जब आरके लक्ष्मण 'कॉमन मैन' से मिले

मैं इतना खुशकिस्मत तो नहीं था कि आरके लक्ष्मण के साथ काम करता, पर मैं उन्हें जानता था.

जिस समय मैंने 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ज्वाइन किया, उन्होंने दफ़्तर आना बंद कर दिया था.

वे पुणे जा चुके थे और ज़्यादातर समय व्हीलचेअर पर ही रहा करते थे.

2003 में पड़े दिल के दौरे के बाद उनके शरीर का बायां हिस्सा लकवे का शिकार हो गया था. पर दवा लेने और फ़ीजियोथेरैपी के बाद उन्होंने एक बार फिर कार्टून बनाना शुरू कर दिया था.

भारत जो कुछ भी है, उसे दर्शाने वाला उनका कार्टून ‘कॉमन मैन’ टाइम्स के ‘यू सेड इट’ कॉलम के रूप में एक बार फिर छपने लगा था.

अक्षय कुमार को ऑटोग्राफ़

लक्ष्मण को 2010 में कई बार दिल के दौरे पड़े और इस बार उनके शरीर का दायां हिस्सा बेकार हो गया. उनकी आवाज़ चली गई और उनके शरीर ने हमेशा के लिए हिलना डुलना तक बंद कर दिया.

मैं जब उनसे अंतिम बार मिला, वे ब्रीच कैंडी अस्पताल में बिस्तर पर पड़े हुए थे और ज़िदा रहने के लिए मेडिकल उपकरणों के सहारे ही थे.

मैंने अपनी मॉ ब्लां क़लम उन्हें थमाया और पैड भी वहां रख दिया. और वे काफ़ी तक़लीफ़ से ही सही, एक बार फिर शुरू हो गए. पर उन्होंने कोई कार्टून नहीं बनाया. उन्होंने फ़िल्म अभिनेता अक्षय कुमार को ऑटोग्राफ़ दिया. ख़ैर, इसकी एक अलग कहानी है.

मैं उस पीढ़ी का पत्रकार नहीं हूं जिसने लक्ष्मण को झक्क सफ़ेद बुश शर्ट और करीने से प्रेस की गई काली पतलून में टाइम्स हाउस के गलियारें में तेज़ी से चलते हुए देखा था. मैं उन्हें बाहर से जानता था.

वो यादगार इंटरव्यू

वर्ष 1990 में इसराइल के मशहूर कार्टूनिस्ट जे’एव (याकव फ़ारकोष) एक प्रदर्शनी के सिलसिले में मुंबई आए हुए थे. जे’एव इसराइली अख़बार ‘हारेज़’ में 40 वर्षों से छपते आए थे और उन्हें अपने देश का आरके लक्ष्मण कहा जाता था.

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मेरे दोस्त और मशहूर कार्टूनिस्ट मारियो मिरांडा ने सुझाव दिया कि मैं लक्ष्मण और जे’एव का इंटरव्यू एक साथ करूं. मैं एक क़दम आगे निकल गया. मैंने उन दोनों के साथ मिरांडा को भी लेकर इंटरव्यू किया.

इसराइली वाणिज्य दूत के घर पर हुए इंटरव्यू के दौरान तीनों कार्टूनिस्ट खाना खाते हुए एक दूसरे पर कटाक्ष करते, एक दूसरे के मजे लेते रहे.

लक्ष्मण 2008 में मुंबई आए तो टाइम्स के ब्रांच मैनेजर के घर उनके सम्मान में भोज रखा गया. मैं उस बार भी उनसे मिला. पर इस बार लक्ष्मण ने कुछ नहीं कहा, वे बस चुपचाप बैठे रहे. पर मानो उनकी आंखें शरारत से चमकती रहीं.

'कॉमनमैन' से प्रेरणा लेकर बनी फ़िल्म

और अब मैं उस कहानी के बारे में बताऊं. दरअसल यह विचार अक्षय कुमार का था. वे 2010 में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म ‘खट्टा मीठा’ में एक क़िरदार निभा रहे थे.

यह फ़िल्म सिद्धांतहीन राजनीतिक वर्ग और भ्रष्ट अफ़सरशाही पर हल्का फुल्का व्यंग्य था. इसमें अक्षय कुमार का क़िरदार कॉमन मैन से प्रेरित था.

अक्षय कुमार चाहते थे कि फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले मैं उन्हें लक्ष्मण से मिलवा दूं. हम लोग एक दिन ब्रीच कैंडी अस्पताल गए.

दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्हें घंटे भर में पुणे से मुंबई एअर एंबुलेंस से लाया गया था. उनकी पत्नी ने बताया कि किस तरह पुलिस एस्कॉर्ट में उन्हें किसी तरह मुंबई लाया गया.

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उन्हें अस्पताल देखने आने वालों में छगन भुजबल भी थे. यह बड़ी बात थी, क्योंकि लक्ष्मण ने राजनेताओं को सबसे ज़्यादा निशाना बनाया था.

वागले की दुनिया

पद्म विभूषण पुरस्कार लेते हुए इस कार्टूनिस्ट ने कहा था कि वे यह पुरस्कार राजनेताओं के साथ स्वीकार कर रहे हैं. उन्होंने कहा था, "मेरी रोज़ी रोटी आख़िरकार इन नेताओं के बल पर ही तो चलती है."

जब मैं अक्षय के साथ अस्पताल गया तो लक्ष्मण उन्हें नहीं पहचान पाए. उनकी पत्नी ने कहा कि यह ‘बहुत बहुत बहुत मशहूर’ कलाकार हैं. अक्षय सिर्फ इतना कह पाए, "आप चाहें जो कहें, उन्हें बस इतना बताएं कि मैं फ़िल्म में जो क़िरदार कर रहा हूं वह ‘कॉमन मैन’ से मिलता जुलता है."

लक्ष्मण की पत्नी कमला को एक बार तो यक़ीन ही नहीं हुआ. उन्होंने अक्षय का हाथ पकड़ सिर्फ इतना कहा, "क्या सचमुच!"

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तब तक आर के लक्ष्मण सजग नजरों से अक्षय कुमार को देखते रहे. थोड़ी त्यौरियां चढ़ीं हुई थीं. उनकी दिलचस्पी बॉलीवुड में एकदम नहीं थी.

कमला ने हमें बताया, "वे बोल चाल की हिंदी समझ पाते हैं, बस. टीवी धारावाहिक वागले की दुनिया के आम आदमी की भाषा और संघर्ष से वे प्रभावित रहे हैं."

इस दौरान हमने देखा कि अस्पताल का उनका कमरा दूसरे मरीजों, पर्यटकों और नर्स, वॉर्ड ब्वॉय और क्रोधित डॉक्टरों से भर गया था.

‘कॉमन मैन’ का जीवन

अक्षय कुमार लक्ष्मण का हाथ पकड़ कर काफ़ी देर बैठे रहे. उन्होंने कमला से कहा, "ये निश्चत रूप से दो हफ़्तों में ठीक हो जाएंगे और फ़िल्म भी तब तक रिलीज हो जाएगी. क्या मैं फ़िल्म की डीवीडी आपको भेज दूं?"

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कमला ने पूरे विश्वास से कहा, "तब तक ये स्वस्थ होकर पुणे लौट जाएंगे."

लक्ष्मण की आत्मा को शांति मिले. वे चले गए, पर उनका कॉमन मैन आज भी ज़िंदा है. जैसा लक्ष्मण ने ख़ुद कहा था, "इस शख़्स ने अपना जीवन जिया है."

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