'मिलिनेयर' से 'स्लमडॉग' बनी कांग्रेस बदलेगी?

  • 31 जनवरी 2015
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विकास स्वरूप की किताब ‘क्यू एंड ए’ के मुख्य पात्र का मूल नाम जो रहा हो, किरदार का नाम राम मोहम्मद थॉमस हो गया. कभी सुविधा की दृष्टि से तो कभी मजबूरी में, उसके नाम में नए शब्द जुड़ते गए और उसने हर नाम के साथ मिले अनुभवों का पूरा लाभ उठाया, विजेता बनने तक.

कांग्रेस पार्टी की कथा-पटकथा विकास ने नहीं लिखी. उस फ़िल्म का निर्देशन डैनी बॉयल ने नहीं किया और ज़ाहिर है, उसे दस नामांकन और आठ ऑस्कर नहीं मिले. टिकट खिड़की पर भीड़ नहीं जुटी. सत्ता के लिए जनता का समर्थन तक नहीं मिला.

उलटे, एक सौ तीस साल पुरानी कहानी बिखर गई. कोई बड़ा ईनाम नहीं मिला, भारी फ़ज़ीहत ऊपर से. ‘मिलिनेयर’ बनी नहीं, ‘स्लमडॉग’ बनकर रह गई. पिछले आम चुनाव में 206 से लुढ़ककर 44 पर आ गई.

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लेखकीय छूट के साथ कांग्रेस के इस चरित्र का नामकरण किया गया होता तो शायद उसे ‘डोंगरिया घाट अडानी’ कहा जाता. यह नाम भी राम मोहम्मद थॉमस की तरह अटपटा है, लेकिन सर्व धर्म समभाव के सतही अर्थ की तुलना में ज़्यादा सार्थक.

‘डोंगरिया घाट अडानी’ वज़न में भारी बैठता और स्वरूप में अधिक विस्तृत. उसी तरह अनुभव-जनित.

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कांग्रेस पार्टी में यह सारा बदलाव मुख्यतः पिछले पांच वर्ष में आया. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की पहली सरकार तक उसका नाम कांग्रेस ही था. सन 2009 के चुनाव के बाद उसमें ‘बड़ा बदलाव’ आने की प्रक्रिया शुरू हुई और नतीजे 2014 में सामने आए.

इस प्रक्रिया में बाक़ी जो बदलना था शायद नहीं बदला, लेकिन आम जनता के मन में उसका नाम ज़रूर बदल गया.

तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव पर आंखें गड़ाए हुए थे. यह बात इशारों में कही जा रही थी कि आख़िर कांग्रेस में हो क्या रहा है? कौन इसके पीछे है? सीधा और सप्रमाण उल्लेख नहीं के बराबर था.

तिलिस्म

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हाईकमान की कड़वी आलोचना को चाशनी में लपेटकर पेश करने की कांग्रेस की ‘महान परंपरा’ संभवतः इसकी एक वजह थी. यह डर भी कि किसी दिन वक़्त बदला तो उनका क्या होगा.

राजनीतिक हाईकमान कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, होता एक तिलिस्म ही है. उसका टूटना बनने के साथ तय हो जाता है. यह बात दीगर है कि कुछ तिलिस्म जल्दी टूटते हैं, कुछ में वक़्त लगता है.

ख़ासकर वे हाईकमान, जो तिलिस्म को कला के स्तर तक पहुंचा देते हैं. लोगों को उनके बिखराव में ललित कला नज़र आने लगती है.

कांग्रेस हाईकमान को झटका लगने में लंबा समय लगा. चुनाव में मटियामेट होने के बाद भी आठ महीना. पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंती नटराजन ने पहली बार बिना चाशनी वाली बेलाग आलोचना सामने रखी तो जैसे पार्टी में बहुत लोगों को ज़ुबान मिल गई.

अंदर से वार

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राहुल गांधी की लोकप्रियता और क़ाबिलियत पर लगा यह प्रश्नचिह्न विपक्ष की सारी आलोचनाओं पर भारी पड़ सकता है. यह अंदर से हुआ वार है और दलित के घर खाना खाने जैसी छिछली आलोचनाओं से कई गुना अधिक भारी-भरकम है.

हो सकता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखा पत्र जयंती नटराजन के लिए पार्टी के सारे दरवाज़े हमेशा के लिए बंद कर दे, लेकिन वह पार्टी को मजबूर करेगा कि वह ‘डोंगरिया घाट अडानी’ के बारे में गंभीरता से सोचे.

जयंती ने राहुल गांधी की ओर से हुए ‘हस्तक्षेपों’ को ‘अनुरोध’ कहा, लेकिन इससे उनका अर्थ नहीं बदलता. चाहे वह ओडिशा की नियमगिरि पहाड़ियों के डोंगरिया कोंध आदिवासियों का ‘सिपाही’ बनने का संकेत हो या पश्चिमी घाट का मामला.

उद्योगपति अडानी की फ़ाइल का मसला भी इसी तरह के अनुरोध से जुड़ा था कि एक दिन अचानक फ़ाइल ग़ायब हो गई. उन्होंने कहा, ‘मेरे मंत्रालय के कुछ अधिकारी नहीं चाहते थे कि मैं फ़ाइल दोबारा देखूं.’ बहुत ढूंढने पर वह ‘वॉशरूम’ में मिली.

नाउम्मीदी

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पेशे से वकील और ख़ानदानी कांग्रेसी जयंती के पत्र में कही बातों को पार्टी के कई वरिष्ठ नेता ‘अक्षरशः सत्य’ मानते हैं. कुछ का कहना है कि संप्रग-दो में राहुल गांधी की दखलंदाज़ी यहीं तक सीमित नहीं थी. उनके मुताबिक़ ‘इसके कई दूसरे उदाहरण और ढेरों प्रमाण हैं.’

उनकी राय में ‘इसी तरह का ग़ैरज़रूरी और अराजनीतिक हस्तक्षेप पार्टी को ले डूबा.’ इससे हज़ारों करोड़ रुपये के ‘वेदांता’ जैसे निवेश अटक गए.

बाद में, चुनाव से सौ दिन पहले, जयंती को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया और राहुल गांधी ने फ़िक्की के भाषण में इसका ठीकरा उनके सिर फोड़ा.

बावजूद इसके यह मानना राजनीतिक नासमझी होगी कि जयंती नटराजन के विस्फोटक पत्र के बाद कांग्रेस में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा. या पार्टी की नई पटकथा लिखी जाएगी, जो उसे सत्ता का ऑस्कर दिलवा दे.

इसके आसार कम हैं. राम मोहम्मद थॉमस को विकास स्वरूप जैसा दक्ष लेखक और डैनी बॉयल सरीखा निर्देशक मिल गया था, जबकि कांग्रेस का लेखक-निर्देशक क़तई नहीं बदला है. वह अब भी ‘बलि के बकरों’ से काम चलाना चाहता है.

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