क्या यह 'अंग्रेज़ी राज' की वापसी है?

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भारत का भूमि अधिग्रहण क़ानून क़रीब सवा सौ साल पुराना है, जिसके आधार पर विभिन्न विकास योजनाओं, उद्योगों के लिए ज़मीन का अधिग्रहण किया जाता रहा.

सालों के विरोध के बाद यूपीए सरकार ने 2013 में इसमें संशोधन कर ज़मीन मालिकों की मंज़ूरी लेने को इसमें शामिल किया था लेकिन मोदी सरकार ने अध्यादेश के ज़रिए उसे पलट दिया.

क्या विकास और विरोध के दमन की यह नीति नई है, क्या यह कारगर होगी?

पढ़िए पूरा विश्लेषण

साल 1850 आते-आते ब्रिटेन अपने आप को गर्व से दुनिया का कारख़ाना कह रहा था. उससे दो सौ साल पूर्व शुरू हुई औद्योगिक क्रांति के चलते वो दुनिया का सबसे शक्तिशाली और अमीर मुल्क हो चुका था.

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उस छोटे से देश को ये ज़बरदस्त कामयाबी कभी हासिल न होती अगर उसने तमाम कारख़ाने लगाने के लिए इफ़रात ज़मीन को अख़्तियार न किया होता.

सन 1770 में इंग्लैंड की आबादी का अस्सी फ़ीसदी हिस्सा खेती और पशुपालन से गुज़ारा करता था. सौ साल बाद यह प्रतिशत आधा हो गया था.

आधुनिक इतिहास का कड़वा सच है कि औद्योगिक तरक़्क़ी करने वाले लगभग हर मुल्क ने उद्योग के लिए किसानों को भारी तादाद में बेदख़ल किया है. उद्योग के लिए ज़मीन अधिग्रहीत करने का ये सिलसिला आज भी जारी है.

औद्योगिक प्रगति

पिछले दशकों में चीन और भारत का औद्योगीकरण इसके बग़ैर संभव नहीं होता.

1949 में चीन की क्रांति और 1947 में भारत की आज़ादी के बाद वहाँ करोड़ों किसानों और गाँववालों को बेदख़ल करके ही बाँध, नहर, बिजलीघर और इस्पात आदि के कारख़ाने बनाए गए.

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आज़ादी के बाद भारत और चीन, दोनों ने ही ज़बरदस्त औद्योगिक प्रगति हासिल की है. अत्यधिक पिछड़ेपन, भुखमरी और ग़ुरबत के शिकार रहे ये दोनों मुल्क आज दुनिया की चोटी की अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाते हैं.

खेतिहर अर्थव्यवस्था में सदियों से रेंग रही राष्ट्रीय विकास की दर दोनों मुल्कों में मशीनी उद्योग के दौर में छलांग मारने लगी थी.

बढ़ा विवाद

लेकिन दोनों मुल्क आज भी ज़मीन अधिग्रहण के पेचीदा मसले से जूझ रहे हैं.

दोनों में ही बेदख़ल हुए किसानों और गाँववालों की पुश्तें आज करोड़ों की संख्या में ग़रीबी और पिछड़ेपन में लिप्त हैं और शहरों की झोपड़-पट्टियों और बस्तियों में बुरे-हाल जी रही हैं.

दोनों ही देशों में भूमि-अधिग्रहण के विरोध में व्यापक जनआंदोलन हुए हैं.

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आज़ाद भारत की सरकारों ने भी अब तक ज़मीन अधिग्रहण करने के लिए साम्राज्यवादी अंग्रेज़ी शासकों के 1894 में बनाए एक क़ानून का सहारा लिया.

अंग्रेज़ों ने इस क़ानून का इस्तेमाल देशभर में सड़कों और रेल का जाल बिछाने के साथ-साथ खनिज-संपदा से परिपूर्ण ज़मीनों को भी अपने हक़ में लेने के लिए किया था.

