कुछ भी हो, पेट्रोल-डीज़ल तो महंगा ही रहेगा

  • 14 जनवरी 2015
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कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पिछले छह सालों के निचले स्तर पर हैं.

भारत सरकार के पास अपनी वित्‍तीय स्थिति सुधारने का सुनहरा मौक़ा है क्योंकि कच्चे तेल की ख़रीद में उसे हर साल अरबों रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं.

साथ में पेट्रोल और डीज़ल के लिए ग्राहकों को ज़्यादा पैसे देने पड़ते हैं. अब लोगों की जेब पर पेट्रोल का हर लीटर सस्ता पड़ेगा.

देश में ज़रूरत का 80 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात किया जाता है. सरकार के लिए कच्चे तेल की कम क़ीमतों का मतलब है विदेशी मुद्रा की बचत.

सरकार की चिंता

एक अनुमान के अनुसार, पिछले 10 सालों में भारत सरकार और उसकी कम्पनियों ने पेट्रोलियम उत्पादों पर आठ लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी दी.

पहले कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमतों ने सरकार की नींद उड़ा रखी थी. अब स्थिति ठीक उल्टी हो गई है, लेकिन अब भी सरकार की नींद उड़ी हुई है.

पहले सरकार को ये चिंता थी कि कच्चे तेल की ख़रीद के लिए विदेशी मुद्रा की दिक़्क़त ना हो. अब सरकार की दिक़्क़त है कि घटती क़ीमतों के कारण उसकी टैक्स कमाई में कमी ना हो.

गिरावट

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अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अभी कच्चे तेल की क़ीमत 50 डॉलर प्रति बैरल के नीचे है, लेकिन सरकार के लिए ये राहत की बात नहीं है.

सभी राज्यों और केन्द्र सरकार को पेट्रोल और डीज़ल जैसे सामानों पर टैक्स से तीन लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा की कमाई होती है.

पेट्रोल पर 31 रुपए प्रति लीटर तक का बिक्री कर या वैट लगाया जाता है और डीज़ल पर 25 फ़ीसदी तक का टैक्स. पेट्रोल के हर लीटर में क़रीब 20-25 फ़ीसदी टैक्स जुड़ा होता है, जिसका भार आम ग्राहक पर पड़ता है.

इसलिए पेट्रोल और डीज़ल से मिलने वाला टैक्स राज्य और केन्द्र सरकार के कुल टैक्स का 20 फ़ीसदी हिस्सा होता है.

2009 में पेट्रोलियम मंत्री ने संसद को बताया था कि दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की क़ीमत में केन्द्र सरकार का 31 फ़ीसदी राजस्व और राज्य सरकार का 17 फ़ीसदी बिक्री कर शामिल है.

अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत और गिरेगी, तो केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलने वाले टैक्स पर सीधा असर होगा.

टैक्स की गणित

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साल 2013-14 में केन्द्र सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क से 16 लाख करोड़ रुपए कमाए. पिछले कुछ महीनों में, उत्पाद शुल्क को चार बार बढ़ाया गया है.

अभी पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क क़रीब 13-14 रुपए और डीज़ल पर क़रीब आठ रुपए प्रति लीटर है. इसके अलावा 2.5 फ़ीसदी सीमा शुल्क भी है, जो कमाई सीधे केन्द्र सरकार को जाती है. राज्य सरकारें इसके अलावा 31 फ़ीसदी तक बिक्री कर भी लगाती हैं.

कच्चे तेल की कीमत और गिरने की हालत में ये उम्मीद की जा सकती है कि केन्द्र सरकार टैक्स की दर बढ़ाकर अपनी घटती कमाई पर रोक लगाने की कोशिश करेगी.

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