क्या केजरीवाल दिल्ली में लौट रहे हैं?

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अगर ओपीनियन पोल और दिल्ली में राजनीतिक सुगबुगाहटों पर यक़ीन करें तो, अरविंद केजरीवाल शनिवार को होने जा रहे चुनाव में अपनी पार्टी को सत्ता की दहलीज़ तक पहुंचाने के कगार पर खड़े हैं.

तीन बड़े ओपीनियन पोल में केजरीवाल को 37 सीट मिलते हुए दिखाया गया है, यानी सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत से ज़्यादा सीटें.

यदि ओपीनियन पोल पर भरोसा किया जाय तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को कहीं कम 29 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ सकता है.

जबकि तेज़ी से खिसकते जनाधार वाली कांग्रेस पार्टी को बमुश्किल चार सीटें मिल सकती हैं.

आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव अपनी पार्टी को 40-50 सीटें मिलने की बात कहते हैं.

अगर ऐसा होता है तो यह आम आदमी पार्टी की बहुत बड़ी जीत होगी.

लोकप्रियता

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छियालिस वर्षीय पूर्व नौकरशाह केजरीवाल ने दिसम्बर 2013 में पहली बार जब असरदार ढंग से राजनीतिक पारी शुरू की थी, तबसे लेकर उनके लिए बड़ा उतार चढ़ाव वाला समय रहा है.

दिल्ली विधानसभा के उस चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में से 28 सीट मिली थीं. इस जीत ने केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री बना दिया.

मैंने उस वक़्त लिखा था कि केजरीवाल की पार्टी उन लोगों के लिए उम्मीद की तरह है जो जातिवादी और वंशवादी राजनीति से थक गए हैं.

लेकिन 49 दिनों की सरकार के बाद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी विधेयक के मसले पर मुख्यमंत्री पद से अचानक इस्तीफ़ा दे दिया.

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उन्होंने हर चीज़ को सही तरीक़े से करने का वादा किया था, लेकिन अपने ही एक मंत्री के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से हठपूर्वक मना कर दिया.

मोदी के नेतृत्व में तेज़ी से उभरती भाजपा समेत उनके आलोचक उन्हें नौसिखिया, अराजक और भगोड़ा तक कहकर मज़ाक़ उड़ाया है.

वहां से केजरीवाल के लिए यह मुश्किल भरा समय था.

पार्टी के वरिष्ठ सहयोगियों की सलाह पर केजरीवाल ने लोकसभा में भाजपा और मोदी की बढ़ती लोकप्रियता को हल्के में लिया और पूरे देश में 400 उम्मीदवारों को खड़ा कर दिया.

उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी कम से कम 100 सीट जीतेगी. केजरीवाल ख़ुद वाराणसी से मोदी के ख़िलाफ़ चुनावी मैदान में उतरे.

एजेंडा

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लेकिन नतीजा निराशाजनक रहा. आम आदमी पार्टी को सिर्फ़ चार सीटों पर जीत मिली और उसके 96 फ़ीसदी उम्मीदवार अपनी ज़मानत भी नहीं बचा सके.

वाराणसी में केजरीवाल, मोदी के हाथों तीन लाख से ज़्यादा वोट से हारे. मुझे मीडिया में आई उस वक़्त की एक सुर्ख़ी याद आती है, 'कैसे अरविंद केजरीवाल ने आप को बर्बाद किया'.

लेकिन इन नौ महीनों में उत्साही पार्टी कार्यकर्ताओं, छात्रों और समाजसेवियों की बदौलत केजरीवाल और उनकी पार्टी लगती है कि वापस लड़ाई में आ गई है.

उन्होंने सकारात्मक चुनाव अभियान पर अपना ध्यान लगाया है, जिन्हें उनके समर्थक दिल्ली के विकास का एजेंडा कहते हैं.

इसमें पानी, बिजली, ग़रीबों के लिए मकान, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई जैसे मुद्दे शामिल हैं.

उन्होंने बीच में मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के लिए माफ़ी भी मांग ली है और वापस आने की हालत में कार्यकाल पूरा करने का वादा किया है.

व्यवहारिक

केजरीवाल ने अंग्रेज़ी अख़बार, 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' से कहा, "लोग मुझसे नाराज़ थे क्योंकि हमने सत्ता छोड़ दी, लेकिन अब ये एक पुरानी बात है. हमने माफ़ी मांग ली है. लोग माफ़ करने को तैयार हैं और आगे बढ़ने को कहा है."

एक विश्लेषक ने केजरीवाल के बारे में लिखा है, "वे शब्दों का चयन सावधानी से कर रहे हैं और अपनी राजनीति को ज़्यादा समझदारी के साथ व्यक्त कर रहे हैं. हम जो केजरीवाल आज देख रहे हैं वे बेशक एक नया केजरीवाल हैं. उनकी हार ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है."

कई लोग मानते हैं कि केजरीवाल अपनी सीमाओं को लेकर बहुत व्यावहारिक हैं.

दिल्ली में अपने आधार मज़बूत करना और यहां का नेता बनना उनकी प्राथमिकता है. विश्लेषक एजाज़ अशरफ़ का कहना है, "उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि आपको मतदाता का सम्मान करना होगा और सत्ता में रहकर ख़ुद को साबित करना होगा."

चुनौती

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आम चुनाव में हार के बावजूद केजरीवाल की पार्टी का वोट प्रतिशत दिसंबर 2013 के 31 प्रतिशत से बढ़कर 34 प्रतिशत हो गया था.

वे दिल्ली की उस 60 फ़ीसदी जनता की पहली पसंद हैं जो महीने में 13,500 रुपये से कम कमाते हैं. ये वो लोग हैं जो छोटे स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं.

कइयों का मानना है कि केंद्र की सत्तारूढ़ दल भाजपा घबराई हुई है. भाजपा ने केजरीवाल की पुरानी सहयोगी किरण बेदी को उनके ख़िलाफ़ मैदान में उतारा है.

इतिहासकार मुकुल केसवन उन्हें सही पसंद नहीं मानते हैं.

भाजपा ने केंद्रीय मंत्रियों, 120 सांसदों और कई दिग्गज नेताओं को दिल्ली के चुनावी मैदान में उतार दिया है.

मोदी ख़ुद चुनाव प्रचार में उतर आए हैं. दिल्ली का चुनाव, मई के बाद मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन कर आई है.

क्या केजरीवाल का 'झाड़ू' फिर से सबकुछ बुहार ले जाएगा? मंगलवार को जब नतीजें आएंगे तो यह देखना दिलचस्प होगा.

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