स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय चिंतकों और बुद्धिजीवियों ने इस क़ानून को भारत की बढ़ती ग़रीबी के लिए लगातार ज़िम्मेदार ठहराया था.

क़ानून में संशोधन

वजह यह थी कि सरकार "सार्वजनिक लाभ" के नाम पर मालिक की मर्ज़ी के बग़ैर भी उसकी ज़मीन मनमाने दामों पर ख़रीद सकती थी. इस तरह अंग्रजों ने बहुत सारी ज़मीन विरोध के बावजूद अपने क़ब्ज़े में ले ली थी.

इस क़ानून के ख़िलाफ़ कई सालों में देशभर में चलाई गई मुहिम की वजह से 2013 में संसद ने इसे रद्द करके एक नया क़ानून पारित किया. इसमें भूमि मालिकों की रज़ामंदी को जगह मिली और मुआवज़े की रक़म भी ख़ासी बढ़ाई गई.

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लेकिन 29 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक अध्यादेश के ज़रिए उद्योग और सुरक्षा की योजनाओं के लिए ज़मीन मालिकों की रज़ामंदी की अनिवार्यता फिर से ख़ारिज कर दी है. इसके चलते भूमि अधिग्रहण पर दोबारा विवाद खड़ा हो गया है.

आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो साल में भारत में उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर होने वाले झगड़ों में तीस फ़ीसदी की वृद्धि हुई है.

इनमें अधिकतर योजनाएँ झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और असम में कारख़ाने और बिजलीघर आदि लगाने से लेकर धरती के भीतर से खनिज निकालने की हैं. इनका विरोध करने वालों में बड़ी संख्या जंगलों में रहने वाले आदिवासियों की हैं.

मुश्किल

माना जा रहा था कि 2013 के नए क़ानून में दिए गए सशक्तीकरण के बाद प्रभावित होने वाले समुदायों में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को लेकर संदेह कम होगा और उनकी भागीदारी बढ़ेगी.

आख़िरकार, अगर रज़ामंदी से ज़मीन की खरीद-फ़रोख़्त हो और वाजिब दाम दिए जाएं तो पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक लोग स्वेच्छा से ज़मीन बेचने को तैयार हो सकते हैं.

अध्यादेश के उलटफेर के चलते दोबारा संशय पैदा हो गया है कि भूमिग्रहण का जनविरोध कम होने की बजाए बढ़ेगा.

मध्यपूर्व भारत के जंगली इलाक़ों में दशकों से चल रही माओवादी हिंसा के पीछे ज़बरन भूमिग्रहण एक बड़ा कारण रहा है. ख़ासतौर से छत्तीसगढ़ में तमाम औद्योगिक योजनाएं इस हिंसा के चलते कई सालों से रुकी पड़ी हैं.

विकास दर

पिछले साल मई में सत्ता हासिल करने के बाद से मोदी सरकार ने माओवाद के ख़िलाफ़ सुरक्षाबलों को और आक्रामक बनाने की कोशिश की है.

लेकिन वो दांव फ़िलहाल उलटा पड़ा दिखता है क्योंकि इस दौरान अतिउग्र माओवादी हमलों में कई सुरक्षाकर्मियों की जानें चली गई हैं.

पिछले सात सालों से दुनियाभर में आई आर्थिक मंदी की वजह से भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था भी चरमराई है.

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इसके चलते विकास की दर तेज़ करने के क़दम उठाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी पर अत्यधिक दबाव बना हुआ है. भूमिग्रहण अध्यादेश के पीछे मंशा यही है कि जल्द से जल्द उद्योग की सेहत सुधरे और महँगाई और बेरोज़गारी कम हो.

लेकिन जनआंदोलनों के इतिहास और माओवादी हिंसा के मद्देनज़र भूमिग्रहण का काम आसान होने की बजाए मुश्किल होता दिख रहा है.

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