मोदी और मुसलमानों के बीच टोपी का पेंच?

अगर नरेंद्र मोदी मुस्लिम धर्म गुरुओं के हाथों दी जाने वाली टोपी स्वीकार कर लेते तो क्या मुसलमान भारतीय जनता पार्टी के साथ हो जाता?

इसका जवाब तलाशने के लिए मैं पुरानी दिल्ली के इलाक़े में पहुंचा और वहां के मुस्लिम युवाओं से बातचीत की और उनके राजनीतिक मिजाज को भांपने की कोशिश की.

क्या है युवा मुस्लिम मतदाताओं की सोच?

विस्तार से पढ़िए

पुरानी दिल्ली में रहने वाले नौजवानों के एक बड़े तबके की बात करें तो लगता है कि मु्स्लिमों का समर्थन भाजपा को मिल सकता था.

मतलब पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद के इलाक़े, दरियागंज की तंग गलियों या फिर मिर्ज़ा ग़ालिब की गली बल्लीमारान से है.

मुस्लिम नौजवानों का एक बड़ा तबका ऐसा है, जिसे लगता है कि अगर मोदी मौलवियों द्वारा पेश की गई टोपी स्वीकार कर लेते तो शायद देश में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाते.

जामा मस्जिद के इलाके में मछली के कारोबार से जुड़े शहजाद कहते हैं, "जब वो सिखों की पगड़ी पहन सकते हैं तो फिर टोपी क्यों नहीं. उन्होंने टोपी स्वीकार नहीं की, इसलिए हमारे मन में अंदेशा है. सबका साथ, सबका विकास करने की बात नरेंद्र मोदी करते हैं तो फिर उन्हें मुसलमानों को भी अपने गले से लगा लेना चाहिए."

विकास का मॉडल

पुरानी दिल्ली के कई ऐसे मुस्लिम नौजवान ऐसे हैं जो मानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने विकास का एक नया मॉडल लोगों के सामने पेश किया है. वो यह भी कहते हैं कि एक दल विशेष ने मुसलमानों का इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में किया है.

एक अन्य नौजवान इक़बाल का कहना था कि मुसलामानों के पास राजनीतिक विकल्प कम ही रहे हैं.

इकबाल कहते हैं, "मुसलमान मजबूरी में ही वोट देते रहे हैं. यह जान कर भी कि किसी भी दल के पास मुसलमानों के विकास का कोई एजेंडा न तो रहा है और ना ही रहेगा."

पहचान का संघर्ष

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कभी इस इलाक़े से हिन्दुस्तान की हुकूमत चला करती थी. मगर आज यह इलाक़ा अपनी पहचान बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है.

जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के छोटे भाई तारीक़ बुखारी को लगता है कि पुरानी दिल्ली में हालात पहले से भी ख़राब होते जा रहे हैं. चाहे वो क़ानून-व्यवस्था की बात हो या फिर नागरिक सुविधाएं.

तारीक़ कहते हैं, "आज की तारीख़ में पुरानी दिल्ली और ख़ास तौर से जामा मस्जिद के आस-पास का इलाक़ा ग़ैर कानूनी कामों का अड्डा बन गया है. चाहे वो नशाखोरी हो या फिर अवांछित तत्वों का यहां डेरा डालना."

चुनाव आते हैं और उम्मीदवार जीतकर संसद और विधानसभा में जाते हैं. मगर चुनावों से यहां के लोगों की ज़िंदगी बेहतर होगी, इसका भरोसा नहीं के बराबर ही है. चाहे वो मटिया-महल का इलाक़ा हो या बल्लीमारान का.

मटिया महल की खचाखच भीड़ वाली सड़क के किनारे एक छोटी सी दुकान चलाने वाले ज़हीर खान कहते हैं कि पिछले कई दशकों से पुरानी दिल्ली के इलाके में किसी तरह का कोई विकास नहीं हुआ है. जिन घरों की क्षमता दो परिवारों की थी उसमें अब पांच परिवार रह रहे हैं.

हादसे का इंतज़ार

पुरानी ऐतिहासिक इमारतों का भी बुरा हाल है जो किसी भी पल गिर सकती हैं और बड़ा हादसा हो सकता है.

मटिया महल और चांदनी चौक के लोगों ने मुझे उन खुले नंगे बिजली के तारों का गुच्छ दिखाया जो एक बड़ी दुर्घटना को दावत दे रहे हैं.

वो पूछते हैं, "क्या इन तारों और केबलों को भूमिगत नहीं किया जा सकता?"

बातचीत के दौरान इतना तो समझ में आया कि लोगों का मन राजनीतिक दलों से ऊब चुका है, जिन्होंने हर चुनाव में वादे तो किए मगर उन्हें पूरा नहीं किया.

इसी दौरान मेरी मुलाक़ात मटिया महल विधानसभा सीट से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद आसिम से हो गई जो अपने प्रचार में निकले हुए थे.

इतिहास की धरोहर

आसिम का कहना था कि उनकी पार्टी वो तमाम काम करेगी जो दूसरे राजनीतिक दलों ने वादे करने के बाद भी नहीं किए. ज़ाहिर है उनका इशारा कांग्रेस और भाजपा की तरफ ही था.

मगर यहां के लोगों को अब किसी पर भी भरोसा नहीं रह गया है. वो कहते हैं कि आप नया राजनीतिक दल है जिसे अपनी जगह बनाने और विकास के कामों को अमली जामा पहनाने में काफी वक़्त लगेगा.

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पुरानी दिल्ली का इलाक़ा अपने आप में इतिहास की धरोहर है. कई ऐसे भवन और इमारतें है जिन्होंने इतिहास को अपने अंदर संजोये रखा है.

वर्षों से चली आ रही नेताओं और महकमे की उदासीनता अगर ख़त्म नहीं हुई तो एक वक़्त ऐसा भी आ सकता है कि इन धरोहरों का नामो-निशां मिट जाएगा.

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