'आप' के केजरीवाल ने क्या-क्या बदला

  • 4 फरवरी 2015
अरविंद केजरीवाल और आप के अन्य नेता इमेज कॉपीरइट AFP and Getty

पिछले साल हुए आम चुनाव में मिली करारी हार और पार्टी में आपसी मतभेद की ख़बरों के बाद ऐसा लगने लगा था कि आम आदमी पार्टी (आप) का वजूद ख़तरे में है और इसके नेता अरविंद केजरीवाल का राजनितिक करियर ख़त्म होने की कगार पर है.

लेकिन इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले न केवल आप मज़बूत होकर उभरी है, बल्कि केजरीवाल भी और ताक़तवर हुए हैं. उनका ट्रेडमार्क मफ़लर नहीं बदला, उनकी खांसी नहीं रुकी. लेकिन बदला क्या? कैसे वो सियासी अखाड़े में खुद को दोबारा स्थापित कर पाए हैं?

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49 दिन तक सत्ता में रहने के बाद अचानक सत्ता छोड़ने पर केजरीवाल ने जनता से माफ़ी मांगते हुए इसे एक बड़ी भूल बताया था.

भगोड़ा होने का दाग़

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उनके साथी आशुतोष ने बीबीसी को बताया कि पार्टी से ग़लती यह हुई कि जिस तरह से सत्ता पर बैठने से पहले जनता से उनकी राय मांगी थी, सत्ता छोड़ने से पहले उन्हें जनता के पास जाना चाहिए था. इस पर विपक्ष आज भी उन पर ताने कसता है.

दिल्ली चुनाव की रैलियों में आज भी उन्हें भगोड़ा होने की याद दिलाई जाती है. लेकिन इससे चुनाव नतीजों पर शायद कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.

अति महत्वाकांक्षी

कहा जाता है कि दिल्ली सरकार छोड़ने के पीछे केजरीवाल की मंशा यह थी कि वो केंद्र में एक किंग मेकर की भूमिका निभाएंगे. ऐसा उनकी पार्टी के कुछ लोगों ने पिछले साल स्वीकार भी किया था. इसलिए पार्टी ने लोकसभा में 440 उम्मीदवार खड़ा किए थे.

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अपने पहले आम चुनाव में भला कोई पार्टी इतने सारे उम्मीदवार खड़ा करने की हिम्मत कर सकती है? ये भूल पार्टी से हुई.

इसका खमियाज़ा इसे भुगतना पड़ा. आशुतोष कहते हैं कि ये एक बड़ी भूल थी, जिसके ज़िम्मेदार केजरीवाल नहीं थे.

उनकी राय थी कि 60-70 सीटों पर चुनाव लड़ा जाए. इन सीटों पर पूरी तरह से फोकस किया जाए. लेकिन पार्टी के कई अहम नेताओं की ज़िद के आगे वो झुक गए.

इस ग़लती के बाद पार्टी ने सोच समझ कर निर्णय लिया कि वो फिलहाल दिल्ली से आगे नहीं जाएंगे.

हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब कुछ लोगों ने केजरीवाल को कुछ सीटों पर चुनाव लड़ने की सलाह दी तो उन्होंने इस सलाह को ठुकरा दिया.

मोदी पर हमले बंद

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पिछले आम चुनाव में केजरीवाल का हौसला काफी बुलंद था. दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें लाने और सरकार बनाने के बाद वो एक बड़े नेता के रूप में उभरे थे. एक समय ऐसा आया कि टीवी चैनलों पर मोदी से अधिक वो छाए रहते थे.

केजरीवाल ने मोदी को चुनौती उनके राज्य गुजरात में देने की कोशिश की. वहां उन्होंने कई रोड शो किए लेकिन दाल नहीं गली.

उन्होंने उसके बाद बनारस से मोदी के ख़िलाफ़ आम चुनाव लड़ने का फैसला किया. पार्टी के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि ये उनकी एक बड़ी भूल थी.

हाल के एक इंटरव्यू में केजरीवाल ने ये स्वीकार किया कि अगर उनकी पार्टी दिल्ली चुनाव जीती तो वो केंद्र में मोदी सरकार के साथ मिलकर काम करने की कोशिश करेंगे.

पार्टी ने इससे पहले ये निर्णय लिया कि वो नरेंद्र मोदी पर कोई सीधा प्रहार नहीं करेंगे. दिल्ली विधानसभा की चुनावी मुहिम में आप ने मोदी पर सीधा आक्रमण नहीं किया है.

घिसा-पिटा रिकॉर्ड

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पिछले साल 'भ्रष्टाचार' शब्द केजरीवाल के लबों पर हमेशा रहता था. परिवर्तन लाने का सपना भी वो लोगों को दिखा रहे थे , भ्रष्टाचार ख़त्म कर. इससे वो एक घिसे-पिटे रिकॉर्ड की तरह सुनाई देने लगे थे.

पार्टी की नेता और अभिनेत्री गुल पनाग ने बीबीसी को बताया कि इस बार भ्रष्टाचार एक मुद्दा है, लेकिन अकेला मुद्दा नहीं. उनके अनुसार उनकी पार्टी ने दिल्ली के भिन्न-भिन्न इलाक़ों में आम लोगों के साथ 'दिल्ली डॉयलग' का एक सिलसिला शुरू किया.

जनता से इस तरह का सीधा संपर्क उनके लिए काफी अहम साबित हुआ.

इन सभाओं में उठे मुद्दे उनकी पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में शामिल किए गए हैं.

संगठन में सुधार

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Image caption आप के आम लोगों के साथ 'दिल्ली डॉयलग' का उसे फ़ायदा मिल रहा है.

कई इलाक़ों में पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात करके यह समझ में आया कि मीडिया की नज़रों से ओझल केजरीवाल ने संगठन में अनेक सुधार किए हैं. हर शाखा को मज़बूत किया. बड़े नेताओं के आपसी मतभेद दूर किए. आंदोलन के रूप में जब ये पार्टी थी तो कई लोग इसमें शामिल हो गए थे.

केजरीवाल ने संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले लोगों को पार्टी से बाहर किया. दिल्ली में पार्टी की शाखाओं में जाकर लोगों से मिले और उनकी समस्याओं को समझा. इसके बाद कई तरह के परिवर्तन किए.

दिल्ली में चुनावी मुहिम के दौरान साफ नज़र आया कि पार्टी के कार्यकर्ता जोश में हैं. वो केजरीवाल के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. पिछले चुनाव की तरह इस बार भी कई लोगों ने कहा कि वो अपनी जेब से पैसे खर्च कर चुनावी मुहिम में पार्टी का साथ दे रहे हैं.

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