आम आदमी पार्टी की जीत का राज़

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मैं रविवार को दक्षिण दिल्ली के एक बड़े सैलून में था जहां काम करने वाले सभी मुसलमान थे. वो आपस में बातें कर रहे थे कि किस तरह उन्होंने और उनके मोहल्ले वालों ने इस बार कांग्रेस के बजाए अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को वोट दिया है.

यही बातें मैंने कुछ अन्य मुस्लिम इलाक़े में सुनी थीं और ऐसे संकेत मिले थे चुनाव बाद के कुछ सर्वेक्षणों में. दूसरी तरफ़ सर्वेक्षणों में कांग्रेस का जनाधार काफ़ी घटता दिखाई दिया.

दिल्ली के चुनावी नतीजे आ रहे हैं और यह सच साबित हुआ कि कांग्रेस दिल्ली में अपना जनाधार खो चुकी है. मेरे विचार में आम आदमी पार्टी की जीत का यह बहुत अहम कारण है.

अगर आप भारतीय जनता पार्टी को मिले मतों पर ध्यान दें तो पता लगेगा कि पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में ज़्यादा वोट नहीं खोए हैं.

हाँ, कांग्रेस ने जो वोट खोए हैं वो आम आदमी पार्टी को मिले हैं, जिसके कारण उनकी सीटें पिछले चुनाव के मुक़ाबले कहीं अधिक हैं.

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भाजपा का जनाधार भी पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले काफ़ी कम हुआ है.

सारे सर्वेक्षण आम आदमी पार्टी की विजय की बातें तो कर रहे थे लेकिन पार्टी को इतनी भारी संख्या में मत मिलेंगे, यह कोई नहीं कह सका था.

दूसरे कारण

इसका मतलब यह नहीं कि 'आप' की जीत के दूसरे कारण नहीं हैं.

पार्टी नेता आशुतोष ने हाल में बीबीसी से बात करते हुए कहा था कि आम चुनाव में पार्टी की ज़बरदस्त हार के बाद इसके बड़े नेताओं ने चिंतन बैठकें की थीं, जिनमें तय हुआ था कि दिल्ली पर पार्टी का पूरा फ़ोकस होना चाहिए. पार्टी के अंदर सुधार लाए गए और नेताओं के आपसी मतभेद ख़त्म किए गए.

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इसके बाद पार्टी की इकाइयां मज़बूत की गईं. कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और उन्हें प्रेरित करने के लिए शाखाओं में लगातार बैठकें हुईं. नए सदस्य बनाए गए.

खुद केजरीवाल ने सभी चुनावी क्षेत्रों का दौरा किया और पिछले विधानसभा के बाद पार्टी को हुए नुक़सान की भरपाई की गई.

'डेल्ही डायलॉग'

विशेषज्ञ कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी जब महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में अपनी जीत के नशे में चूर थी, तब 'आप' दिल्ली की जनता से दोबारा संपर्क करने में जुटी थी.

इस संपर्क की एक अहम मुहिम थी, 'डेल्ही डॉयलॉग' की बैठकें, जहां जनता से सीधे पूछा गया कि आपकी समस्याएं क्या हैं? उदाहरण के तौर पर महिला सुरक्षा से संबंधित डेल्ही डॉयलॉग्स में दिल्ली को कैसे सुरक्षित बनाया जाए इस पर चर्चा हुई और कई क़दम उठाने पर फैसला हुआ.

दोबारा जुड़ने का मौक़ा

'डेल्ही डॉयलॉग' से 'आप' को दिल्ली की जनता से दोबारा जुड़ने का मौक़ा मिला. जनता ने पिछली बार सत्ता छोड़ने पर मांगी गई केजरीवाल की माफ़ी क़ुबूल कर ली. पिछड़े वर्ग में पकड़ एक बार फिर मज़बूत हुई लेकिन अमीर और मध्यम वर्ग के लोगों के बीच पार्टी की छवि अब भी खराब थी.

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आशुतोष कहते हैं कि उनकी पार्टी ने इस वर्ग को आकर्षित करने के लिए खास रणनीति बनाई, जो उनके अनुसार काफ़ी हद तक सफल रही.

दूसरी तरफ भाजपा सरकार ने विधानसभा भंग करने में देरी की, जिससे 'आप' को चुनावी तैयारी के लिए समय मिला. भाजपा ने ज़रूरत से अधिक आत्मविश्वास दिखाते हुए मोदी लहर पर चुनाव जीतने की कोशिश की.

जब ये लगने लगा कि मोदी लहर दिल्ली में कम है तो किरण बेदी को मैदान में उतारा गया जिससे पार्टी की दिल्ली इकाई में फूट पड़ गई.

किरण बेदी की चुनौती

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किरण बेदी भी केजरीवाल को चुनौती नहीं दे सकीं. जब केजरीवाल ने चुनावी मुहिम के दौरान उन्हें टीवी डिबेट के लिए ललकारा तो उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया जिससे वो कमज़ोर नेता नज़र आईं.

भाजपा की नकारात्मक चुनावी मुहिम से भी 'आप' को फ़ायदा हुआ. भाजपा ने अपने विज्ञापनों में केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले किए जिसे जनता ने पसंद नहीं किया. इन विज्ञापनों में करोड़ों रुपए खर्च किए गए लेकिन इसका लाभ पार्टी को नहीं हुआ.

'आप' की जीत का एक ख़ास कारण यह भी है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के कई समर्थक दिल्ली विधानसभा में 'आप' के समर्थक हैं.

हमें ऐसे कई लोग मिले जिनका आम चुनाव में मत नरेंद्र मोदी को गया था लेकिन दिल्ली विधानसभा में उन्होंने केजरीवाल को वोट दिया.

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