भारत में पहला कॉल सेंटर खोलने वाला शख़्स

कॉल सेंटर

प्रमोद भसीन उस शख़्स का नाम है, जिन्होंने 1998 में भारत का पहला कॉल सेंटर गुड़गांव में खोला. इसमें उस वक्त केवल 18 लोग काम करते थे.

यहां कर्मचारियों के काम करने की जगह एक दूसरे से छत से साड़ियां टांग कर अलग की गई थी.

असल में 1990 के दशक के आख़िर में व्यवसायी प्रमोद भसीन के दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों ना भारत के अंग्रेजी बोलने वाले लोग अमरीकी और अन्य देशों के व्यापार से जुड़े ग्राहक कॉल के जवाब देकर पैसा कमाने का काम कर सकते हैं.

बीबीसी विटनेस के कार्यक्रम में भसीन ने अपने इस अनूठे अनुभव के बारे में बताया.

विश्वास नहीं हुआ

वे हम लोग ही थे, जिसने भारत में पहली बार कॉल सेंटर शुरू किया.

इसका आर्थिक पक्ष इतना दिलचस्प था कि जिस कौशल और शिक्षा के लिए अंतराष्ट्रीय तनख्वाहों के मुकाबले कहीं कम पैसे में यहां वैसे लोग मौजूद थे.

एक चार्टर्ड अकाउंटैंट आपको 13-14 हज़ार में मिल सकता था. परास्नातक डिग्री धारक पांच-छह हज़ार में मिल सकता था.

एशिया में लोगों को यह समझाना काफ़ी मुश्किल था, जहां फ़ोन लाइन ठीक से काम भी नहीं करती थी. कभी कभार लोगों को दो या तीन फ़ोन लाइन लेनी पड़ती थी क्योंकि एक फ़ोन लाइन अक्सर ही डाउन रहती थी.

जब हम टेलीकॉम प्राधिकरण के पास गए तो वे इस आइडिया पर काफ़ी हंसे. उन्होंने कहा कि क्या आप मज़ाक कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अगर आप फ़ोन कंपनियों के भरोसे पूरी दुनिया में फ़ोन करना चाहते हैं तो यह सफल नहीं होने वाला.

रोमांचक माहौल

लेकिन हमारा आत्मविश्वास कम नहीं हुआ. मैं इसे अपनी 'मौलिक' मूर्खता ही कहूंगा, जिसपर मुझे गर्व है.

धीरे धीरे ही सही हम फ़ोन लाइन हासिल करने में सफल रहे. अगर आप इस इमारत के ऊपर देखेंगे तो वहां एक विशाल सैटेलाइट डिश है, जो भारत का असल मील का पत्थर है.

हम कह सकते हैं कि सैटेलाइट डिश ही वो चीज़ है जिससे इस क्रांति का आग़ाज़ हुआ.

जो पहला कॉल सेंटर हमने बनाया वो आज के समय के मुकाबले बहुत ही शुरुआती था.

यहां कर्मचारियों के काम करने की जगह एक दूसरे से छत से साड़ियां और पर्दे टांग कर अलग की गई थी. कमरा साउंडप्रूफ़ नहीं था और पूरे कमरे में तारों का जाल बिखरा रहता था.

इन सबके बावजूद माहौल में एक किस्म का रोमांच था. महिलाएं और पुरुष एक साथ इस तरह से काम कर रहे थे, जैसा भारत में कभी नहीं होता था.

इसने कुछ हद तक मुक्त माहौल बनाने का भी काम किया.

आक्रामकता

Image caption प्रमोद भसीन कहते हैं कि ग्राहक हमारे उच्चारण को समझ नहीं पाते थे और कई बार आपे से बाहर हो जाते थे.

लोग सीख रहे थे, अटक रहे थे, दूसरी तरफ़ कॉल करने वाले ग्राहक झल्ला रहे थे. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की शिकायतें आती थीं.

उस समय तक लोगों ने वॉशिंग मशीन के बारे में भी नहीं सुना था.

एक दफ़ा एक ग्राहक ने फ़ोन किया कि उनकी वॉशिंग मशीन से लीकेज हो रही है. हम इसे समझ नहीं पाए.

कॉल करने वाले ग्राहक सोचते थे कि ये किस तरह अंग्रेज़ी बोली जा रही है.

इस दौरान ग्राहकों की काफ़ी आक्रामकता झेलनी पड़ती थी. लेकिन हमने कर्मचारियों के उच्चारण सुधारने के लिए काफ़ी प्रयास किए.

हमने कर्मचारियों को सिखाया कि किसी भी हालत में आक्रामक नहीं होना है और यदि हल नहीं निकल रहा है तो बिना धैर्य खोए उन्हें बाद में फ़ोन करने के लिए कहा जाए.

उच्चारण की दिक्कतें

इस दरम्यान हमने दूसरे देशों की संस्कृति समझने, उच्चारण आत्मसात करने की हमने कोशिश की.

उदाहरण के लिए यदि कर्मचारी कहे कि 'हेलो आई एम प्रमोद' तो विदेशी नहीं समझेगा, बल्कि इसकी जगह कहा जाए कि 'हेलो आई एम पीट', तो यह उनके लिए समझना सहज होगा.

भारत में ऐसा अमूमन नहीं होता था. आज इस उद्योग के इर्द-गिर्द कई शहर बस गए हैं.

यहां काम करने वाले नौजवानों के पास आज खर्च करने के लिए पैसा है, वे इससे अपनी पढ़ाई, कॉलेज, ट्यूशन का खर्च चलाते हैं और अपने घर की आर्थिक रूप से मदद करते हैं.

आज की तारीख़ में भारत को फिलीपींस जैसे देशों से इस क्षेत्र में कड़ी टक्कर मिल रही है. यहां का कॉल सेंटर उद्योग अभी भी काफ़ी बड़ा है और हज़ारों भारतीय यहां अपनी सेवा देते हैं.

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