पाकिस्तानः सैन्य अदालत के गठन का विरोध

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

पेशावर के आर्मी स्कूल में बच्चों के क़त्लेआम के बाद चरमपंथियों के मामलों की सुनवाई के लिए पाकिस्तान में सैन्य अदालतों के गठन पर विचार किया जा रहा है. सरकार के इस क़दम पर नागरिक संगठन आपत्ति जता रहे हैं.

प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता और बौद्धिक चिंतक इस क़दम का यह कह कर विरोध कर रहे हैं कि सैन्य अदालतों में पर्याप्त पारदर्शिता मुश्किल होगी.

लेकिन नवाज़ शरीफ़ सरकार ने कहा है कि इन अदालतों में सब कुछ व्यवस्था के अनुरूप होगा.

पढ़ें लेख विस्तार से

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

पाकिस्तान के पेशावर के एक आर्मी स्कूल में 16 दिसंबर के तालिबानी हमले के बाद उठाए गए कई क़दमों में पाकिस्तान सरकार सैन्य अदालत के गठन पर भी विचार कर रही है.

पाकिस्तान इन दिनों आंतरिक हिंसा का सामना कर रहा है. साउथ एशिया टूरिज़्म पोर्टल के मुताबिक़ बीते एक दशक में चरमपंथी हिंसा में 56 हज़ार लोगों की मौत हुई है.

पेशावर आर्मी स्कूल की घटना के बाद सेना ने चरमपंथियों पर कार्रवाई शुरू कर दी. प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने आठ साल से मृत्युदंड पर चली पाबंदी भी हटा ली.

इसके बाद मानवाधिकार समूहों की अपील के बावजूद कई लोगों को फांसी दी गई.

माना जा रहा है कि पाकिस्तानी संसद दो सालों के लिए सैन्य अदालत को मंज़ूरी दे सकती है.

सेना प्रमुख की भूमिका

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

चरमपंथी हिंसा पर क़ाबू पाने के उपायों पर राजनीतिक दलों में पिछले कुछ सालों में कोई सहमति नहीं बन पाई है.

देश के अंदर लोकतंत्र और मानवाधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता लंबे समय से चरमपंथियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे थे लेकिन तब सरकार ने कोई क़दम नहीं उठाया.

संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ आबिद हसन मिंटो ने कहा, "सैन्य अदालतें इसलिए बनाईं जा रही हैं क्योंकि सेना प्रमुख इस बात से नाराज़ हैं कि आर्मी स्कूल को निशाना बनाया गया."

मिंटो आगे कहते हैं, "हम उनका ग़ुस्सा समझ सकते हैं लेकिन हमने वह ग़ुस्सा तब तो नहीं देखा था जब एक सौ से ज़्यादा शियाओं की क्वेटा में हत्या हुई थी या फिर बीते साल पेशावर में 127 ईसाई लोगों को एक चर्च में मार दिया गया था."

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का विरोध

इमेज कॉपीरइट AP

मिंटो उन 80 कार्यकर्ताओं में शामिल हैं जो लाहौर स्थित दक्षिण एशियाई मुफ़्त मीडिया एसोसिएशन के कार्यालय में बीते सप्ताह जमा हुए थे.

ये लोग हाल की घटनाओं पर चर्चा के लिए जमा हुए थे, जिसमें सरकार द्वारा घोषित चरमपंथ के ख़िलाफ़ 20 सूत्री नेशनल एक्शन प्लान भी शामिल था.

पत्रकार और लेखक अहमद राशिद ने पारदर्शिता का सवाल उठाते हुए कहा, "सैन्य अदालत कितने गोपनीय होंगे? जो सबूत पेश किए जाएंगे क्या वे अदालत आने वाले सभी व्यक्तियों और दोनों तरफ़ के वकीलों को मिलेंगे. क्या ख़ुफ़िया एजेंसियों के सूबत को चुनौती दी जा सकेगी?"

हालांकि पाकिस्तानी सरकार का दावा है कि सबकुछ व्यवस्था के तहत होगा.

पाकिस्तान के गृह मंत्री चौधरी निसार अली ख़ान ने हाल ही में एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, "व्यवस्था होगी, नियमों का पालन होगा. सैन्य अदालत में ऐसा नहीं होगा कि जिसका मामला उसमें चलेगा उन सबको फांसी दे दी जाएगी."

पारदर्शिता पर सवाल

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

पाकिस्तान की मुख्यधारा के कुछ राजनीतिक दलों ने सैन्य अदालत के प्रस्ताव का पहले विरोध करते हुए कहा था कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ हो सकता है.

बीते सप्ताह सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने ये साफ़ कर दिया था कि सैन्य अदालत महज़ एक विकल्प नहीं है.

अगले दिन सभी राजनीतिक पार्टियों की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने की और उसमें राजनीतिक दलों ने सैन्य अदालत के गठन के लिए संवैधानिक संशोधन को रज़ामंदी दे दी.

शरीफ़ ने ये भी साफ़ कर दिया है कि इस मामले में संसद के अंदर बहस नहीं होगी. उम्मीद की जा रही है कि अगले कुछ दिनों में सैन्य अदालत के गठन संबंधित प्रस्ताव सदन में रखा जाएगा और उसे पास कर दिया जाएगा.

कई विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य अदालत के गठन से नागरिक सरकार की नाकामी का संदेश जाएगा.

इमेज कॉपीरइट epa

राजनीतिक टिप्पणीकार नजम सेठी कहते हैं, "यह दुर्भाग्य है कि देश में केवल सेना ही इकलौती संगठित संस्था है. हमारे राजनेताओं के पास न तो क्षमता है और न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति कि वे कोई वैकल्पिक नज़रिया रख सकें. यह बेहद निराश करने वाली बात है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार