क्या पश्चिम बंगाल में कमल खिलेगा?

  • 3 फरवरी 2015
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पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास पारंपरिक रूप से हिंसा से भरा रहा है.

तृणमूल के उदय के बाद सीपीएम और तृणमूल कार्यकर्ताओं में हिंसक संघर्ष होते थे, लेकिन अब भाजपा ने धीरे-धीरे, लेकिन विश्वासपूर्वक सीपीएम की जगह लेनी शुरू कर दी है.

भाजपा का वोट शेयर बढ़ने के साथ ही सत्ताधारी तृणमूल के साथ उसके कार्यकर्ताओं के सीधे हिंसक संघर्ष हो रहे हैं तो तृणमूल और वाम दलों के असंतुष्ट भगवा दल में शामिल हो रहे हैं.

लेकिन क्या पश्चिम बंगाल में कमल खिल पाएगा?

पढ़िए, पूरी रिपोर्ट

भाजपा बंगाल के लगभग सभी ज़िलों में अपनी पकड़ मज़बूत करती जा रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 18 फ़ीसदी वोट मिले थे.

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इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले दिनों वीरभूम, पूर्वी मेदिनीपुर या नादिया में भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं में हिंसक झड़पें हुई हैं.

मई 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद के राज्य के सभी उपचुनावों में सीपीआई (एम) तीसरे और चौथे नंबर पर रही है.

34 साल तक राज्य की सत्ता संभालने वाली पार्टी के लिए ये ताज्जुब की बात है, लेकिन यह कठोर सच्चाई है.

यह सच्चाई ही भाजपा को पश्चिम बंगाल में हौसला दे रही है और वह 2016 के विधानसभा में अपने लिए बड़ी संभावना देख रही है.

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने वर्धमान में एक रैली में कहा था कि यह भारी जनसैलाब "तृणमूल कांग्रेस को गंगा सागर में डुबो देगा."

पश्चिम बंगाल के कांग्रेस के पुराने कद्दावार नेता बरकत ग़नी ख़ान ने एक बार कहा था कि सीपीआई (एम) को बंगाल की खाड़ी में डुबो दो, लेकिन अमित शाह ज़्यादा तफ़सील के साथ वह जगह भी बता रहे थे, जहां डुबोया जाएगा.

राज्य में भाजपा के कार्यकर्ता यह बात मानने लगे हैं कि संभवत: वह राज्य में सत्ता में आने वाले हैं.

विश्वास

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जनसंघ के सबसे बड़े नेता और विचारक श्यामाप्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल के ही थे, लेकिन राज्य में कभी भी पार्टी का बड़ा जनाधार नहीं रहा.

भाजपा के एक शीर्ष पदाधिकारी ने हाल ही में कहा, "हमें वाकई इस पर विश्वास है कि मुखर्जी के सपने को पूरा करने का वक्त आ गया है और हम बंगाल का भगवाकरण कर सकते हैं."

ऐसा क्या है जिससे भाजपा नेताओं में इतना विश्वास आ रहा है?

पहली बात तो यह है कि लोगों का विश्वास ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से उठ रहा है.

शारदा चिट फंड घोटाले में पार्टी की भद्द पिट गई है. उसके कई नेता, सांसद और मंत्री घोटाले में फंसे हुए हैं और जेल की हवा खा रहे हैं. और सबसे बढ़कर राज्य में विकास और रोजगार के मौके ठप पड़े हैं.

यह चीज़ें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के हक़ में काम कर सकती हैं- जिसे लोग नई उम्मीद और नई प्रेरणा के रूप में देख रहे हैं.

एक दूसरा अहम मसला अल्पसंख्यकों का है.

दूर की कौड़ी

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भाजपा के एक नेता कहते हैं, "ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का उल्टा असर होना तय है- और यह हो भी रहा है. राज्य के बहुमत हिंदू वोट हमारे पक्ष में लामबंद हो रहे हैं और हम बांग्लादेश से ग़ैर-क़ानूनी घुसपैठ और मुस्लिम चरमपंथियों की राष्ट्रविरोधी कार्रवाइयों का मुद्दा उठा रहे हैं. राज्य सरकार ने इस तरफ अपनी आंखे मूंद रखी है."

लेकिन पार्टी को पता है कि उसे अभी पश्चिम बंगाल में लंबा सफर तय करना है. राज्य में भाजपा एक राजनीतिक ताकत तो बन सकती है, लेकिन 'राज्य का भगवाकरण' अभी दूर की कौड़ी है.

पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए एक बड़ी कमी यह है कि मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करने के लिए उनके पास एक हाई प्रोफ़ाइल जननेता नहीं है.

राज्य इकाई के अध्यक्ष राहुल सिन्हा एक 'जूझारू नेता' (जैसा कि अमित शाह उन्हें कहते हैं) हो सकते हैं, लेकिन उनमें मास अपील और स्वीकार्यता का अभाव है.

यह एक वजह हो सकती है जिसके लिए भाजपा ग्लैमर की दुनिया की ओर देख रही है.

नया चेहरा

बॉलीवुड गायक बाबुल सुप्रियो के आसनसोल से जीतने के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल किया गया है, लेकिन शायद तेज़तर्रार ममता बनर्जी के सामने वह टिकते नहीं हैं.

इसलिए भाजपा अब पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली की ओर बड़ी उम्मीद से देख रही है.

भाजपा नेता वरुण गांधी ने साल 2014 की गर्मियों में ही सौरव गांगुली से संपर्क किया था, लेकिन तब सौरव ने उस प्रस्ताव से इनकार कर दिया था.

लेकिन पिछले आठ-नौ महीनों में स्थितियां तेज़ी से बदली है और अचरज नहीं होना चाहिए यदि सौरव गांगुली बंगाल में भाजपा का नया चेहरा बन जाएं.

एक साल से थोड़े ही ज्यादा समय में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसलिए यह इस मैराथन रेस का अंतिम चक्कर है और भाजपा पूरी रफ़्तार से दौड़ रही है.

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