'ऑफ़ेंड करना भी अभिव्यक्ति की आजादी'

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भारत में व्यंग और कार्टूनिंग पर जाने-माने कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर से बीबीसी हिंदी के विनीत खरे ने बात की. पेश हैं उनकी बातचीत मुख्य अंश.

सवाल: भारत में व्यंग और कार्टून में मज़ाक बनाना पश्चिम के मुकाबले कहाँ है? भारत में कार्टूनिस्ट एक सीमा से बाहर जाकर किसी पर मज़ाक नहीं करते.

आज अभी भी सांस्कृतिक मूल्यों के नज़रिए से हम विक्टोरियन (मध्यकालीन यूरोपियन) हैं. भारत की तो छोड़ दीजिए जब ब्रिटेन में विक्टोरियन मूल्य थे, तो वहां भी बहुत से निषेध थे. धीरे-धीरे उन्होंने सारा सिस्टम छोड़ दिया लेकिन हमने उन्हीं मूल्यों को अपना लिया, जिसे अब हम भारतीय मूल्य कहते हैं.

भारतीय मूल्यों में तो बहुत सारा खुलापन था. जो अभी हम मान रहे हैं ये यूरोपियन मूल्य संस्कृति है कि जनता में फ़लां-फ़लां बात नहीं कहनी चाहिए.

सवाल: क्या किसी का मज़ाक उड़ाना या उसे बगैर कपड़ों के दिखाना अश्लील माना जाएगा?

ये हमारी संस्कृति का दोहरापन है, हिप्पोक्रेसी. ये दरअसल उसी से आई है कि हम जनता में बहुत सारी ऐसी बातें नहीं कहना चाहते जो कहना ग़लत नहीं है क्योंकि हम कहते हैं कि इससे जनता की डिग्निटी पर फ़र्क पड़ेगा.

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सवाल: ये क्या आजादी के बाद हुआ?

लोग लोकतंत्र के प्रति जागरूक हुए तो उसका एक उल्टा नतीजा ये हुआ सबको लगने लगा कि मेरा विरोध नहीं होना चाहिए. सबको मालूम है कि और कुछ नहीं तो बवाल कर दो. बड़े आदमी का विरोध इसलिए नहीं कर सकते कि वो नुक़सान कर सकते हैं और आम लोगों का इसलिए नहीं कर सकते कि वो भीड़ बनाकर आ जाएंगे और तोड़फोड़ कर देंगे.

एक सोच बन गई है कि किसी को कुछ मत कहो.

सवाल: पश्चिमी देशों में कार्टूनिस्ट एक से एक तीख़े हमले करते हैं, नेताओं को बिना कपड़ों तक के दिखा देते हैं, लेकिन हमारे देश में सिर्फ़ कुछ चेहरे आदि में कुछ मामूली बदलाव करके कार्टूनिस्ट छुट्टी पा लेते हैं?

यहाँ समस्या होती है, हमारे यहां सेनिटाइज़ या साफ़-सुथरे किस्म के कार्टून बनाए जाते हैं. इस समाज को समझना ज़रूरी है कि ऑफ़ेंड करना भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है. आपको कोई दुखी करे तो आपको उसे बर्दाश्त करना चाहिए. आज से 30-40 साल पहले जितने कार्टूनिस्ट थे उतने नहीं हैं अभी. जबसे समाज में समृद्धि आई है तो लोगों को सिर्फ़ अपनी समृद्धि को बचाए रखने की चिंता है. नई-नई समृद्धि है. कहीं उसका नुक़सान न हो जाए. पहले एक रिबेलियस एलीमेंट था, वह अब समाज में खत्म हो गया है.

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लोगों को इतनी जल्दी बुरा क्यों लगता है?

अगर आपने एक को छूट दे दे दी, तो दूसरे को मौक़ा मिलता है. अगर हम आज ये कहें कि देशभक्त चोर होते हैं तो बवाल हो जाएगा. आमतौर पर वो ज़्यादा बड़े चोर निकलते हैं. अब तो नेशनुहड के कॉन्सेप्ट पर नहीं बोल सकते. कल हम ये नहीं कह सकते कि पाकिस्तान के मामले में भारत ने ग़लती की. हम ओवर सेंसिटिव हो गए हैं. राज थापर की किताब में ज़िक्र है कि रोमेश थापर को आकाशवाणी ने एक बार यह कहकर बैन कर दिया कि वह कम्यूनिस्ट हैं.

उन्होंने नेहरू के नाम चिट्ठी लिखी. अगले दिन सूचना प्रसारण मंत्री का फ़ोन आया कि प्रधानमंत्री ने इस पर ग़ौर किया है और आप पर से बैन हटाया जाएगा. नेहरू ने बात को काफ़ी गंभीरता से लिया.

ज़रा सा दीनानाथ बत्रा ने बवाल मचाया कि सभी किताबें वापस ले लीं. वो किताबें भी वापस ले लीं जिन पर बैन नहीं लगा था. असल में जिनको स्टैंड लेना चाहिए वो नहीं ले रहे हैं.

जो पत्रिका के लोग मारे गए हैं उन्होंने स्टैंड लिया. वो जानते थे कि हम ख़तरा उठा रहे हैं. उनका कमिंटमेंट था कि हम अभिव्यक्ति के लिए ख़तरा उठाएंगे.

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