कलाकारों ने बदल दी पटना की छवि

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Image caption नीदरलैंड की कलाकार डियान हेगेन की कलाकृति.

क़रीब आठ साल पहले जब पहली बार विदेशी कलाकारों को बिहार में कलाकृतियां बनाने के लिए बुलाया गया तो उनके विदेशी दूतावासों ने उन्हें अपने जोख़िम पर जाने की सलाह दी.

लेकिन पांच साल के बाद देशी विदेशी कलाकारों ने अपनी कलाकृतियों से पटना की तस्वीर बदल दी है.

शहर के चौराहों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक जगहों पर अद्भुत कलाकृतियां एक अलग ही छवि बनाती हैं.

एक विदेशी कलाकार का कहना है कि पटना का इको पार्क भारत का पहला कंटेम्पोरेरी स्कल्पचर पार्क बन गया है.

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"ये सब ईंट पत्थर की मूर्ति जन्ने-तन्ने लगी है, जानते तो नहीं कि क्या है, लेकिन नेता लोग के मूर्ति से ज़्यादा ठीक है. कम से कम धोखा तो नहीं देती" 35 साल की किरन ने तपाक से ये जवाब दिया जब मैंने उनसे पटना शहर में जगह-जगह लगे समकालीन कला के नमूनों के बारे में पूछा.

दरअसल, बेतरतीब बसे पटना शहर के चौक चौराहों और पार्कों में लगे समकालीन कला के नमूने चौंकाते हैं.

एक ऐसे शहर में जहां कला का बड़ा बाजार नहीं है.

पटना की सूरत में ये बदलाव 2012 में आया जब बिहार दिवस के मौके पर देशी विदेशी कलाकारों के लिए यहां कैम्प का आयोजन किया गया.

'कन्टेम्पररी स्कल्पचर पार्क'

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Image caption नीदरलैंड की डायना हेगेन कहती हैं कि यह बिहार की बौद्धिकता का विस्तार है.

स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, स्पेन, इंग्लैंड और देश के अलग अलग हिस्सों से आए कलाकारों ने यहां अपनी कला की करामात दिखाई.

आज पटना शहर में नौ चौराहों पर स्कल्पचर लगे हैं तो शहर के इको पार्क में समकालीन कला की अदभुत कृतियां हैं.

नीदरलैंड की कलाकार डियान हेगेन बिहार में कई आर्टिस्ट कैम्प का हिस्सा बन चुकी हैं.

उनके मुताबिक, "मेरी जानकारी कहती है कि पटना का इको पार्क भारत का पहला 'कन्टेम्पररी स्कल्पचर पार्क' है. इस तरह से समकालीन कला को किसी पार्क में जगह दिया जाना, बिहार की विरासत और उसकी बौद्धिकता को विस्तार देना है."

कलाकारों में डर

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Image caption रजत घोष और सन्यासी रेड की कलाकृति.

हालांकि लालू राज में कानून व्यवस्था के चलते अपनी पहचान के संकट से गुजर रहे बिहार के लिए कला की नाज़ुक राह आसान नहीं थी.

वर्ष 2006 में जब कलाकार संजीव सिन्हा ने बोधगया में विश्व शांति विषय को लेकर 20 देशों के कलाकारों के साथ कैम्प आयोजित करना चाहा तो कलाकार आने को तैयार नहीं हुए.

संजीव कहते हैं, "उस वक्त कई देशों के दूतावासों ने अपने कलाकारों से कहा कि बिहार जाना है तो आप अपने जोखिम पर जाइए."

लेकिन संजीव की कोशिश रंग लाई और नतीजा ये रहा कि उन्होंने 2011 में फिर से बोध गया में देशी विदेशी कलाकारों के लिए ऐसा आयोजन किया.

मुश्किलें और सफलता

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इस बीच मसौढ़ी के रहने वाले कलाकार सन्यासी रेड भी देश के अलग अलग हिस्सों में रहकर स्थानीय स्तर पर काम करने के लिए बिहार वापस लौटे.

उन्होंने पहले नए कलाकारों को प्लेटफार्म देने के लिए 'रंग विकल्प' नाम की संस्था बनाई और फिर 2010 और 2011 में दुनिया भर के कलाकारों को बुलाकर पटना में कैम्प आयोजित किए.

सन्यासी बताते हैं, "लोग अब शहर के बदलाव को देखकर खुश होते हैं और हमसे इन कृतियों के मायने पूछते हैं, लेकिन इससे पहले कैम्प आयोजित करने से लेकर आर्ट वर्क को चौराहों पर लगवाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी."

दिलचस्प है कि जहां लोग खुश हैं वहीं लोग कला से संवाद करने की भी कोशिश करने लगे हैं.

पटना आर्ट्स कॉलेज

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Image caption सुबोध गुप्ता की कलाकृति.

विदेशी कलाकार डियान बताती है, "इको पार्क में काम करते वक्त मैं कई तरह के सवालों से रू-ब-रू हुई और मुझे लगता था कि इस नीरस शहर में भी लोग कला को इतनी गहराई से समझना चाहते हैं."

हालांकि शहर में आए इस बदलाव से पटना आर्ट्स कॉलेज अछूता रह गया है.

शिक्षकों की कमी झेलते इस कॉलेज के कई छात्र अपनी बैचलर डिग्री पूरी होने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं.

आर्ट क़ॉलेज से 2013 में डिग्री हासिल कर चुके अभिषेक बताते हैं, "मेरे बैच के 80 फीसदी छात्र या तो बाहर चले गए या फिर उन्होंने कला का क्षेत्र ही छोड़ दिया."

सरकारी उदासीनता

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Image caption ललित कला अकादमी अध्यक्ष आनंदी प्रसाद बादल.

वहीं बिहार ललित कला अकादमी की हालत भी कुछ बेहतर नहीं है.

अकादमी के अध्यक्ष आनंदी प्रसाद बादल कहते हैं कि "सरकार की तरफ से अकादमी को फंड कम दिया जाता है, स्कूलों में कला शिक्षकों की भर्तियां नहीं की जा रही हैं, कला का बाजार नहीं है यहां तो कलाकार आखिर जिन्दा कैसे रहे."

आनंदी प्रसाद बादल जो सवाल पूछ रहे हैं वो इस शहर में लगी समकालीन कला कृतियां भी पूछती प्रतीती हो रही हैं कि आखिर इस परंपरा को आगे कौन बढ़ाएगा.

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