बाबा, रणवीर और अर्जुन गालियां क्यों देते हैं?

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हम रोज़ाना गालियां सुनते हैं. देते हैं. गुस्से में, मज़ाक में, ख़ुशी और दुख में, उदासी और झुंझलाहट में, ख़ुद को भी और सब को भी.

लेकिन जब हम अपने डेस्क पर बैठकर ख़बर बनाते हैं या स्क्रिप्ट लिखते हैं या किसी अजनबी से बात करते हैं, क्लास रूम में पढ़ते या पढ़ाते हैं या अपने बच्चों से गप लड़ाते हैं या बुजुर्गों से मिलते हैं या फिर टीवी रेडियो के स्टूडियो में लाइव होते हैं तो हमारी भाषा और अंदाज बिल्कुल मुखतलिफ़ होता है.

और जब हम अपने बच्चों, परिवार और दोस्तों के साथ किसी जलसे या संस्था में किसी स्टेज शो, या फिल्म या ड्रामा देखने जाते हैं या म्युजिक कॉंसर्ट में पंजों के बल उछलते हैं तो इस यकीन के साथ कि वहां कोई ऐसी अश्लीलता सुनने को नहीं मिलेगी जिसके बाद हम ख़ुद से या आसपास वालों से आंखे चुराने लगें.

लेकिन जब ये एतबार उठ जाए कि कौन किस वक्त क्या बोल जाएगा या अपलोड कर देगा तो फिर बहुत दिक्कत होने लगती है.

बाज़ारी और ग़ैर बाज़ारी भाषा, सस्ते और मयारी शब्दों का फ़र्क मिटने के फैशन पर बहुत कम लोग गुस्सा करते हैं. ज़्यादा लोग यही कहते हैं कि क्या करें जी आजकल तो सब ही चलता है.

क्या मतलब है?

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लेकिन मेरी मुश्किल आजकल और बढ़ गई है. जब मेरा सात साल का बेटा राफ़े पूछ लेता है बाबा, जिसको 'डांस नहीं करना है, जाके अपनी भैंस चराए' का क्या मतलब है, या जब राफ़े अपना पसंदीदा गाना सुनाता है, मैं सुपरमैन, सलमान का फ़ैन, जो लेवे पंगा, कर दूंगा...**** 'बाबा, कर दूंगा **** किसे कहते हैं और जो ये कहता है, जो उखाड़ना है उखाड़ ले, क्या मतलब है इसका बाबा.'

लेकिन कसूर तो मेरा है. मैंने ही राफ़े को टीवी लाकर दिया. मैं ही उसे सिनेमा में हिंदी फ़िल्में दिखाने ले जाता हूं. मैंने ही उसे लैपटॉप का पासवर्ड बताया. बहुत पैसे खर्च किए हैं मैंने, ताकि वो मुझसे पूछे - 'बाबा जो उखाड़ना है उखाड़ ले, का क्या मतलब है.'

और पिछले मंगलवार को यह भी हो गया कि जब मैं घर आया तो राफ़े साहेब इंटरनेट पर कुछ देख रहे थे. मैं समझा कोई वीडियो गेम खेल रहे होंगे.

जब मुझे लैपटॉप के स्पीकर से नंगी गालियां सुनाई दीं तो राफ़े ने शायद मेरे आसपास होने की वजह से वो साइट क्लोज कर दी.

थोड़ी देर बाद ख़ुद ही लैपटॉप बंद करके मेरे पास आ गया. उसने पूछा - 'बाबा, ये रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर इतनी गालियां क्यों देते हैं?'

नहीं चलता सब कुछ

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मैंने कहा भई मुझे भी दिखाओ. तो फिर राफ़े साहब ने लैपटॉप ऑन करके वो वेबसाइट दिखाई जिस पर एआईबी नॉकआउट शो अपलोड था. फिर राफ़े ने पूछा - 'ये इतने सारे लोग हंस क्यों रहे हैं गालियां सुनके. क्या ये कोई फ़नी बात है.'

मुझे ख़ुशी है कि राफ़े को सात साल की उम्र में ही पता चल गया कि अश्लीलता फ़नी नहीं होती.

और मुझे ख़ुशी है कि राफ़े को गालियां सुनकर हंसने वाले 4000 पढ़े-लिखों को लोटपोट होते देखकर पूछना पड़ गया कि ये हंस क्यों रहे हैं बाबा.

थैंक यू रणवीर सिंह, अर्जुन कपूर और करण जौहर एंड कंपनी. राफ़े अब तुम्हें पसंद नहीं करता. कम से कम तुम्हारा एक फ़ैन तो कम हो गया. हां तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, मगर राफ़े को जरूर पड़ गया है.

माना कि आजकल सब कुछ चलता है मगर आज भी सब कुछ नहीं चलता.

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