कितना असरदार है इमाम का फ़तवा?

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दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को समर्थन देने की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुख़ारी की घोषणा से एक बार फिर सवाल उठा है कि इमाम के ये ऐलान कितने असरदार होते हैं.

'आप' के एक नेता ने बीबीसी को बताया कि आख़िरी लम्हे में इमाम साहब का समर्थन वोटरों को सांप्रदायिक लाइन पर बांटने की एक कोशिश है.

पिछले साल आम चुनाव में शाही इमाम ने कांग्रेस को समर्थन दिया था, लेकिन कांग्रेस को करारी हार मिली थी. ज़ाहिर है मुसलमानों ने उनकी अपील पर ध्यान नहीं दिया था.

फ़तवे के बावजूद हारी थी कांग्रेस

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आमतौर से अहमद बुख़ारी और उनसे पहले उनके पिता इमाम अब्दुल्ला बुख़ारी कांग्रेस को समर्थन देते रहे थे. हालाँकि बीच-बीच में उन्होंने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी को भी अपना समर्थन दिया है.

आम मुसलमान कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय शाही इमाम की अपील पर ख़ास ध्यान नहीं देते और वो नहीं चाहते कि जामा मस्जिद से किसी सियासी पार्टी के समर्थन का ऐलान किया जाए.

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ऐतिहासिक रूप से जामा मस्जिद के शाही इमाम की मुसलमानों के बीच अच्छी छवि रही है, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब सीधे तौर पर इमाम से कांग्रेस के लिए समर्थन लेने की परंपरा शुरू की तब से इमामों का असर मुसलमानों पर कम होता गया.

मुलायम ने तोड़ा का भ्रम

इमाम के असर का भ्रम सबसे पहले मुलायम सिंह यादव ने तोडा था. उत्तर प्रदेश में 1997 में विधानसभा चुनावों से पहले यादव और इमाम बुख़ारी के बीच बातचीत नाकाम हो गई थी.

मुलायम ने ऐलान किया कि उन्हें इमाम के समर्थन की ज़रूरत नहीं है. चुनाव में जीत समाजवादी पार्टी की ही हुई थी.

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तब से लोगों को समझ में आने लगा कि जामा मस्जिद के इमाम का असर सीमित हो गया है.

मुलायम को जब 2012 के विधानसभा चुनावों में इमाम अहमद बुख़ारी ने अपना समर्थन दिया तो सपा के नेता आज़म खान ने कहा पार्टी को इमाम के समर्थन की ज़रूरत ही नहीं है.

'आप' के समर्थन के पीछे इमाम बुख़ारी की मंशा जो भी रही हो, ये तय है कि उनका असर जामा मस्जिद के बाहर नज़र नहीं आता है.

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