जब गांधी और मोदी एक तस्वीर का हिस्सा बने

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भारत की राजधानी दिल्ली में इन दिनों इंडिया आर्ट फ़ेयर चल रहा है जहां बड़ी संख्या में दुनिया भर की कला दीर्घाएं अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन कर रही हैं.

ये बात और है कि इंडिया आर्ट फ़ेयर में कलाकार कम दिखते हैं और दीर्घाएं अधिक, क्योंकि ज़ाहिर है ये मेला कला दीर्घाओं का होता है जहां मंहगी-मंहगी कलाकृतियां ख़रीदी जाती हैं.

हालांकि इस बार इंडिया आर्ट फ़ेयर में परफ़ॉर्मेंस आर्ट नाम की एक नई चीज़ भी हुई.

(पढ़ेंः भारतीय कला के सभी बड़े नाम...)

जी हां, परफ़ॉर्मेंस आर्ट, जहां कलाकारों ने दिखाया कि आख़िर प्रक्रिया क्या होती है एक पेंटिंग बनाने की.

पढ़ें पूरी रिपोर्ट

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इंडिया आर्ट फ़ेयर के जमावड़े को अब आठ साल हो चुके हैं और भारत के आर्ट कैलेंडर में ये एक महत्वपूर्ण इवेंट के तौर पर दर्ज़ हो चुका है.

(पढ़ेंः मेट्रो ट्रेन जो लगेगी आर्ट गैलरी की तरह)

इसकी शुरुआत करने वाली नेहा कृपाल कहती हैं, "इस बार हमारी कोशिश है कि आर्ट पीसेस के ज़रिए एक बातचीत शुरू की जाए, बहस शुरू की जाए, एक दूसरे को समझा जाए. न केवल आर्ट के जानकार बल्कि उनके साथ भी संवाद हों जिन्हें कला में रुचि है और उनसे भी जो कल को आर्ट कलेक्टर हो सकते हैं."

आर्ट फ़ेयर का यह इवेंट इतने विशाल पैमाने पर होता है कि एक दिन में सारी कलाकृतियां देख-समझ पाना शायद ही किसी के लिए संभव हो.

कला की समझ

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पुराने दिग्गज मसलन, हुसैन, रज़ा, रामकुमार, भूपेंद्र कक्कड़ से लेकर सतीश गुजराल की पेंटिंग्स हों या फिर नए सितारों में सुबोध गुप्ता, अनीश कपूर या फिर जगदीश चिंताला. सारे कलाकारों की कलाकृतियां आर्ट फ़ेयर में दिख जाती हैं.

(देखेंः इतिहास की कूची से देवी देवता)

कभी-कभी कुछ कलाकार भी. ख़ैर.....मैंने शुरुआत की 'क्यूरेटेड आर्ट वॉक' के ज़रिए मेले को समझने की. कई तरह के वॉक्स में से मैंने चुना था. वर्तमान समय की कला को संदर्भ देना.

इनाक्षी (क्यूरेटर) ने सुबोध गुप्ता, भूपेन कक्कड़ और तैय्यबा बेगम लिपी की कलाकृतियों के ज़रिए संदर्भ को समझाते हुए कहा, "कंटेपररी आर्ट को समझने के लिए ज़रुरी है कि हम इस बात को समझें कि कलाकार का बैकग्राउंड क्या है और उन्होंने ये आर्ट पीस किस समय और काल में बनाया है तभी इसके बारे में समझ अच्छी और बेहतर हो सकेगी."

लोकल ट्रेन

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ख़ैर वॉक के बाद घूमते हुए मेरी नज़र पड़ी बटन जैसी चीज़ों से बनी कलाकृति पर जिसका नाम था 'विरार फ़ास्ट- मुंबई लोकल.'

(देखेंः इंडिया आर्ट फ़ेयर 2014)

लोकल ट्रेनों में यात्रा करते यात्री भी आर्ट पीस हो सकते हैं ये ख्याल ही लुभा गया था. कलाकार थे वलय शेंडे. नाम से लगे महाराष्ट्र के... हां मुंबई लोकल तो शायद कोई महाराष्ट्र का कलाकार ही बना सकता है इस रूप में.

आगे चलकर ईंटनुमा कलाकृति ने ध्यान खींचा. ईंटों से कुछ चेहरे निकलते हुए से लगे. पास जाकर देखा तो लगा कि ये ईंटें कंस्ट्रक्शन साइट की हैं. कलाकार गिरिजेश कुमार हाथ बांधे खड़े थे.

