सिरिसेना की जीत से बेहतर होंगे संबंध?

  • 10 जनवरी 2015
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श्रीलंका की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हुआ जब दो बार से राष्ट्रपति रह चुके महिंदा राजपक्षे को तीसरे कार्यकाल के चुनावों में हार का सामना करना पड़ा.

राजपक्षे के सहयोगी और मित्र रहे मैथ्रिपाला सिरिसेना ने उन्हें एक कांटे के मुक़ाबले में शिकस्त दी.

विदेश नीति के मामले में मैं ये कह सकता हूँ कि भारत-श्रीलंका संबंध ज़्यादा मज़बूत और बेहतर होंगे.

सिरिसेना का रवैया बेहतर

इसकी दो प्रमुख वजहों में पहली बात है श्रीलंका में रह रहे तमिलों के अधिकारों के मामले पर सिरिसेना का रवैया थोड़ा बेहतर लग रहा है.

हालाँकि सिरिसेना ने कोई बड़ा वादा नहीं किया है, लेकिन उन्हें उदारवादी सिंहला मतों के साथ तमिल लोगों ने भारी वोट दिए हैं. इसके चलते भारत में केंद्र सरकार पर तमिलनाडु सरकार का दबाव कम रहेगा.

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Image caption तमिलों के प्रति सिरिसेना का रवैया थोड़ा बेहतर लग रहा है.

दूसरा अहम मुद्दा चीन से संबंधित है.

महिंदा राजपक्षे चीन से अपनी 'अभिन्न मित्रता' का अक्सर दम भरा करते थे.

इस बात में कोई शक नहीं रहा है कि श्रीलंका में चीन का प्रभाव ऐसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है, जिससे भारत को परेशानी भी है और अड़चन भी.

मुझे लगता है कि चीन और श्रीलंका के बीच संबंधों में कोई बड़ा परिवर्तन तो नहीं आएगा, लेकिन उन मुद्दों में ज़रूर नरमी आएगी, जिन्हें लेकर भारत ज़्यादा चिंतित रहा है.

राजपक्षे की घटती लोकप्रियता

रहा सवाल श्रीलंका और राजपक्षे की हार का तो ऐसा लग रहा था कि सिरिसेना जीत सकते हैं, क्योंकि लोगों में राजपक्षे और उनके परिवार के एकछत्र राज पर आक्रोश था.

नतीजे देखने के बाद ये भी साफ़ हो गया है कि उदारवारी सिंहला लोगों ने सिरिसेना को समर्थन किया जबकि कट्टरपंथी मत फिर से राजपक्षे के लिए पड़े.

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श्रीलंका के आम नागरिक को जो बात पसंद नहीं आई वो यही थी कि पिछले दो वर्षों से राजपक्षे और उनके कई भाइयों का देश के लगभग 65 फ़ीसदी संसाधनों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एकाधिकार था.

राजपक्षे के राज में रक्षा मंत्रालय मज़बूत होता गया, प्रेस पर कई तरह की पाबंदी रही और तमिल लोगों, ख़ासतौर से जाफ़ना में तमिल मुख्यमंत्री का तो आरोप रहा कि वे अपना दफ़्तरी भी स्वेच्छा से नहीं चुन सकते थे.

कभी साथी थे, फिर प्रतिद्वंद्वी

इस सबके बीच महिंदा राजपक्षे को लगने लगा कि उनकी लोकप्रियता कम हो रही है और इसलिए उन्होंने नियत समय से दो साल पहले ही चुनाव कराने की ठान ली थी.

अपने ही मंत्री रहे सिरिसेना से भी राजपक्षे का कुछ मनमुटाव था, क्योंकि सिरिसेना का मानना था कि चुनाव समय पर ही होने चाहिए.

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सिरिसेना चाहते थे कि राजपक्षे लोकतांत्रिक तरीक़ों से सरकार चलाने में पारदर्शिता लाएं और उसके बाद चुनाव कराए जाएं.

लेकिन हैरानी की बात भी यही रही कि ख़ुद सिरिसेना ने राजपक्षे के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा और जीत भी गए.

(एसडी मुनि के साथ बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)

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