तबाही के कगार पर कपास उत्पादक किसान

  • 17 जनवरी 2015
कपास किसान

महाराष्ट्र के कपास उत्पादक किसानों का कहना है कि वो इस समय संकट में हैं क्योंकि वैश्विक स्तर पर क़ीमतें गिर रही हैं और चीन से मांग में कमी ने निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है.

यहां तक कि केंद्र सरकार ने कपास ख़रीद को बढ़ा दिया है इसके बावजूद उत्पादकों के नुकसान की भरपाई के लिए यह पर्याप्त नहीं है.

पिछली तीन सदी से इस इलाक़े में कपास की पदावार की जाती है और इसे अच्छे ख़ासे मुनाफ़े में बेचा जाता रहा है.

संकट

Image caption कपास उत्पादक किसान नरायन देशमुख का कहना है कि कम उत्पादन के बावजूद कपास के सही दाम नहीं मिल रहे हैं.

महाराष्ट्र के परभानी में नारायन देशमुख का परिवार तीन पीढ़ियों से कपास की खेती कर रहा है.

देशमुख खुद पंद्रह साल से खेती कर रहे हैं, लेकिन इस वर्ष उन्हें भयानक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है.

रैन देशमुख कहते हैं, "यह मेरे लिए अबतक का सबसे मुश्किलों भरा साल है. पिछले साल हमने 20 कुंतल कपास का उत्पादन किया था, लेकिन इस साल केवल पांच कुंतल कपास ही पैदा हो पाई."

वो कहते हैं, "इसके बावजूद हमें अच्छा दाम भी नहीं मिल रहा है."

कम दाम पर ख़रीद

अधिकांश किसानों को खुले बाज़ार की बजाय सरकारी ख़रीद केंद्रों में कपास लाना पड़ रहा है. सरकार पिछले साल के मुकाबले 20 प्रतिशत कम दाम दे रही है.

ख़रीद केंद्रों पर कपास का ढेर लगा हुआ है क्योंकि भारत के पारंपरिक खरीदारों, वियतनाम और खासकर चीन से मांग में भारी कमी आई है.

पूरे देश में हज़ारों भंडार घरों में इसी तरह कपास के ढेर रखे जा रहे हैं इस उम्मीद में कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क़ीमतें कभी तो बढ़ेंगी.

मनीष डागा कपास निर्यातक हैं. उनका कहना है कि सरकार को और क़दम उठाने चाहिए.

और तरीक़े

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वो कहते हैं, "यह तबाही के कगार पर पहुंचने जैसी स्थिति है. देश में ज़रूरत से अधिक कपास क्यों है. हम क्यों पहले से योजना नहीं बनाते. यह हर साल पैदा होता है और हर साल दिखता है."

अधिकारियों का कहना है कि सरकार गिरती क़ीमतों से निपटने की कोशिश कर रही है, लेकिन किसानों को भी कुछ करना चाहिए.

एक अधिकारी का कहना है, "समय आ गया है कि किसानों को अन्य फ़सलों की ओर मुड़ना चाहिए. किसानों को अन्य किसी ज़रूरी फसलों की पैदावार करनी चाहिए."

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