पेरूमल जी, आपकी घोषणा से जीता कौन....

  • 19 जनवरी 2015
पेरुमल मुरुगन

तमिल भाषा के मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन ने अपने फ़ेसबुक पेज पर ये ऐलान किया कि वे लिखना छोड़ रहे हैं.

वे अपने उपन्यास 'मधोरुबगन' के विरोध से गुस्से में हैं और निराश भी. 'मधोरुबगन' का स्थानीय हिंदूवादी और जातिवादी समूह भारी विरोध कर रहे हैं.

मुरुगन पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया जा रहा है. दिसंबर में दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी समूह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने इस किताब की प्रतियां जलाईं थीं.

पढ़िए ब्लॉग

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption सलमान रुश्दी की किताब को लेकर भी काफी विवाद हुआ था.

भाई पेरूमल मुरुगन जी, ये क्या बात हुई कि आपने आइंदा न लिखने की क़सम खा ली. आपका क्या ख़्याल है कि अपनी सब क़िताबें जला देने का एलान करके आपने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया है.

(पढ़ेंः जब फ़ैज़ के रोकी गई ट्रेन)

आपके इस जज़्बाती एलान से वे लोग शर्मिंदा हो जाएंगे जो चाहते हैं कि सब अंधे हो जाएं और ज़बानें कट जाएं और सब के दिमागों का अपहरण हो जाए.

नहीं पेरुमल जी, ऐसा बिलकुल नहीं है. जरा अपनी खिड़की से झांक कर तो देखिए कि वे लोग शर्मिंदा होने की बजाय जीत का निशान बना रहे हैं. तो फिर जीता कौन?

अब वो किसी और की तरफ़ चल पड़ेंगे, बंद करो, बंद करो के नारे लगाते हुए, क्या यही चाहते हैं आप.

'लिखते रहिए'

इमेज कॉपीरइट facebook perumal murugan

आप जैसा महान लेखक यही करेगा तो हम जैसे छुटभइये लिखाड़ किस गिनती में शुमार हैं. इसलिए पेरुमल जी अपना एलान वापिस लें और घोषणा करें कि मैं तो लिखूंगा और लिखता ही रहूंगा.

(पढ़ेंः 'मर गया मुरुगन')

अब पुराने उदाहरण क्या दूं, ये अपने तुर्क लेखक हैं न, उरहान पामुक, उसको तो जेल की सजा भी हो गई थी फिर उसी की तरह की एक और अदालत ने कहा कि पामुक साहब, मिस्टेक हो गई, आप लिखते रहिए.

मंटो पर मुकदमा

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption सआदत हसन मंटो

और पामुक साहब से भी बहुत पहले उर्दू के किस्सागो सआदत हसन मंटो पर नंगे-पुंगे अफ़साने लिखने के पांच मुकदमे ठोंके गए पर हर बार मजिस्ट्रेट ने मुक़दमा करने वाले व्यक्ति से एक ही सवाल पूछा कि ये नंगापन क्या होता है? कोई समझाएगा. सब एक दूसरे को देखने लगे.

(पढ़ेंः फ़ैज़ और पाकिस्तान के बीच का फासला?)

क्योंकि मैं जिसे नंगा समझता हूं, हो सकता है कि वो आपके ख़्याल में नंगा न हो तो फिर? और ये अपने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और जोश मलीहाबादी थे न, नाम तो आपने ज़रूर सुना होगा.

फ़ैज़ की शायरी

इमेज कॉपीरइट
Image caption फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उन पर अयूब ख़ान की सरकार ने पाबंदी लगाई कि रेडियो पाकिस्तान पर उनकी शायरी नहीं बजेगी. क्योंकि दोनों सुरखे हैं और पाकिस्तान की विचारधारा के खिलाफ भी.

आज अयूब ख़ान तो नहीं हैं, लेकिन फ़ैज़ और जोश आज भी हैं. आप ये देखिए पेरुमल जी कि कल का लड़का रायफ़ बदावी जिसे इस तरह के ब्लॉग लिखने के जुर्म में बस एक हज़ार कोड़ों और दस साल कैद की सजा सुना दी गई कि मुझे भी बोलने की आज़ादी दो.

रायफ़ बदावी का मामला

इमेज कॉपीरइट
Image caption रायफ़ बदावी

पचास कोड़े उसकी पीठ पर पड़ भी चुके हैं, मग़र मजाल है कि इस लड़के ने मुंह से 'सी' की आवाज़ भी निकाली है. अब भी वह माफ़ी मांगने की बजाय 950 कोड़े खाने को तैयार बैठा है.

मग़र सुना है कि सउदी सरकार उसकी सजा पर दोबारा ग़ौर कर रही है. पेरुमल मुरुगन साहिब, अच्छे लेखक की एक निशानी ये भी होती है कि उससे सब लोग खुश नहीं रहते हैं.

अगर किसी लेखक से सभी पढ़ने वाले सहमत हो जाएं तो फिर उस लेखक को खुद पर शक करना चाहिए. आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि आपने कुछ ऐसा ज़रूर लिख दिया है कि इससे सामाजिक विभाजन के प्रचारकों की दुम पर पांव पड़ गया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार