क्या मोदी चीन को घेरना चाहते हैं?

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भारत और अमरीका के बीच परमाणु दायित्व पर हुई 'महत्वपूर्ण प्रगति' और दोनों देशों के व्यक्तिगत संबंधों से भी ज़्यादा नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा की यह मुलाक़ात, चीन के ख़िलाफ़ अमरीका से हाथ मिलाने के भारत के घातक निर्णय के लिए याद की जाएगी.

अमरीकी नीति सोवियत संघ को नियंत्रित करने के लिए उसके ख़िलाफ़ एक लंबे संघर्ष की उपज थी. अब इस नीति के निशाने पर चीन आ गया है.

ये स्पष्ट है कि मोदी अमरीका, जापान और आस्ट्रेलिया को ये भरोसा दिलाना चाह रहे हैं कि उन्हें चीन से जो चुनौती मिल रही है उस चुनौती से निपटने में भारत उनके साथ है. भारत की विदेश नीति में यह सबसे बड़े बदलाव को दिखाता है.

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पिछले 25 जनवरी को भारत-अमरीका के संयुक्त बयान में 'एशिया-प्रशांत एवं हिंद महासागर क्षेत्र में अमरीका-भारत की संयुक्त रणनीतिक परिकल्पना' से साफ दिखाई देता है कि भारत चीन के ख़िलाफ़ अमरीकी नीति का समर्थन कर रहा है.

बयान में एशियाई शक्तियों के बीच संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया गया है. एशियाई शक्तियों को ऑस्ट्रेलिया और जापान के संदर्भ में कहा गया है.

न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में इसकी पुष्टि कुछ अमरीकी अधिकारी कर चुके हैं, उनके अनुसार, मोदी और ओबामा के बीच मुलाक़ात के पहले 45 मिनट में चीन का मुद्दा हावी रहा.

उन्होंने अख़बार को बताया कि मोदी ने इस इलाक़े में अमरीका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक ढीले ढाले सुरक्षा तंत्र को फिर से मजबूत करने का सुझाव दिया है.

असल में मोदी ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि चीन का जवाब दिया जा सके. भारत की विदेश नीति में यही सबसे बड़ा बदलाव है.

जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भारत के साथ परमाणु साझेदारी का दरवाजा खोला, क्योंकि वह उभरते चीन के ख़िलाफ़ एक घेराबंदी चाहते थे.

मोदी की नीति

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उसके बाद जब ओबामा राष्ट्रपति बने तब अमरीका की प्राथमिकताएं बदल चुकी थीं. वह नवंबर 2009 में बीजिंग में हू जिंताओ से मिले तो दोनों पक्षों ने दक्षिण एशिया से जुड़े मुद्दों पर सहयोग पर सहमति जताई और इसने नई दिल्ली की बेचैनी बढ़ा दी थी.

भारत और अमरीका 2009 के बाद जिस चीज़ पर काम कर रहे थे वह परमाणु दायित्व या दूसरे आर्थिक मुद्दे नहीं थे, बल्कि अमरीका के वैश्विक और क्षेत्रीय रणनीति के गणित में भारत की कमतर भागीदारी थी.

हालांकि, अमरीका और चीन के बीच उभरते मतभेदों से खुद को दूर रखते हुए भारत कोशिश कर रहा था कि उसके दोनों देशों से संबंध बने रहें और उसे इस खेल में खाली हाथ मलते न रह जाना पड़े.

लेकिन मोदी भारत को जिस स्थिति में पहुंचा रहे हैं जहां कुछ हासिल कर पाने की उम्मीदें लगातार क्षीण होती जाएंगी.

वाजपेयी का गुप्त पत्र

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नरेंद्र मोदी ओबामा की आवभगत इसलिए कर रहे हैं ताकि चीन पर द्विपक्षीय संबंधों में ज़्यादा हासिल किया जा सके तो अमरीकी पक्ष की ओर से बातचीत का लीक किया जाना इसे और मुश्किल बनाएगा.

कुछ ऐसा ही 1998 में हुआ था जब बिल क्लिंटन ने अटल बिहारी वाजपेयी का वह गुप्त पत्र लीक कर दिया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि भारत ने सिर्फ़ चीन के कारण परमाणु हथियार का परीक्षण किया.

हाल के सालों में सीमारेखा संबंधी अपने तीखे दावों से चीन ने भारत को बहुत बेचैन किया है, लेकिन भारत को इस चुनौती से खुद ही निपटना है.

शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठ, उकसावे वाली एक बड़ी घटना थी.

लेकिन मोदी ने जब जापान और चीन के समुद्री विवाद में जापान का पक्ष लेते हुए कहा था कि दूसरे से समुद्री इलाकों में चीन एक 'विस्तारवादी शक्ति' और 'अतिक्रमणकारी' है तो क्या उन्होंने सोचा था कि वो चीन को डराकर भारत में उसके घुसपैठ रोक रहे हैं?

ख़तरा ज़्यादा

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क्या मोदी को लगता था कि भारत के भूगोलीय विवादों में जापान और अमरीका, भारत का पक्ष लेंगे?

क्या पिछले साल भारत-अमरीका के बीच दक्षिणी चीन सागर का संदर्भ यह भरोसा दिलाता था कि भारत एक सक्षम देश है या यह चीन के लिए श्रीलंका में अपनी पनडुब्बी भेजने का निमंत्रण था?

भारत, वियतनाम और जापान जैसे चीन के पड़ोसियों से संबंध मजबूत कर सकता है और करना ही चाहिए. साथ ही इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया जैसे उभरते पूर्वी एशियाई शक्तियों से भी संबंध बढ़ाना चाहिए.

लेकिन अमरीका और इसके गठबंधन तंत्र से खुद को बहुत क़रीबी से जोड़ना ख़तरनाक़ मोर्चा खोलने जैसा है. इसमें लाभ से कहीं ज़्यादा ख़तरा है.

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