'गोली का जवाब गोले से' देना कैसी कूटनीति?

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भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी रिश्तों में अरब सागर से लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमा और वास्तविक नियंत्रण रेखा तक तनाव की स्थिति नज़र आ रही है.

हाल ही में कश्मीर में सरहद पर गोलीबारी में भारत के एक जवान मारे गए थे और हज़ारों लोगों को अपने घरों को छोड़ कर शरणार्थी कैंपों की पनाह लेनी पड़ी.

हालांकि भारतीय सेना का कहना है कि वो सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन यदि उकसावे की कार्रवाई होगी तो उसका जवाब दिया जाएगा.

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कांग्रेस की हुकूमत के मुक़ाबले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार का अंदाज़ और ज़ुबान दोनों अलग हैं.

विश्लेषक और रिटायर्ड कॉमोडोर उदय भास्कर मानते हैं कि सरकार की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है, सिर्फ़ इस पर ज़्यादा सख़्ती से अमल किया जा रहा है.

उदय भास्कर कहते हैं, "नीति को अमल करने के मामले में एक प्रकार का बदलाव आया है. इसमें राजनीतिक विश्वास और दृढ़ता आई है. तनाव ज़रूर बढ़ रहा है. अब देखना यह है कि नीति के प्रति नज़रिए में जो बदलाव आया है और जिसे और आगे ये बढ़ा रहे हैं, उसका क्या असर होगा."

रक्षा मामलों को विश्लेषक प्रवीण स्वामी कहते हैं, "एक तरफ़ सरकार कहती है कि पाकिस्तान की दहशतगर्दी का जवाब देना है और दूसरी तरफ़ यह समझ नहीं आता है कि वो क्या और कैसे जवाब देना चाहती है और इसमें कूटनीति की कोई भूमिका है भी या नहीं.''

दिशाहीन नीति?

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स्वामी के अनुसार, "यही कारण है कि अलग-अलग वक़्त पर अलग अलग बातें सुनाई दे रही हैं. कोई एकीकृत नीति या दिशा तो इसमें दिख नहीं रही है."

हुर्रियत के नेताओं से पाकिस्तान के उच्चायुक्त से मुलाक़ात के बाद भारत ने बातचीत का सिलसिला बंद कर दिया था.

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अब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह गोली का जवाब गोले से देने की बात कर रहे हैं.

देश में उस जमात की आवाज़ ज़्यादा सुनाई दे रही है जो पाकिस्तान को सबक़ सिखाने या कम से कम नरमी न दिखाने की बात कर रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार पुष्पेश पंत कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि यह तनाव सिर्फ़ एकतरफ़ा कार्रवाईयों से बढ़ रहा है. दोनों देशों के हुक्मरान अपनी-अपनी जनता को दिखा रहे हैं."

निवेश पर असर

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Image caption सीमा पर रहने वाले हज़ारों भारतीय ग्रामीणों को गोलीबारी के कारण कैंपों में पनाह लेनी पड़ी है.

लेकिन हुकूमत का बदला हुआ अंदाज़ क्या देशहित में है?

प्रवीण स्वामी का कहना है, "अगर जंग का माहौल बनता है तो निवेशक बिदकेंगे, जबकि दोनों देशों को आज इस समय निवेश की सबसे बड़ी ज़रूरत है. ये तो प्रधानमंत्री ने ही कहा है कि अर्थव्यवस्था और विकास ही सबसे अहम मुद्दे हैं."

उदय भास्कर कहते हैं, "ये सोचना कि मोदी सरकार पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंधों के ख़िलाफ़ है, ग़लत होगा. लेकिन किस प्रकार हालात बनाएंगे ये देखना होगा. एक उम्मीद की किरण दिखी है. अमरीका से ख़बर आई है कि पाकिस्तान ने लश्करे-तैयबा के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है."

हालांकि पुष्पेश पंत का मानना है कि, "हमें यह मानकर चलना चाहिए कि दोनों देशों के बीच संबंध, दुर्भाग्य से आने वाले पांच सात सालों में सुधरने वाले नहीं हैं. इसमें कुछ मजबूरियां पाकिस्तान की हैं और कुछ उससे बाहर मध्यपूर्व के बिगड़ते हालात की हैं."

पाकिस्तान में हालात

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वो कहते हैं, "पाकिस्तान भी जिहाद और इस्लामी चरमपंथ का शिकार है लेकिन वहां के हुक्मरान उसे क़ाबू करने में नाकामयाब रहा है. उस तरफ़ से चरमपंथ का भारत की ओर जो रिसाव हो रहा है उससे भी दिक़्क़तें पैदा होती हैं."

उनका कहना है कि भारत देश के अंदर साम्प्रदायिक शांति का माहौल खड़ा करने में सफल नहीं रहा है.

प्रवीण स्वामी कहते हैं, "कुछ लोगों की यह राय हो सकती है कि अगर पाकिस्तान पर और दबाव डालें तो उसके सकारात्मक परिणाम मिलेंगे, लेकिन सब समझते हैं कि जो हालत बनी हुई है वो बहुत दिन तक चलती नहीं रह सकती."

तनाव या बातचीत?

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उनका कहना है कि, "यह सही है कि पाकिस्तान के अंदर हालात बिगड़ रहे हैं. और यह भी सच है कि शायद 1971 के बाद पाकिस्तान इतना कमज़ोर नहीं रहा. इसलिए उसके हालत का असर हम पर भी पड़ेगा."

स्वामी के अनुसार, "हमें कोई न कोई रास्ता निकालना पड़ेगा कि हम उन समस्याओं से ख़ुद को अलग रख पाएं और यह केवल भड़काऊ भाषणों से नहीं होने वाला है."

कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बात हाथ से निकल भी सकती है और अगर समस्याओं का हल बातचीत से ही निकलना है तो तनाव को बढ़ने देने का कोई मतलब नहीं.

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