यूपी में कमज़ोर पड़ती 'मोदी लहर'?

  • 13 जनवरी 2015
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में भाजपा के लिए डगर मुश्किल होती जा रही है.

आम चुनाव को अभी एक वर्ष भी नहीं हुआ है और लगातार दूसरी बार पार्टी को स्थानीय चुनावों में करारी हार मिली है.

रोहनिया विधानसभा उप चुनाव के बाद वाराणसी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत छावनी परिषद चुनावों में भाजपा समर्थित सातों उम्मीदवार हार गए.

पहला मौक़ा

ये पहला मौक़ा था जब भाजपा ने इन स्थानीय चुनावों में अपना समर्थन भी दिया था और प्रचार में नरेंद्र मोदी के नाम का प्रचार भी हुआ.

भाजपा के लिए सदमा बड़ा है क्योंकि सातों सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार भारी मतों से जीते हैं.

एक वार्ड से जीतने वाले शैलेन्द्र सिंह ने बीबीसी को बताया, "स्थानीय लोगों को प्रतिनिधि के तौर पर स्थानीय व्यक्ति ही चाहिए. मोहल्लों के चुनाव में लोग घरवालों को पसंद करते हैं. दूसरी बात ये है कि प्रधानमंत्री जी की सरकार में बड़े आयोजन गुजरात में हो रहे हैं, वाराणसी में नहीं."

हालांकि भाजपा को वाराणसी के अलावा लखनऊ और आगरा छावनी परिषद चुनाव में भी करारी हार मिली लेकिन सभी का ध्यान मोदी के चुनाव क्षेत्र पर रहा.

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दलील

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी की दलील रही कि, "जो प्रत्याशी हारे उन्हें सिर्फ़ समर्थन भर था और उनके पास कमल का चुनाव चिन्ह नहीं था."

वाराणसी में जन्में और शहर के जाने-माने पत्रकार अमिताभ भटाचार्य कहते हैं, "साफ़ हो रहा है कि मोदी के नाम का इस्तेमाल कुछ ज़्यादा हो रहा है."

उन्होंने कहा, "हर जगह एंटीबायोटिक दवाओं की चौथी पीढ़ी का प्रयोग करिएगा तो सबसे हल्की दवाई का असर ही ख़त्म हो जाएगा. भाजपा को अपना संगठन मज़बूत करने की ज़रुरत है और हर बार राम-नाम या मोदी-नाम के सहारे से काम नहीं चलेगा."

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