स्पेक्ट्रम बेचने का फ़ायदा किसे?

  • 9 फरवरी 2015
स्मार्टफ़ोन

भारत सरकार ने मार्च, 2015 में दूरसंचार क्षेत्र में 2जी और 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी करने का फ़ैसला लिया है जिसके सरकार को दो वर्ष के भीतर एक लाख करोड़ रुपए की आमदनी होने की उम्मीद है.

ख़ास बात ये है कि जिस दूरसंचार स्पेक्ट्रम की नीलामी होनी है उनमें से अधिकतर बड़ी मोबाईल कंपनियों के पास हैं जिनकी लीज़ अब ख़त्म हो रही है.

नवंबर, 2015 के पहले इन मोबाईल कंपनियों को अपने-अपने क्षेत्रों में स्पेक्ट्रम दोबारा खरीदना ही पड़ेगा.

इस बात को ध्यान में रखते हुए मोबाईल कंपनियां अपने क्षेत्रों में मौजूदगी बनाए रखने के लिए भारी बोली भी लगा सकती हैं.

दाम

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नरेंद्र मोदी सरकार ने नीलामी के लिए 3,705 करोड़ रुपए प्रति मेगाहर्टज के आधार मूल्य को मंजूरी दी है.

सरकार की निगाह सभी बैंड में स्पेक्ट्रम की बिक्री से एक लाख करोड़ रुपए जुटाने पर है जिसमें अकेले 3जी स्पेक्ट्रम की बिक्री से सरकार को 17,000 करोड़ मिल सकते हैं.

लेकिन सवाल ये उठता है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुई कथित अनियमितताओं की ओर संकेत करने वाली नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के आंकड़ों का क्या होगा.

संसद में पेश हुई उस रिपोर्ट में कहा गया था कि 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में दूरसंचार मंत्रालय की नीतियों के कारण देश को 1.76 लाख करोड़ का अनुमानित नुकसान हुआ था.

भरपाई?

सवाल ये भी उठते रहते हैं कि क्या सरकार इस अनुमानित नुक्सान की कभी भरपाई भी कर सकेगी?

टेलीग्राफ़ अख़बार के बिज़नेस संपादक जयंतो रॉय चौधरी के अनुसार,"स्पेक्ट्रम दोबारा बेचने पर भरपाई तो हो सकती है. लेकिन सीएजी रिपोर्ट के आंकड़े कुछ तथ्यों को ध्यान में रख कर एक अनुमान लगाने के बाद निकले थे, जो कल्पना पर भी आधारित थे".

उन्होंने कहा, "क्योंकि वो एक अनुमानित नुकसान था इसलिए ये कह पाना मुश्किल है कि अगर दूसरे तरीके से स्पेक्ट्रम की नीलामी होती तो उतनी ही कमाई होती या नहीं. लेकिन जो नीलामी होने जा रही है उसमे सरकार को जो पैसा मिलेगा वो अच्छा होगा".

मामला

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2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में कथित घोटाले की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी जब ए राजा के नेतृत्व वाले दूरसंचार मंत्रालय ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में 'पहले आओ पहले पाओ' की नीति अपनाकर कुछ कथित अयोग्य कंपनियों को स्पेक्ट्रम दे दिया था.

उस नीलामी पर ऐसे भी आरोप लगे थे कि साल 2008 में स्पेक्ट्रम बेचते समय जो दाम रखा गया वो दरअसल साल 2001 का दाम था.

यूनिटेक और स्वान टेलीकॉम जैसी कंपनियों पर इस सस्ती स्पेक्ट्रम को खरीद कर इन्हें मनमानी कीमत पर बेचने के भी आरोप लगे और ए राजा समेत कई नामचीन हस्तियां और उद्योगपति इन आरोपों के चलते जेल में भी रहे.

मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में हैं जिसने उन सभी आवंटनों को रद्द कर दिया था और अदालती कार्रवाई जारी है.

हालांकि कुछ जानकारों का मत है कि भारत और ख़ासतौर से दूरसंचार क्षेत्र अब उस कथित घोटाले से ऊपर उठ चुका है.

अर्न्स्ट एंड यंग के वरिष्ठ विश्लेषक प्रशांत मानते हैं कि आवंटन रद्द होने से कुछ कंपनियों ने पैसा खोया और कई लोगों ने नौकरियां गंवाई.

मुनाफ़ा

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विश्लेषक प्रशांत कहते हैं, "उसके बाद से तीन नीलामियां हो चुकी हैं और उनमें से दो बेहद सफल रहीं. जहां तक अनुमानित नुकसान की बात है तो सरकार नुकसान से ज़्यादा पैसे कमाएगी अगर हम पिछले तीन वर्ष की और आगामी नीलामी के आंकड़ों पर गौर करें तो. सरकार ने आगामी नीलामी के लिए पहले से ही स्पेक्ट्रम का दाम तय कर दिया है तो संभव है कम खरीददार आएं पर बिक सब कुछ जाएगा".

गौर करने वाली बात ये भी है कि भारत में जितनी भी स्पेक्ट्रम नीलाम होने जा रही हैं उसमें से ज़्यादातर पहले से ही कंपनियों के पास है.

कुछ देशों में ऐसा भी होता है कि जिन कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम होता है वे ही बाज़ार के दाम में उसे दोबारा खरीद लेते हैं और नीलामी की प्रक्रिया नहीं होती.

जयंतो रॉय चौधरी ने बताया, "भारत में टेलीकॉम कंपनियां यही चाहती थीं, जिससे वे अपने-अपने सर्किल में बनी रहें. लेकिन अब न चाहते हुए भी उन्हें नीलामी की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ेगा और ज़्यादा बोली लगाने वाले को ही स्पेक्ट्रम मिल सकेगा. ये इसलिए भी किया गया हो सकता है क्योंकि नई सरकार पिछले कथित टेलीकॉम घोटाले जैसा कुछ भी नहीं चाहेगी."

सरकार को स्पेक्ट्रम की बिक्री से कुल आमदनी कितनी होगी ये तो मार्च में पता चलेगा लेकिन मुनाफ़ा ज़बरदस्त होगा ये लगभग तय है.

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