चेहरे पर मुस्कुराहट

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मैंने पास जाकर पूछा तो धीमे धीमे बोले, "हां आप सही समझ रहे हैं. कंस्ट्रक्शन साइट से ही इसका ख्याल आया था. ये ईंटें बेकार हो जाती हैं. एक टुकड़ा रह जाता है. तो एक मूर्ति बनाई. शायद ये उन मज़दूरों का टुकड़ा है जिन्होंने वो इमारतें खड़ी की होंगी जो इनसे इतर ईंटों से बनी होंगी."

(देखेंः हर तस्वीर एक कहानी कहती है)

ख्याल तो लाजवाब था....और कलाकार भी.

कलाकृति भी क्योंकि हमारी बातचीत के बीच में गैलरी मालिक ने गिरिजेश से कहा कि दाएं पर जो मूर्तियां लगी हैं कोई उसकी क़ीमत पूछे तो मत बताना क्योंकि वो किसी ने ख़रीद ली हैं. कलाकार के चेहरे पर मुस्कुराहट थी.

गांधी और मोदी

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इस गैलरी से थोड़ी दूर पर मुझे किसी कोने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर जैसा कुछ दिखा...आगे जाकर देखा तो विवेक शर्मा नाम के कलाकार ने मोदी और गांधी पर एक पेंटिंग लगाई थी.

(पढ़ेंः पेंटिंग्स में हिरोशिमा की बर्बादी का दर्द)

कलाकार तो उस समय मौजूद नहीं थे लेकिन कलाकृति के बारे में लिखी इबारत अटपटी थी. मसौदा ये था कि गांधी जी मोदी को एक मौका दे रहे हैं.

दोनों ही नेता ठंडे दिमाग वाले और विचलित नहीं होने वाले हैं. पेंटिंग का नाम 'सन्स ऑफ़ द सेम सॉयल.' मैं पेंटर से इस बारे में और पूछना चाहता था लेकिन वो वहां थे नहीं.

बड़ा कैनवास

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आगे कई और कलाकृतियां थीं और एक बड़ी सी बीएमडबल्यू कार भी. जहां सबसे अधिक भीड़ थी.

(पढ़ेंः जहां बसती है स्वांग कलाकारों की दुनिया)

मुझे लगा कोई कलाकृति है लेकिन पास जाकर पता चला कि बीएमडब्लूय आर्ट फ़ेयर का पार्टनर है तो उन्होंने अपनी नई कार लांच की है. ये भी एक पहलू है आर्ट फ़ेयर का. स्पॉन्सर तो अपनी छाप छोड़ेंगे ही.

ख़ैर थकान होने लगी थी लेकिन तब तक दिखा कि दो लड़कियां एक बड़े कैनवास पर पेंट कर रही हैं. लगा कि शायद इनका काम पूरा नहीं हुआ है अभी तक.

बड़ी पेंटिंग

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थोड़ी देर तक देखते रहने के बाद मैंने पूछ ही लिया, "ये क्या आप लोग काम पूरा कर रहे हैं या फिर ये कोई परफ़ॉर्मेंस है?"

चित्रा गणेश पलटीं और मेरा मीडिया कार्ड देखते ही मुस्कुराई. बोलीं कि ये आर्ट परफ़ॉर्मेंस हैं. हम चाहते हैं कि लोग देखें कि आर्टिस्ट कैसे काम करते हैं. हम (चित्रा गणेश और ध्रुवी आचार्य) आर्ट फ़ेयर के तीनों दिन इस बड़ी पेंटिंग को पूरा करेंगे.

अरे ये तो मज़ेदार है. पता चला कि एक कोने पर स्मृति दीक्षित 'मेमोरी ऑफ़ रेड' नामक एक और कलाकृति पर काम कर रही हैं जो तीन दिन तक चलेगा.

कलाकार का सलाम

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लाल रंग की यादों की थीम पर स्मृति का काम था. जो तीन दिन में पूरा होने वाला था.

अब मैं थक चुका था... बाहर निकला तो दाएं हाथ पर ढेर सारी बड़ी-बड़ी चीटियां दिखीं......जी हां..चीटियों पर एक कलाकृति थी....

जाने माने चित्रकार परेश मैती की. परेश तो नहीं थे लेकिन कलाकृति के बारे में लिखा हुआ था कि ये चीटियों की अथक मेहनत वाली प्रवृत्ति को सलाम है कलाकार का.

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