इंडिया, भारत से अलग एक देश 'महाभारत' भी है

  • 7 जनवरी 2015

अमूमन कहा जाता है, हम एक देश के भीतर दो देश हैं- इंडिया और भारत. इंडिया शहरी लोगों का देश है, जिनके पास पैसा है, सुविधाएं हैं और ये तबक़ा अंग्रेजी दां है. भारत किसानों का देश है, मुफ़लिसी में रहने वालों और हिंदी या कोई अन्य भाषा बोलने वालों का देश है.

इन दोनों के अलावा एक और देश है, जो भौगोलिक तौर पर भले उपलब्ध ना हो लेकिन हमारे दिमाग़ में ज़रूर मौजूद है- महाभारत.

विस्तार से पढ़िए महाभारत के बारे में

महाभारत से मेरा मतलब महाकाव्य महाभारत से नहीं है. बल्कि मैं यहां बात कर रहा हूं उस समाज की जो भारत से दुनिया के दूसरे देशों में जाकर बसे लोगों से बना है.

यह क़रीब तीन करोड़ संपन्न लोगों का समाज है, ऑस्ट्रेलिया की आबादी से भी ज़्यादा और कनाडा के लगभग बराबर.

इस तबक़े के लोग दुनिया के हरेक देश में मौजूद हैं. संयुक्त राष्ट्र, कनाडा, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में अप्रवासी मज़दूरों में बड़ी संख्या में भारतीय शामिल हैं.

फ़िजी, सूरीनाम और गुयाना जैसे देशों में भारतीय मूल के लोग 150 साल पहले गिरमिटिया मज़दूर के तौर पर आए थे, लेकिन अब उनके उत्तराधिकारी इन देशों में शासन कर रहे हैं.

हम लोग ये महाभारत हर साल जनवरी में प्रवासी दिवस सम्मेलन के तौर पर मनाते हैं. ये समारोह राष्ट्रपिता बापू के भारत लौटने के सम्मान में मनाया जाता है. नौ जनवरी, 1915 यानी करीब सौ साल पहले, अधेड़ आयु की ओर बढ़ रहे वकील मोहन दास गांधी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे थे.

बापू का अप्रवासी जीवन

ये बात लोग भूल जाते हैं कि गांधी दक्षिण अफ़्रीका में 21 साल तक रहे, 24 साल से लेकर 45 साल तक. अपने जीवन का एक चौथाई हिस्सा उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में बिताया. वे हर मायने में अप्रवासी भारतीय ही थे.

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Image caption महात्मा गांधी और सरोजनी नायडू

वैसे, हमारे अधिकांश राष्ट्र निर्माता किसी ना किसी समय अप्रवासी भारतीय रहे थे. सरदार पटेल, पंडित नेहरू, क़ायदे आजम जिन्ना, बाबा साहब आंबेडकर और कई अन्य नेता विदेश गए और वहां लंबे समय तक रहे. हालांकि इनमें कोई गांधी जी जितना बाहर नहीं रहा. ये सब पश्चिमी शिक्षा हासिल कर वापस लौटे और ब्रिटिश शासन से संघर्ष किया.

1980 के दशक में, लोकसभा में एक सांसद ने सवाल पूछा था कि दुनिया भर के अलग-अलग देशों में कुल कितने भारतीय रहते हैं? संसद में, अगर किसी सांसद ने कोई सवाल पूछ लिया तो सरकार को उसका जवाब देना पड़ता है.

ऐसे में सांसद के सवाल का जवाब देने के लिए विदेश मंत्रालय ने दुनिया भर के भारतीय दूतावासों में फ़ैक्स भेजा (तब इंटरनेट का ज़माना नहीं था). तब मालूम हुआ था कि दुनिया के 180 देशों में भारतीय रहते हैं.

दुनिया भर में फैले भारतीय

अगर मुझे सही से याद है तो उस वक़्त आईसलैंड में चार भारतीय रह रहे थे और पैसिफ़िक महासागर में दूर-दराज़ वाले द्वीप वानूआतू में एक भारतीय थे.

मैं तब वानूआतू में रह रहे एक इकलौते ग़रीब भारतीय को लेकर ख़राब महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे यक़ीन है कि वह शख़्स आधा द्वीप ख़रीद चुका होगा और उसने परिवार और भाई बहनों को वहां बुला लिया होगा.

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मैं वातुमुल की कहानी बताता हूं. आज़ादी से पहले भारत के सिंध प्रांत के हैदाराबाद शहर में ईंट मुहैया कराने वाले कांट्रैक्टर के बेटे जमनादासा वातुमुल पहली बार 1900 में फ़िलीपींस की राजधानी मनीला में कपड़ा मिल में मज़दूर के तौर पर काम करने गए थे. फिर उन्होंने अपना रिटेल स्टोर खोल लिया.

पहले विश्व युद्ध के दौरान फ़िलीपींस की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई तो वातुमुल 1914 में हवाई पहुंच गए और उन्होंने एक छोटे से शहर में ईस्ट इंडिया स्टोर नाम से रिटेल की दुकान खोली. इस दुकान में वो रेशम और अन्य कपड़े बेचते थे.

अगले ही कुछ सालों में उनकी दुकान एक प्रमुख डिपार्टमेंट स्टोर में तब्दील हो चुकी थी. पर्ल हार्बर के हमले से भी उनके विकास पर असर नहीं पड़ा.

