पाकिस्तान का 'पैकेज' रोकेगा अमरीका?

  • 14 जनवरी 2015
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पाकिस्तान के चरमपंथी गुटों पर अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी और भारतीय थल सेनाध्यक्ष दलबीर सिंह सुहाग के बयान भारत और दक्षिण एशिया में सुरक्षा की चुनौतियों की हक़ीक़त बयाँ करते हैं.

अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने इस्लामाबाद में कहा कि पाकिस्तान को उन चरमपंथी गुटों का मुक़ाबला करना होगा जिनसे अफ़ग़ानिस्तान, भारत और अमरीका के हितों को ख़तरा है.

वहीं, जनरल सुहाग का दावा है कि भारतीय सेना ने पिछले साल 104 आतंकवादियों को पकड़ा.

भारत ने नीति बदली

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सुहाग ने यह भी कहा है कि भारत सरकार और सेना ने जो नई नीति बनाई है उसके मुताबिक़ सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से हो रही फ़ायरिंग का कड़ा जवाब देना है.

ज़ाहिर है, इसके बाद पाकिस्तान भी भारत को लेकर अपनी सुरक्षा नीति की समीक्षा करेगा.

जहाँ तक केरी का बयान है तो उन्होंने इस्लामाबाद में अपने बहुत सोचे-समझे शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया दी है.

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केरी ने कहा, "पाकिस्तानी और अफ़ग़ान तालिबान, हक़्क़ानी नेटवर्क, लश्करे-तैयबा और दूसरे समूहों से पाकिस्तान, उसके पड़ोसियों और अमरीका को ख़तरा है."

अमरीकी रुख़ पर नज़र

देखना होगा कि जब केरी साहब लौटकर अमरीका जाएंगे और पाकिस्तान को आर्थिक मदद पर फैसले का वक़्त आएगा, तब रुख़ क्या होगा.

देखना होगा कि क्या अमरीका, पाकिस्तान को यह प्रमाण पत्र देने को तैयार है कि वह दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ सही क़दम उठा रहा है. या फिर वह राजनीतिक रूप से पाकिस्तान को इसमें कोई छूट देता है.

हालाँकि अमरीका के लिए ये कोई नई बात नहीं है.

1991-1992 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश सीनियर भी पाकिस्तान की समीक्षा करते हुए इस निर्णय पर पहुंचे थे कि पाकिस्तानी सरकार चरमपंथियों को मदद कर रही है.

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लेकिन उसके बाद अब तक अमरीका तय नहीं कर पाया है कि दहशतगर्दी के मुद्दे पर वह पाकिस्तानी सेना के साथ कैसी नीति अख़्तियार करे.

हालाँकि इस समय पाकिस्तान में पेशावर और पेरिस की घटनाओं के बाद इस्लामी चरमपंथ को लेकर नई बहस शुरू हुई है और दुनियाभर की सरकारें अपनी नीतियों की समीक्षा कर रही हैं.

(बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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