बिहार की सियासत से उठे 3 ख़ास सवाल

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बिहार की गरीब जनता भी यह देखकर भ्रम में ही होगी कि कितने सारे नेता और राजनीतिक पार्टियां उनके लिए रात दिन काम में लगी हैं.

मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी वहां की जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश में होंगे कि उन्हें सिर्फ इसलिए परेशान किया जा रहा है क्योंकि वो गरीबों के हक के लिए लड़ रहे हैं. मतलब यह कि इससे पहले ऐसा नहीं हो रहा था.

वहीं नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री के तौर पर वापसी करना चाहते हैं. वो लोगों को बताना चाहते हैं कि पिछले सात महीनों में मांझी के नेतृत्व में बिहार में शासन व्यवस्था पिछड़ गई है.

उधर भाजपा भी लोगों को यह विश्वास दिलाने में लगी हैं कि बिहार में सभी प्रगतिशील और लोगों के हित के काम तभी बंद हो गए थे जब नीतीश कुमार ने उनके साथ गठबंधन तोड़ दिया था.

तीन सवाल

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इस घटना से वहां तीन मज़ेदार सवाल उठ खड़े हुए हैं.

पहला, क्या नीतीश और लालू प्रसाद यादव के लिए यह अच्छा होता कि वे जीतन राम मांझी को गठबंधन के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर वहां चुनावी रैलियां करते?

राजनीतिक तौर पर शायद ये बेहतर रहता क्योंकि जीतन राम मांझी, नीतीश कुमार से कहीं बेहतर वक्ता हैं. नीतीश कुमार के लिए बेहतर होता यदि वे राष्ट्रीय नेता के तौर पर अच्छी पहचान बनाने पर ध्यान केंद्रित करते.

दूसरा सवाल यह है कि क्या मांझी ख़ुद इस तरह का नेतृत्व करना चाहेंगे ?

उनकी राजनीतिक मंशा साफ है, लेकिन भाजपा के साथ उनके क्या समीकरण हैं, इस पर संदेह बना हुआ है.

हालांकि कुछ और महीने राजनीति में बने रहने के लिए मांझी भाजपा का समर्थन लेने से परहेज नहीं करेंगे.

लेकिन यदि मांझी भाजपा में जाते हैं, तो सवाल यह उठेगा कि क्या इससे उन्हें आगे फायदा होगा या नुकसान?

भाजपा के नज़रिए से देखें तो जैसे उसने किरन बेदी को एक दम से मुख्यमंत्री पद की दावेदार तक पहुंचाया, वैसे ही वह (भाजपा), मांझी को भाजपा के दलित नेता के तौर पर पेश कर सकती है.

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हालांकि इससे पार्टी में विरोध या अनबन जैसी समस्या ज़रूर होगी जो भाजपा में किरन बेदी के शामिल होने पर भी हुई थी.

मांझी के भाजपा में शामिल होने से भाजपा में असंतोष और मतभेद और बढ़ेंगे क्योंकि वहाँ कम से कम चार अन्य उम्मीदवार मुख्यमंत्री पद की आस लगाए बैठे हैं.

जद(यू) मांझी पर भाजपा के इशारों पर चलने का आरोप लगा रही है, वहीं केंद्र में राज करने वाली भाजपा, दिल्ली के चुनावों से सबक लेकर सावधानी पूर्वक चलना चाह रही है.

असफल नेता- नीतीश?

अंतिम सवाल यह है कि यदि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं बन पाए और राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने के बाद जल्द चुनाव हुए तो क्या नीतीश कुमार को नुकसान होगा?

अंदेशा है कि इससे शायद उन्हें ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ेगा, खासतौर से तब जब भाजपा दिल्ली में हार जाए.

जब मांझी ने ख़ुद को एक नेता के रूप में पेशकर, महत्वाकांक्षी होकर स्वतंत्र रास्ता चुनने की हिमाकत की, तो मांझी को छोड़ देने के अलावा नीतीश के पास कोई और विकल्प था ही नहीं.

नीतीश चुनावों तक निष्क्रिय रहकर मांझी को आगे बढ़ते हुए देख सकते थे, जिस दौरान चुनावों तक मांझी ख़ुद को और बड़े नेता के तौर पर पेश कर सकते थे.

नीतीश ने दूसरा विकल्प चुना लेकिन वे सफल होंगे या न नहीं, इसी साल के ख़त्म होने से पहले पता चल जाएगा.

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