विदेशों में गाड़े झंडे

1950 के दशक में वातुमुल हवाई के सबसे अमीर आदमी बन गए. हवाई ही नहीं अमरीका में उनका परिवार गिने चुने परिवारों में शामिल हो गया.

वातुमुल फ़ाउंडेशन ने अमरीका में पढ़ने के लिए कई विद्वानों और बौद्धिकों को स्पॉंसर किया है, इनमें भारत के राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक शामिल थे.

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ये भी कहा जाता है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पिता को भी वातुमुल फ़ेलोशिप मिली थी. वातुमुल की विरासत को आज भी इंदरू और गुलाब वातुमुल आगे बढ़ा रहे हैं.

इस कहानी से साफ़ है कि पहले भारतीय केवल बंधुआ मज़दूर के तौर पर विदेश नहीं गए. वे पढ़ने और काम करने के लिए भी गए थे. विद्वान और कारोबारी के तौर पर भी गए थे, जैसे इन दिनों जाते हैं.

गांधी जी क़ानून की डिग्री के साथ 1893 में वकालत करने दक्षिण अफ़्रीका गए थे, ठीक उसी साल स्वामी विवेकानंद अमरीका गए थे.

इससे क़रीब एक दशक पहले, एक युवा महिला आनंदीबाई जोशी अमरीका के पेनसेल्विनिया के वीमेंस मेडिकल कॉलेज में पढ़ने गईं थी. वो भारत की पहली महिला डॉक्टर थी, हालांकि 1886 में भारत लौटने के तुरंत बाद उनकी मृत्यु हो गई थी और उन्हें इलाज करने का मौक़ा नहीं मिल पाया.

जेपी का अमरीका से नाता

1915 में, यानी क़रीब सौ साल पहले, प्रफुल्ल कुमार बोस ने आयोवा मेडिकल स्कूल में दाख़िला लिया था, बाद में वहां से उन्होंने स्नातक की उपाधि ली.

कुछ साल के बाद युवा जयप्रकाश नारायण (जी हां, जेपी आंदोलन वाले) भी आयोवा पहुंचे थे, उससे पहले वे कुछ समय तक ब्रेकेली स्थित कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में कुछ वक़्त बिता चुके थे.

लाला लाजपत राय, हरदयाल और ग़दर पार्टी के दूसरे नेताओं ने अमरीका में भारत को आज़ादी दिलाने का प्रण लिया था.

Image caption जयप्रकाश नारायण बीबीसी स्टूडियो में पूर्व बीबीसी संवाददाता मार्क टली के साथ.

एक अन्य युवा मानवेंद्र नाथ राय भी क़रीब सौ साल पहले स्टैंडफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचे थे.

अमरीकी गर्लफ्रैंड इवलिन ट्रेंट से रोमांस करते हुए उनकी दिलचस्पी मार्क्स में हो गई. उन्होंने भारत में अविभाजित भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना में अहम भूमिका निभाई, इससे पहले वे मैक्सिको में कम्यूनिस्ट पॉर्टी की स्थापना कर चुके थे.

दुनिया भर के क़रीब एक दर्जन देशों में भारतीय मूल के लोग राजनीतिक तौर पर काफ़ी सक्रिय हैं और इनमें कई जगहों पर भारतीय मूल के लोग नेतृत्व भी कर रहे हैं.

भारतीय कारोबारी के तौर पर भी बाहरी देशों में गए है. जमशेद जी टाटा की 1901 में अमरीका यात्रा तो मशहूर है. वे वहां के स्टील कारोबारी से मिलकर भारत में अत्याधुनिक तकनीक ले कर आए.

कई अन्य कारोबारी भी हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स में 1910 में पीडी पटेल का इंटरव्यू छपा था. पारसी समुदाय के पीडी पटेल सूती वस्त्र के कारोबारी थे और न्यूयॉर्क के अस्टर होटल में अपनी पत्नी के साथ ठहरे थे.

पलायन को मिलना चाहिए प्रोत्साहन

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न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाता ने पटेल दंपत्ति बारे में लिखा है, "दोनों धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोल सकते थे. दोनों ने बताया कि अपनी पहली अमरीका यात्रा को दोनों कितना एनज्वाय कर रहे हैं. मिसेज़ पटेल ने बताया कि न्यूय़र्क में काफ़ी शोर है. ऊंची इमारतें और लिफ़्ट भी हैं."

ऐसे ही लोगों के सम्मान में प्रवासी दिवस मनाया जाता है. भारत से पलायित करने वाले लोग भारत की संपदा में अहम योगदान दे रहे हैं.

प्रत्येक साल भारत विदेशों में रह रहे अपने लोगों से 70 अरब डॉलर की आमदनी करता है जो यहां होने वाले सालाना प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 42 अरब डॉलर से ज़्यादा है.

ऐसे में अगर अपने यहां लोगों को आर्थिक विकास के अवसर मुहैया नहीं करा सके तो उन्हें पलायित होने के लिए तो प्रोत्साहित कर ही सकते हैं.

दुनिया के कई देशों में आबादी लगातार घट रही है. रूस, यूरोप के कई देश और जापान इनमें शामिल हैं जबकि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में लोगों के मुक़ाबले ज़मीन काफ़ी ज़्यादा है. ऐसे में क़ानूनी ढंग से मान्य, काम काज पर आधारित पलायन संबंधित देशों के लिए फ़ायदे का ही सौदा है. प्रवासी दिवस पर, परमाणु समझौते की तरह ही प्रवासी समझौते पर विचार करना चाहिए.

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