेरे गुरु और ससुर महाबली सतपाल को भी ऐसी कुश्ती का अनुभव है लेकिन वो भी इसे छोड़ आए थे क्योंकि वहां नतीजे पहले से तय होते थे. लेकिन हां वो लड़ते हैं और उन्हें चोट भी सच में लगती है.

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