'पंडित और मुसलमान एक ही बाग़ के फूल हैं'

पंडित सुभाष और उनकी पत्नी ईशा. इमेज कॉपीरइट Other
Image caption पंडित सुभाष और उनकी पत्नी ईशा.

कश्मीर घाटी में हथियारबंद आंदोलन शुरू होने के साथ ही कश्मीर में रहने वाले लाखों पंडित कश्मीर छोड़ कर चले गए और भारत के दूसरे शहरों में पनाह ली.

बीते सालों में कुछ पंडित परिवार कश्मीर में वापस अपने घरों को लौटे हैं.

घाटी के ज़िला अनंतनाग के मटन इलाक़े में पंडित सुभाष अपने परिवार समेत वापस आ चुके हैं जो अपनी पत्नी और अपने दो छोटे बच्चों के साथ अपने कच्चे मकान में रहते हैं.

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पंडित सुभाष एक बैंक कर्मचारी हैं. कश्मीर से बाहर बिताए अपने 20 सालों को याद करते हुए वे कहते हैं, "कश्मीर से जाने के बाद हमें क़दम-क़दम पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा. रहने के लिए अपना घर नहीं था जिसकी कमी महसूस होती थी."

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पंडित सुभाष इस बात से ख़ुश नहीं हैं कि उन्हें अपनी शादी का जश्न कश्मीर से बाहर मनाना पड़ा.

उनका कहना है, "कश्मीर में शादी का उत्सव कुछ अलग ही होता है. मुझे अपनी शादी जम्मू में करनी पड़ी जहाँ ऐसा कुछ नहीं था."

मातृभूमि वापस

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Image caption पंडित सुभाष की पत्नी ईशा अपनी पड़ोसी के साथ.

कश्मीर घाटी वापस लौटने पर सुभाष बहुत ज़्यादा ख़ुश हैं. इस ख़ुशी का कारण अपनी मिट्टी की ख़ुशबू और मुसलमानों के साथ उनका पारंपरिक रहन-सहन.

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पंडित सुभाष की पत्नी ईशा उस समय आठवीं क्लास की छात्र थीं जब उनका परिवार कश्मीर छोड़कर बाहर चला गया था.

ईशा भी अब बहुत ख़ुश हैं कि वो अपनी मातृभूमि वापस लौट आई हैं.

कश्मीर वापस

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Image caption पंडिट सुभाष अपने दोस्त मोहम्मद अब्बास के साथ.

ईशा कहती हैं, "कम से कम यहाँ हम अपने घर में रह रहे हैं. जम्मू की ज़िन्दगी तो नर्क थी, एक ही कमरे में सोना, खाना, मेहमानों को बिठाना और न जाने क्या-क्या सहना पड़ता था. अब हम कश्मीर में वापस आ कर ख़ुश हैं. यहाँ के मुसलमान पड़ोसी भी हमारा ख़्याल रखते हैं."

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पंडित सुभाष के मोहम्मद अब्बास भी ख़ुश हैं कि उनके पंडित पड़ोसी वापस आ गए हैं.

वह कहते हैं, "हम तो चाहते हैं कि सब आएं और अपने घरों में रहें. कश्मीर के पंडित और मुसलमान एक ही बाग़ के फूल हैं जो साथ-साथ अच्छे लगते हैं."

सरकारी पैकेज

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Image caption कश्मीरी पंडित रंजन.

कश्मीर में ऐसे भी कुछ पंडित वापस आ गए हैं जो साल 2010 में भारत सरकार के एक पैकेज के तहत कश्मीर आएं हैं.

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इस पैकेज के तहत वापस आए पंडितों को सरकारी नौकरी के अलावा रहने के लिए फ़्लैट दिए गए लेकिन सरकार की तरफ़ से दी गई रिहाइश से ये लोग ख़ुश नहीं हैं.

37 वर्षीय पंडित रंजन भी भारत सरकार के इसी पैकेज के तहत कश्मीर लौटे थे लेकिन सरकार की ओर से दिए गए घर से वह ख़ुश नहीं हैं.

कश्मीर से बाहर

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Image caption कश्मीर घाटी में खंडहरों में तब्दील होते मंदिर.

रंजन कहते हैं, "मैं तो ख़ुश हूँ कि मैं वापस कश्मीर आ गया लेकिन अपने परिवार को कहां रखूँ. सरकार ने जो रिहाइश दी है, उसमें चार लोगों का परिवार नहीं रह सकता. पहले कश्मीर से बाहर दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं और अब भारत सरकार ने कहीं का नहीं छोड़ा. भारत सरकार को अपना वादा पूरा करना चाहिए."

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रंजन के मुताबिक़ कश्मीर से बाहर उनके परिवार को अलग-अलग होकर रहना पड़ा क्योंकि उन्हें ऐसा मकान नहीं मिला जिसमें उनका पूरा परिवार एक साथ रह सके.

घाटी में वापस आ रहे कश्मीरी पंडितों की एक शिकायत सालों की उपेक्षा के कारण खंडहर जैसे हो चुके मंदिरों को लेकर भी है. कश्मीर में हिन्दू मंदिरों की हालत ठीक करने की मांग पंडित भी कर रहे हैं और मुसलमान भी.

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