दुर्गति पर चुप्पी कब तोड़ेंगे राहुल गांधी?

  • 24 जनवरी 2015
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देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने हाल ही में अपना 130वां स्थापना दिवस मनाया.

समारोह में पार्टी कैसे और क्यों भावनात्मक मुद्दों पर ठीक से अपना पक्ष नहीं रख पा रही है, इस पर एक आंतरिक बहस भी चली, लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

उदाहरण के लिए धर्म परिवर्तन के मामलों में कांग्रेस की प्रतिक्रिया बहुत सतर्कता भरी रही है.

पार्टी जब एक अभूतपूर्व संकट के दौर से गुज़र रही है, राहुल गांधी फिर भी अपनी संवाद की रणनीति नहीं बदल रहे हैं.

नेतृत्व की वैचारिक उहापोह सवा सौ साल पुरानी पार्टी को गर्त में ले जा रहा है.

पढ़ें पूरा विश्लेषण

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Image caption जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी

जब एक समाचार चैनल ने एक स्टोरी चलाई कि नरेंद्र मोदी सरकार के पहले छह महीने में गोमांस का निर्यात बढ़ा है, तो कांग्रेस इस पर टिप्पणी करने से घबरा गई.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की प्रदेश इकाई ने ख़ुद को हिंदू पहचान से जोड़ने के लिए पार्टी कार्यालय में गणेश की मूर्ति रखना शुरू किया, लेकिन हाई कमान से इसे हरी झंडी नहीं मिल पाई.

असल में धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की विचारधारा का एक अभिन्न हिस्सा रहा है.

भारतीय संदर्भ में, धर्मनिरपेक्षता को लेकर कांग्रेस का आशय है सभी धर्मों को सम्मान और सभी धर्मों और समुदायों की सुरक्षा.

धर्मनिरपेक्षता पर यह विचार पहली बार 1928 में नेहरू की रिपोर्ट में और 1931 में लंदन में हुए दूसरे गोल मेज़ सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी की ओर से आया. बाद में कांग्रेस ने इसे अपना लिया.

सितम्बर 1951 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्लयूसी) में मौजूद दक्षिणपंथी कांग्रेस अध्यक्ष पीडी टंडन समेत उनके समूह के सभी सदस्यों ने नेहरू को अपना इस्तीफ़ा दे दिया.

यह शायद संयोग ही रहा कि उसी महीने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को लेकर भारतीय जन संघ की औपचारिक स्थापना हुई.

सेक्युलर छवि

टंडन के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष बने नेहरू ने 1951 में गांधी की जयंती पर राम लीला मैदान में पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा, "यदि कोई भी धर्म के नाम पर दूसरे पर हाथ उठाता है तो मैं अंतिम सांस तक उसके साथ संघर्ष करूंगा, यह चाहे सरकार के अंदर से हो या बाहर से."

हालांकि बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद हुई घटनाओं ने कांग्रेस की इस प्रतिबद्धता को धूमिल किया.

मुस्लिम नेता और धर्मगुरुओं ने नरसिम्हा राव की सरकार पर संकीर्ण बहुमतवाद का आरोप लगाया और कांग्रेस के अंदर भी धर्मनिरपेक्षता पर पुनर्विचार का दबाव बढ़ने लगा.

राव और सीताराम केसरी के समय ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता रहे वीएन गाडगिल ने नब्बे के दशक के मध्य में एक प्रशिक्षण शिविर में कांग्रेसियों से कहा था कि उन्हें कांग्रेसी नेताओं की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति मंज़ूर नहीं.

पहचान का संकट

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उन्होंने 'द इकोनॉमिस्ट' में प्रकाशित एक कहानी का ज़िक्र करते हुए यह कहा था, जिसका शीर्षक था- 'इस्लाम और लोकतंत्र साथ-साथ नहीं चलते.'

जब गाडगिल से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "इस देश की आबादी में मुसलमान 18 प्रतिशत और हिंदू 82 प्रतिशत हैं. यदि सभी मुस्लिम कांग्रेस को वोट दे दें तब भी पार्टी सत्ता में नहीं आएगी."

