मुद्दे ग़ायब, केजरी बनाम किरण की ही चर्चा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'परम मित्र बराक' तीन दिन की मेहमाननवाज़ी का लुत्फ़ उठाकर चले गए. 'पाइड पाइपर' की तरह लगभग पूरा मीडिया उनके पीछे लगा रहा. सोशल मीडिया पर भी बराक ओबामा की धूम रही.

क्या पहना, क्या खाया, सुरक्षा के लिए कितने कुत्ते आए, मोदी से कितनी बार हाथ मिलाया या गले लगाया, अपना छाता ख़ुद उठाया ...पल पल का ब्योरा मिलता रहा. रही सही कसर ओबामा के च्युइंगम ने पूरी कर दी.

ओबामा के आने से दो दिन पहले से लेकर ओबामा के जाने तक, ऐसा लगा मानो लोग इस बात को भूल ही गए कि जिस दिल्ली में ओबामा आए, वहाँ कुछ दिन बाद ही अहम चुनाव होने वाला है. ओबामा प्रवास के दौरान दिल्ली चुनाव और उससे जुड़े मुद्दों का ज़िक्र गाहे बगाहे ही हुआ.

ग़ायब होते मुद्दे

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कुछ अपवादों को छोड़ दें तो बीते दिनों मीडिया वाले दिल्लीवालों के बीच पहुँचे तो सही, पर ये जानने के लिए कि ओबामा के आने पर कैसा महसूस हो रहा है, बजाए इसके कि चुनाव में उनके लिए क्या बड़े मुद्दे हैं.

ख़ैर ओबामा तो चंद दिन के मेहमान थे जो आए और चले गए. लेकिन उनके आने से पहले भी दिल्ली चुनावों को लेकर जो चर्चा या बहस हुई, उसमें मुद्दों से ज़्यादा शख़्सियतों की बात ज़्यादा नज़र आ रही है.

ऐसा नहीं है कि दिल्ली चुनाव मुद्दाविहीन है..बिजली, सड़क, झुग्गियों की समस्या, महिला सुरक्षा कई ऐसे मुद्दे हैं जिनका हल लोगों को चाहिए. लेकिन दिल्ली चुनाव की अब तक की चर्चा मुद्दों पर न होकर कुछ हस्तियों की जंग ज़्यादा बनती जा रही है.

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बहस किरण बनाम केजरीवाल की ज़्यादा हो रही है जिसमें मुद्दे गौण नज़र आते हैं. इसका अंदाज़ा अख़बारों, चैनलों की सुर्खियों और सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने वाली चीज़ों से भी लग जाता है.

मसलन कुछ बयानों पर नज़र डालें....“केजरीवाल ने किरण बेदी से कहा अब तो हमें ट्विटर पर अनब्लॉक कर दीजिए”, “केजरीवाल ने किरण बेदी को चुनाव से पहले डिबेट की चुनौती दी”, “गणतंत्र दिवस समारोह में शिरकत करने वाली किरण बेदी ने समारोह में न बुलाए जाने पर ‘रोने-धोने’ के लिए केजरीवाल की खिल्ली उड़ाई”, “भाजपा ने केजरीवाल को किरण बेदी की तस्वीर छापने पर नोटिस भेजा” या फिर ''किरण बेदी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बनने से भाजपा कार्यकर्ता नाराज़...''

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और तो और जब किरण बेदी चुनावी सभा में बोलीं तो भी ओबामा का ही ज़िक्र आया. किरण बेदी ने चुनाव प्रचार में कहा था, "आज ओबामा आए हैं और पूरा भारत उड़ रहा है. मोदी ने बहुत कुछ किया है. ओबामा ऐसे ही नहीं आ जाते हैं."

जनता के दिल की बात

इन बयानों में दिल्ली की जनता के मुद्दों का आभास कम ही होता है.

कांग्रेस से भी जब ख़बर आई तो कुछ इसी तरह की आई कि उनके मुख्य सेनापति अरविंदर सिंह लवली चुनाव नहीं लड़ेंगे और अजय माकन कमान संभालेंगे. लेकिन किन मुद्दों पर कमान संभालेंगे इसकी चर्चा एक दूसरे की खिल्ली उड़ाते एफ़एम स्टेशनों के विज्ञापनों में ही ज़्यादा सुनाई देती है.

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किसी भी चुनाव में शख़्सियतें हमेशा रहती हैं और लोग उनके नाम पर वोट भी देते हैं. शायद इसीलिए तो किसी के नाम की लहर चलती है. लेकिन दिल्ली चुनाव केवल हस्तियों के टकराव का खेल ज़्यादा नज़र आ रहा है.

ख़ैर ओबामा का ख़ुमार उतरने के बाद अभी चुनाव प्रचार में कुछ दिन बाकी हैं. ओबामा और मोदी की मन की बात तो हो गई, अब बारी शायद जनता के दिल की बात सुनने की है.

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