कितनी फ़ास्ट हैं फ़ास्ट ट्रैक अदालतें

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पिछले कुछ वर्षों में भारत में महिलाओं पर हुई कई तरह की हिंसा के बाद फ़ास्ट ट्रैक अदालतों की भूमिका एकाएक बढ़ सी गई है.

राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों में फ़ास्ट ट्रैक अदालतों ने लंबित मामलों को गति दी थी जबकि दिसंबर, 2012 में दिल्ली में एक युवती के सामूहिक बलात्कार और मौत हो जाने के बाद से इन अदालतों की मांग बढ़ चुकी है.

दिसंबर, 2014 में दिल्ली में उबर टैक्सी सर्विस के एक ड्राइवर पर एक महिला यात्री के साथ बलात्कार करने के आरोप लगने के बाद से इन अदालतों की भूमिका और बढ़ सकती है.

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एक महीने के भीतर ही अदालत ने आरोप तय कर लिए और गुरुवार को सुनवाई शुरू हो गई.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सूरत सिंह को लगता है कि इस तरह से तेज़ी दूसरे मामलों में भी आनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "भारत में मुक़दमों पर फ़र्क़ तो पड़ा है, लेकिन जितने ज़्यादा मामले भारत में लंबित है, उन्हें देखते हुए जो सही अनुपात होना चाहिए वो अभी बहुत दूर है".

फ़ास्ट ट्रैक अदालत

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फ़ास्ट ट्रैक अदालतों की कार्य प्रणाली ट्रायल कोर्ट या सेशन कोर्ट की ही तरह होती है. हालांकि इनके पास मूलभूत व्यवस्थाएं थोड़ी बेहतर होती हैं.

आम तौर पर फ़ास्ट ट्रैक अदालतों से एक महीने में लगभग 12 से 15 मुक़दमों को निबटाने की उम्मीद की जाती है.

वर्ष 2000 में जब इन अदालतों के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई थी तब उद्देश्य लंबित मामलों के निबटारे और आरोपियों पर जल्द फ़ैसला लिया जाना था.

हालांकि बाद में इन अदालतों का प्रमुख ध्यान महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के मामलों पर केंद्रित रहा है.

गठन में तेज़ी

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सुप्रीम कोर्ट के वकील सूरत सिंह का मत है कि मानवाधिकार संबंधी सभी मुक़दमों में सुनवाई और फ़ैसले फ़ास्ट ट्रैक अदालतों की तर्ज़ पर ही होने चाहिए.

संसद के पिछले सत्र में क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि पूरे भारत में लगभग 900 फ़ास्ट ट्रैक अदालतें काम कर रहीं हैं.

हाल ही में गृह मंत्रालय ने राज्यों को महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर लगाम कसने के लिए फ़ास्ट ट्रैक अदालतों के गठन की प्रक्रिया तेज़ करने को कहा था.

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