दिल्ली में कांग्रेस के लिए कितनी उम्मीद बाक़ी?

राजनीति में एक साल लंबा समय होता है. दिसंबर, 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस सत्ता में थी, लेकिन इस बार सात फ़रवरी को होने वाले चुनाव में पार्टी चर्चा में भी नहीं है.

दिल्ली चुनाव पर निगाह रखने वालों और दिल्ली के आम वोटरों की नज़रों में इस बार भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच सीधा मुक़ाबला होने वाला है.

कांग्रेस पार्टी के तेवर ऐसे हैं जैसे भारत, दक्षिण अफ्रीका और बांग्लादेश के बीच किसी तिकोने क्रिकेट मैचों में हो सकता है, जिसमें बांग्लादेश को पता है वो दक्षिण अफ्रीका और भारत को शिकस्त नहीं दे सकता.

कुछ इसी तरह का हाल कांग्रेस का भी है. चुनाव के पहले से ही पार्टी की बॉडी लैंग्वेज हार वाली है.

हरकत में नहीं पार्टी

अगर आप एफएम रेडियो सुनते हों तो चुनावी विज्ञापनों में भी मुक़ाबला भाजपा और आप के बीच सुनाई देता है. कांग्रेस वहां भी गुमसुम है.

अगर आप दिल्ली की सड़कों और इसके खम्बों पर लगे इश्तेहारों को देखें तो वहां भी कांग्रेस साफ़ दिखाई नहीं देती.

पिछले साल लोकसभा चुनाव में ज़बरदस्त हार के बाद से ऐसा लगता कि कांग्रेस पार्टी को सांप सूंघ गया है.

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पार्टी अब भी हरकत में आती दिखाई नहीं देती. खबरों के अनुसार अजय माकन कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व कर सकते हैं लेकिन इस पर भी पार्टी का रवैया आक्रामक नहीं है.

वोट शेयर का पहलू

लेकिन क्या कांग्रेस को इतना मायूस होने की ज़रूरत है? पिछले चुनाव में इसे आठ सीटें मिली थीं, जबकि आप को 28 और भाजपा और इसके सहयोगी दल को 33.

लेकिन अगर कांग्रेस के वोट शेयर पर नज़र डालें तो आप और इसमें कोई बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं था. आप को 29 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे जबकि कांग्रेस पार्टी को 24.5 प्रतिशत.

इसका मतलब है कि अगर पार्टी जी जान लगा दे तो इस बार इसका वोट शेयर बढ़ सकता है. कम से कम पार्टी को इस बारे में महत्त्वाकांक्षी होना चाहिए.

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इसके अलावा कांग्रेस ने पिछली हार से पहले दिल्ली विधानसभा के लगातार तीन चुनाव जीते थे. शीला दीक्षित ने दिल्ली में बुनियादी ढांचों को इतना बढ़ाया है जितना नरेंद्र मोदी ने गुजरात में भी नहीं किया होगा.

हार का यक़ीन

कांग्रेस के पास दिल्ली में शासन का एक लंबा और ठोस ट्रैक रिकॉर्ड है. लेकिन इसे भुनाने के लिए इसके पास कोई स्ट्रेटेजी नज़र नहीं आती.

अब तक जो कांग्रेस के खेमे से तस्वीर निकल कर आई है उससे नहीं लगता उसे खुद यक़ीन है और वो इस बार भी चुनाव हार जाएगी.

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पार्टी के हौसले पस्त हैं. नेतृव की कमी है. पार्टी पुकार-पुकार कर कह रही है कि पुनर्निर्माण और पुनर्गठन की इसे ज़रूरत है, लेकिन कांग्रेस वर्किंग समिति की मंगलवार की बैठक में भी इस मुद्दे पर कोई फ़ैसला नहीं हुआ.

वैसे इस बार अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस का वोट शेयर और भी कम हो सकता है और ये भी समझा जा रहा है कि इसे सीटें भी पिछले चुनाव से अधिक नहीं मिलने वाली हैं.

ऐसे में जाहिर है कि दिल्ली में अब कांग्रेस का स्थान आम आदमी पार्टी ने ले लिया है.

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