जब 1998 में कांग्रेस की बागडोर सोनिया गांधी ने संभाली तो उन्होंने गाडगिल की बात को संतुलित करने की कोशिश की.

वर्ष 1999 में विवेकानंद की सालगिरह पर उन्होंने कहा, "भारत हिंदुओं के कारण ही मूल रूप से सेक्युलर था, जो कि इस फ़लसफ़े और जीने की शैली पर आधारित है जिसे हमारे पुरखों ने 'सत्य एक है' कहा था."

उसी साल 16 जनवरी को सीवीसी की बैठक में धर्मनिरपेक्षता को लेकर एक प्रस्ताव पास किया गया.

इसमें कहा गया कि, ''सीवीसी सोनिया गांधी के उस भाषण का समर्थन करती है.''

उहापोह

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नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के 16 मई 2014 के उदय के बाद एके एंटनी, ग़ुलाम नबी आज़ाद और जनार्दन द्विवेदी जैसे कांग्रेसी नेता चाहते हैं कि सोनिया-राहुल पार्टी का हिंदू समर्थक चेहरा सामने लाएं.

लेकिन बहुत से कांग्रेसी मानते हैं कि यह आत्मघाती होगा.

लेकिन सोनिया-राहुल ने इस मुद्दे से बच निकलने की रणनीति अपनाई, जिसने बहुतों को निराश किया है.

वैचारिक उहापोह ने वर्तमान कांग्रेस को, लगातार चुनावी हार से अधिक ख़तरा पैदा किया है.

निष्क्रियता के इस दौर में यदि राहुल गांधी इंडिया टुडे के 23 अगस्त 2010 का अंक देखें तो उन्हें ख़ुश होने की कुछ वजह मिल जाएगी.

इस अंक के मुख्य पृष्ठ पर राहुल गांधी की तस्वीर के साथ शीर्षक है- 'द कैटेलिस्ट.' 19 राज्यों के 98 संसदीय क्षेत्रों में कराए गए एक सर्वेक्षण में उन्हें 13 अंक दिए गए, जो कि अटल बिहारी वाजपेयी से भी अधिक था.

राहुल पर सवाल

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लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि गांधी परिवार के युवा वारिस, जो चार साल पहले तक प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में थे, अब राजनीतिक रूप से छाया मात्र रह गए हैं.

पार्टी के अंदर से आती दबी ज़ुबान में आलोचना और कभी-कभी सार्वजनिक रूप से भी आलोचना के बीच उन्हीं की पार्टी के नेता संदीप दीक्षित ने राहुल के 'कांग्रेस के एक गुट' के नेता होने तक सीमित होने का डर ज़ाहिर किया है.

यदि अगस्त 2010 से अब तक राहुल की राजनीतिक 'चूकों' का लेखा जोखा तैयार किया जाए तो इसके लिए एक खंड भी काफ़ी नहीं होगा.

मनमोहन कैबिनेट में शामिल न होना, कांग्रेस संगठन को मज़बूत न कर पाना, संवाद की ख़राब रणनीति और सोशल मीडिया के प्रति उपेक्षा का भाव उनके लिए घातक सिद्ध हुआ.

उत्तर प्रदेश में उपस्थिति दर्ज कराने में असफल रहने के अलावा, उन्होंने यूथ कांग्रेस और छात्र संगठन एनएसयूआई पर समय, संसाधन और ऊर्जा को बहुत ख़र्च किया, ख़ासकर आंतरिक पार्टी लोकतंत्र मज़बूत करने में.

लेकिन आज जब पार्टी संकट में है तब उन एक करोड़ प्रतिबद्ध और लोकतांत्रिक कांग्रेसी युवाओं का कहीं निशान भी नहीं दिखता. कहां गए वे?

संजय गांधी का तरीक़ा

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जबकि संजय गांधी के ज़माने में उदय हुआ शीर्ष युवा नेतृत्व अभी भी कांग्रेस की जान बने हुए हैं.

उनके नेतृत्व में ग़ुलाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, कमल नाथ, अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह, जगदीश टाइटलर, वायलार रवि, ऑस्कर फर्नांडिस और स्वर्गीय वीर बहादुर सिंह की पीढ़ी आई थी.

संजय ब्लॉक स्तर पर भी अपनी पसंद थोपते थे. उनकी पसंदीदा कहावत थी- 'मुझे सहमत कराएं.' और कांग्रेसी नेताओं को पार्टी फ़ोरम पर अपने विचार रखने के लिए प्रोत्साहित करते थे.

संजय और राजीव गांधी ने राजनीति के तौर तरीक़ों को बदलने की कोशिश की.

संजय ने स्थापित पार्टी नेताओं पर सवाल खड़े किए और हर राज्य में अपना समानांतर शासन स्थापित किया. यहां तक कि इंदिरा के वफ़ादारों को भी नहीं छोड़ा गया.

राजीव ने भी पार्टी को 'साफ़' करने की कोशिश की थी. हालांकि उनका प्रयास आधे मन से किया गया था.

लेकिन वो पार्टी के युवा नेतृत्व के बीच लोकप्रिय बने रहे. राहुल की सबसे बड़ी कमी है, अतीत की ग़लतियों से न सीखने की इच्छा.

कहां गए राहुल?

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मई 2014 को आए कई महीने गुज़र गए हैं, लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष ने अपनी संवाद रणनीति सुधारने के लिए कुछ भी नहीं किया.

नई दिल्ली के पार्टी कार्यालय में उनकी मौजूदगी का कोई निशान नहीं दिखता.

यह साफ़ समझ नहीं आता कि कांग्रेस संसदीय समिति का गठन क्यों नहीं हुआ.

यह सच है कि कांग्रेस के लिए यह मुश्किल भरा समय है. अंदरूनी झगड़े, अशांति, बेचैनी के अलावा उसे आक्रामक मीडिया और विपक्षियों का सामना करना पड़ रहा है.

ऐसी स्थिति में राहुल गांधी के हर कार्यकलाप पर कड़ी नज़र है. इसलिए इस समय नापतौलकर बोलना उनके लिए बुद्धिमता वाला है.

लेकिन आज के कांग्रेस में बहस और राष्ट्रीय महत्व के मुख्य मुद्दों पर विचार बीते ज़माने की बात हो गई है.

ताज्जुब है कि क्यों तमाम मुद्दों पर बहस के लिए सीवीसी की नियमित बैठक नहीं होती है. या तो विद्वान काउंसिल कंगाल हो गई है या नेतृत्व में इन मुद्दों का सामना करने का साहस या मंशा नहीं है.

दोनों ही स्थितियों में एक पुरानी पार्टी का पतन दुखद है.

चुप्पी तोड़ना होगा

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राहुल को यह समझना चाहिए कि जो पार्टी ख़ुद की, अपने अंदरूनी संस्थाओं की इज़्जत नहीं करती, वह जब भी किसी मुद्दे पर विचार रखती है तो वो खोखला नज़र आता है.

राहुल गांधी के कंधों पर सबसे पहली ज़िम्मेदारी आत्ममंथन करने और ख़ुद को निखारने की है.

यदि उन 10 करोड़ लोगों से संवाद करना वाक़ई गंभीर बात है, जिन्होंने पिछले लोकसभा में कांग्रेस का साथ दिया था, तो राहुल को पार्टी फ़ोरम, संसद, मीडिया और सोशल मीडिया आदि पर अधिक संवाद करने की ज़रूरत है.

उन्हें अपनी निज़ी ज़िंदगी, विदेशी दौरों और चुप्पी को तोड़ना होगा. आज कांग्रेसी पूछ रहे हैं कि, "तू इधर, उधर की ना बात कर/ये बता कि काफ़िला क्यों लुटा/हमें रहज़नों से ग़िला नहीं/तेरी रहबरी का सवाल है."

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